हैरत न होने की वजह यह है कि यमन से अपने अधिकतर सैनिक वापस बुला लेने के बाद अब सऊदी अरब के पास अधिक विकल्प नहीं बचे हैं। विशेषकर इसलिए भी कि सऊदी अरब के दक्षिणी इलाक़ों के हवाई अड्डों पर यमनी सेना और अंसारुल्लाह आंदोलन के मिसाइल व ड्रोन हमले बहुत तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं। दूसरी बात यह है कि जाज़ान, असीर तथा नजरान जैसे सीमावर्ती राज्यों में यमन की सेना और अंसारुल्लाह के स्वयंसेवी बलों का अनेक इलाक़ों पर क़ब्ज़ा हो चुका है। उधर फ़ार्स खाड़ी में अमरीका और ईरान के टकराव का भी माहौल बना हुआ है।
यमन के दक्षिणी शहर अदन में सऊदी अरब और इमारात के बीच छद्म युद्ध भी छिड़ चुका है दोनों देशों द्वारा समर्थित यमनी गुटों में आपसी लड़ाई भयानक रूप धारण कर चुकी है और इस लड़ाई यमन के अपदस्थ राष्ट्रपति मंसूर हादी का गुट कमज़ोर पड़ रहा है जिसे सऊदी अरब का समर्थन हासिल है।
यमन युद्ध में एक साथ कूद पड़ने वाले सऊदी अरब और इमारात के घटक गुटों में आपसी लड़ाई तब घातक रूप अख़तियार कर गई जब दक्षिणी अंतरिम समिति के उप महासचिव हानी अलब्रेक ने जिन्हें इमारात का समर्थन हासिल है मआशीक़ महल पर हमला करने का फ़ैसला कर लिया। मआशीक़ महल सऊदी अरब द्वारा समर्थित मंसूर हादी के गुट के लोगों का ठिकाना है।
मंसूर हादी ने अदन को अपनी अंतरिम राजधानी बना रखा था जहां अब इमारात तथा सऊदी अरब द्वारा समर्थित गुटों में आपसी युद्ध छिड़ गया है। वर्तमान समय में जब फ़ार्स खाड़ी और हुरमुज़ स्ट्रेट में हालात बहुत संवेदनशील हैं तो अदन में इस स्थिति का उत्पन्न हो जाना सऊदी अरब के लिए बेहद गंभीर चिंता का विषय है।
इस समय सऊदी अरब की सरकार के भीतर इस बारे में अलग अलग विचार पाए जाते हैं कि यमनी सेना और अंसारुल्लाह आंदोलन से वार्ता शुरू की जाए या नहीं और वार्ता शुरू हो तो मिसाइल हमला रोकने और सऊदी अरब के इलाक़ों से पीछे हटने के बदले अंसारुल्लाह आंदोलन को क्या क़ीमत चुकाई जाए।
जहां तक अंसारुल्लाह आंदोलन और यमनी सेना की बात है तो वहां मज़बूत विचार यह है कि सऊदी अरब से इस समय कोई समझौता न किया जाए क्योंकि इमारात के सैनिकों के निकल जाने के बाद सऊदी अरब की स्थिति बहुत कमज़ोर पड़ चुकी है, सऊदी अरब विश्व स्तर पर अलग थलग पड़ गया है। इस समय तो बस हमले जारी रखे जाएं, बाद में अधिक मज़बूत स्थिति में पहुंचकर सऊदी अरब से कोई बात की जाए तथा सऊदी अरब को यमन के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने और यमन में तबाही फैलाने की भरपाई के लिए अधिक से अधिक क़ीमत चुकाने पर मजबूर किया जाए।
कुछ लोग कह रहे हैं कि सऊदी अरब से समन्वय के साथ इमारात ने अपने सैनिक यमन से बाहर निकाले हैं लेकिन इस विचार में कोई दम नहीं है, इस प्रकार के बयान केवल कूटनैतिक झूठी बयानबाज़ी के अलावा कुछ नहीं है। अदन में जारी लड़ाई और वहां से मंसूर हादी के गुट के लोगों को खदेड़ देने के लिए जारी संघर्ष साबित करता है कि सऊदी अरब और इमारात यमन की धरती पर अब घटक के बजाए प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं और प्राक्सी युद्ध में कूद पड़े हैं।
अब अगर सऊदी अरब यमन युद्ध को जारी रखता है तो यह बड़ा कठिन मार्ग होगा और अगर अंसारुल्लाह आंदोलन से वार्ता करनी है तो भारी पैमाने पर हर्जाना अदा करना होगा और कई मोर्चों पर स्ट्रैटेजिक रूप से पीछे हटना पड़ेगा। मगर फिर भी सबसे अच्छा और तर्कसंगत रास्ता यही है कि सऊदी अरब अंसारुल्लाह से वार्ता शुरू कर दे। वैसे आख़िरकार सऊदी अरब को यही रास्ता अपनाना पड़ेगा। इस युद्ध में सऊदी अरब ने जो गठजोड़ बनाया था उस में अब सऊदी अरब अकेला ही बचा है, गठबंधन ध्वस्त हो चुका है तो रियाज़ के पास वार्ता का विकल्प ही शेष रह गया है।
साभार रायुल यौम