इस्राईल के सैन्य मामलों के विशेषज्ञ व समीक्षा आमूस हारेईल ने ज़ायोनी शासन के राजनैतिक व सुरक्षा सूत्रों के हवाले से लिखा है कि इस्राईल को बरसों से हमास की ओर से ख़तरा लगा हुआ है लेकिन इससे भी बड़ा ख़तरा, फ़ार्स की खाड़ी में ईरान की ओर से अमरीका पर किए जाने वाले हालिया प्रहार से पैदा हो गया है। उन्होंने लिखा है कि अमरीका, फ़ार्स की खाड़ी में गठजोड़ बनाना है, उसमें वास्तविक और गहरे मतभेद पैदा हो चुके हैं और अगर हम अमरीका व ट्रम्प सरकार की स्पष्ट नीति के बारे में बात करना चाहें तो कहना पड़ेगा कि अमरीकी राष्ट्रपति ईरान के बारे में तथ्यात्मक, सही और स्पष्ट रुख़ अपनाए हुए हैं। मई 2018 में परमाणु समझौते से निकलने के बाद उन्होंने ईरान पर कड़े आर्थक प्रतिबंध लगा दिए जिससे उनका उद्देश्य ईरान को वार्ता की मेज़ पर लौटाना और उस पर एक नया परमाणु समझौता थोप देना था जो 2015 के परमाणु समझौते से पूरी तरह भिन्न होता। इस्राईल के इस सैन्य समीक्षक ने लिखा है कि ईरान के निर्णयकर्ता अधिकारी न केवल यह कि अमरीका के दबाव और उसकी धमकियों के सामने नहीं झुके बल्कि उन्होंने इसके ठीक उलट रुख़ अपनाया है जिसके परिणाम अमरीका के हितों पर सीधे हमले के रूप में भी सामने आ सकते हैं।
इस सैन्य टीकाकार का कहना है कि जाॅन बोलटन जैसे ट्रम्प के अत्यंत निकटवर्ती लोगों के बावजूद जो ईरान में सरकार परिवर्तन के इच्छुक हैं, अमरीकी राष्ट्रपति ने इस प्रकार की नीति का विरोध किया है क्योंकि उनका मानना है कि इससे दोनों देशों के बीच सीधा युद्ध शुरू हो सकता है। इसका एक उदाहरण, ईरान द्वारा पिछले महीने अपनी सीमा में घुस आने वाले अमरीकी ड्रोन को मार गिराना है। ट्रम्प ने इतनी बड़ी कार्यवाही के बाद भी ईरान पर सैन्य हमला नहीं किया। अमरीका, एक ओर तो ईरान के संबंध में इस प्रकार का संयम दिखा रहा है और दूसरी ओर वह यमन युद्ध में फंसे हुए सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात का साथ नहीं दे रहा है जिसके कारण इन दोनों देशों ने ईरान के संबंध में अपनी नीतियों में परिवर्तन शुरू कर दिया है। इस संबंध में ईरान और इमारात के बीच सीमावर्ती समझौते की ओर इशारा किया जा सकता है लेकिन इससे भी बड़ा परिवर्तन यह है कि इमारात ने यमन युद्ध से बाहर निकलने का फ़ैसला कर लिया है।
टीकाकारों का कहना है कि युद्ध में संयुक्त अरब इमारात के सहयोग के बिना सऊदी अरब अंसारुल्लाह संगठन से बुरी तरह हार जाएगा और अंसारुल्लाह अपना पूरा ध्यान उत्तरी यमन पर केंद्रित कर देगा जो इस्राईल के लिए बड़ी चिंता का विषय है क्योंकि अगर यह क्षेत्र अंसारुल्लाह के नियंत्रण में आ गया तो ईरान की ओर से ग़ज़्ज़ा पट्टी में हमास के लिए विकसित हथियार भेजना आसान हो जाएगा। इसी तरह ईरानी, अंसारुल्लाह को इस्राईल की जहाज़रानी के लिए ख़तरा बना सकते हैं जिसके चलते बाबुल मंदब में इस्राईली सेना के समुद्री जहाज़ों की गतिविधियां ठप्प हो जाएंगी। इस्राईली सैन्य टीकाकार आमूस हारेईल ने अंत में लिखा है कि संयुक्त अरब इमारात, यमन में युद्ध के मैदान से निकल जाएगा, सऊदी अरब की सभी कोशिशें विफल हो जाएंगी और ईरान को एक बड़ी विजय हासिल होगी। यह ईरान के दुश्मनों के गठजोड़ विशेष कर ट्रम्प व नेतनयाहू के लिए बहुत बुरी ख़बर है जिन्होंने ईरान से लड़ाई की कठिनाइयों का सही अनुमान नहीं लगाया था और समय बीतने के बाद उनके लिए यह बात स्पष्ट हुई कि यह एक अत्यंत जटिल युद्ध है और पराजय उनकी ताक में है।