ईरान के विदेशमंत्री जवाद ज़रीफ ने बिल्कुल सही कहा है कि अमरीका ने इस इलाक़े को बारुद के ढेर में बदल दिया है। उनका यह कहना इस लिए भी सही है क्योंकि इलाक़े में जो हालात हैं उसके बाद अगर हुरमुज़ स्ट्रेट में कुछ हुआ तो उसकी लपटें, इस जलमार्ग के पानी से नहीं बुझेंगी बल्कि आग, लाल सागर, और हिंद महासागर पार करते हुए कई देशों को जला देगी।
डोनाल्ट ट्रम्प की मूर्खता, इस्राईली आदेशों के पालन और ईरान तथा उसके घटकों की शक्ति के बारे में गलत अनुमान की वजह से हुरमुज़ स्ट्रेट और फार्स की खाड़ी में इस प्रकार के हालात बने हैं। ईरान के साथ परमाणु समझौते से ट्रम्प के निकलने से पहले 18 मिलयन बैरल से अधिक कच्चा तेल पूर्वी एशिया और कुछ यूरोपीय देशों के लिए इसी मार्ग से जाता था और कोई समस्या नहीं होती थी और न ही तेल टैंकरों के लिए विमानवाहक युद्धपोत और समुद्री बेड़े की ज़रूरत होती थी, न कोई समुद्री गठबंधन की बात करता था।
अमरीकी राष्ट्रपति जिस गठबंधन की मार्केटिंग कर रहे हैं वह माल ठंडा हो गया है। इस गठबंधन के सदस्य, चाहे वह अरब हों या इस्राईली, इस बारुद के ढेर में चिंगारी लगने के बाद के हालात से डरे सहमे हैं।
ईरान की क्रांति संरक्षक बल आईआरजीसी के उपप्रमुख जनरल यदुल्लाह जवानी अचानक ही अमरीका को केवल ईरान ही नहीं बल्कि ईरानी क्रांति के मित्रों पर भी हमले से बचे क्योंकि उन पर भी हमले का मतलब ईरान के खिलाफ युद्ध का एलान होगा। हमें यक़ीन है कि जनरल यदुल्लाह जवानी ने यह बयान यूंही नहीं दिया होगा।
जनरल जवानी ने इस चेतावनी से अपने आशय को स्पष्ट नहीं किया और न ही यह बताया कि क्रांति के वह दोस्त कौन लोग हैं जिनके खिलाफ हमले के बारे में वह अमरीका को चेतावनी दे रहे हैं लेकिन हम अनुमान लगा सकते हैं कि इन मित्रों से आशय, लेबनान के हिज़्बुल्लाह, यमन के असांरुल्लाह और इराक़ के स्वंय सेवी बदल के सदस्य होंगे जिन्हें आजकल अज्ञात रूप से राकेट हमलों का सामना है और जिनके बारे में समझा जाता है कि इन हमलों के पीछे अमरीका और इस्राईल हैं।
यह तो निश्चित है कि हालिया संकट में अब तक राष्ट्रपति ट्रम्प को बुरी तरह से हार का मुंह देखना पड़ा है। हमारे इस विचार के कई कारण हैः
एक कारण यह कि खबर है कि जिब्राल्टर स्ट्रेट में ब्रिटेन ने जिस ईरानी आयल टैंकर को पकड़ा था वह बहुत जल्द और शायद एक दो दिन के अंदर छोड़ दिया जाएगा जिसका साफ मतलब, टैंकर वॉर में खुली हार और ईरान की विजय है।
दूसरा कारण यह है कि सऊदी अरब के नेतृत्व में अरब गठबंधन में बुरी तरह से टूट-फूट हो चुकी है इस गठबंधन को यमन में अमरीकी आशीर्वाद भी मिला हुआ है लेकिन यूएई के निकलने साथ ही इस गठबंधन की हवा भी निकल गयी है।
तीसरा कारण यह है कि अपना ड्रोन विमान गिराए जाने, छे आयल टैंकरों पर हमले, ब्रिटेन के दो आयल टैंकरों पर क़ब्ज़े और इराक़ में अपने दूतावास पर राकेटों की बारिश के बाद भी अमरीका, ईरान की ओर से जवाबी कार्यवाही के भय से, तेहरान के खिलाफ कुछ नहीं कर पाया।
चौथा कारण यह है कि ईरान ने उच्च स्तर पर यूरेनियम का संवर्धन करना आरंभ कर दिया है और उसके पास संवर्धित यूरेनियम का भंडार अब तक 370 किलो हो चुका है जो परमाणु समझौते में तय सीमा से 70 किलो अधिक है।
पांचवा कारण यह है कि यूएई ने तेहरान के साथ वार्ता आरंभ कर दी है और सुरक्षा समझौते के लिए पिछले हफ्ते उसका एक प्रतिनिधिमंडल तेहरान भी गया था जो अमरीकी प्रतिबंधों का खुला उल्लंघन है।
छठां कारण यह है कि इराक़ी विदेशमंत्री मुहम्मद हकीम ने एलान किया है कि उनका देश, हुरमुज़ स्ट्रेट में किसी भी गठबंधन में इस्राईल की भागीदारी को विरोध करेगा। इस इन्कार से फार्स की खाड़ी के वह अरब देश संकट में पड़ गये हैं जिन्होंने इस्राईल का स्वागत किया था।
हमें यह नहीं पता कि बारूद के इस ढेर में आग कौन लगाएगा लेकिन हमें यह ज़रूर मालूम है कि ईरान किसी भी दशा में झुकेगा नहीं और अमरीका से इसी तरह लोहा लेता रहेगा जिसके बाद अमरीका के सामने दो ही रास्ते हैं, पहलाः ईरान से प्रतिबंध हटा ले और परमाणु समझौते में वापस लौट जाए। दूसराः युद्ध का रास्ता अपनाए और बारुद के ढेर में आग लगा दे और फिर उसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे। हमें नहीं लगता कि इसके अलावा कोई तीसरा रास्ता भी अमरीका के सामने होगा।
हम दूसरी बार यह कह रहे हैं ईरान, अपना सब कुछ दांव पर लगा कर मैदान में आया है इस लिए वह इराक़ की गलती कभी नहीं दोहराएगा जिसकी वजह से इराकी जनता भुखमरी का शिकार हो गयी थी और फिर शासन भी खत्म हो गया था।