इस बात में तो कोई शक नहीं कि अंतरराष्ट्रीय नीतियां, प्रायः गुंडागर्दी और ज़ोर जबरदस्ती पर आधारित होती हैं। यही वजह है कि एक काम किसी विशेष सरकार द्वारा किये जाने की दशा में स्वीकारीय और किसी अन्य सरकार द्वारा वही काम, अस्वीकारीय होता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी इस अन्याय का सब से स्पष्ट उदाहरण, इस्राईल है जिसके पास दसियों परमाणु बम और परमाणु हथियार हैं लेकिन इस्राईल जैसी कानूनो का उल्लंघन करने वाली सरकार के पास मौजूद परमाणु हथियारों के बारे में कोई कुछ नहीं बोलता। इन न बोलने वालों में अरब देश भी शामिल हैं जो इस्राईल के चारों ओर मौजूद हैं और जिन्हें रोकने और जिन पर हमले के लिए ही इस्राईल ने यह परमाणु हथियार बनाए हैं और एक दिन अगर इन हथियारों का इस्राईल इस्तेमाल करेगा तो उन्ही के खिलाफ करेगा लेकिन फिर भी अरबों की ज़बान पर ताला लगा है और यही नहीं बल्कि वह सब इस्राईल की आव भगत में भी लगे नज़र आते हैं लेकिन जब ईरान यूरेनियम के संवर्धन की कोशिश करता है तो पूरी दुनिया की चीख निकल जाती है भले ही यह काम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए और अंतरराष्ट्रीय नियमों के अंतर्गत और कानूनी रूप से ही क्यों न हो।
फिर सब मिल कर ईरान को बांधने की कोशिश करते हैं और फिर ईरान के साथ एक परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर होते हैं जिसके आधार पर ईरान यूरेनियम के संवर्धन की सीमा निर्धारित की जाती है और उसके बदले, ईरान के खिलाफ उन प्रतिबंधों को हटा लिया जाता है जिनको लगाने का कोई कारण नहीं था। मुझे नहीं लगता कि दुनिया में राजनीति की जानकारी रखने वाले किसी व्यक्ति ने ठंडे दिमाग से यह पता लगाने की कोशिश की होगी कि ईरान पर युरोप और अमरीका ने प्रतिबंध क्यों लगा रखे हैं? सब यही सोचते हैं कि यह प्रतिबंध अमरीका और युरोप ने लगाए हैं तो उसकी ठोस वजह भी होगी। अस्ल वजह से किसी को कोई मतलब है। हालांकि इस प्रकार के सभी प्रतिबंधों की वजह इस्राईल और ईरान के मध्य दुश्मनी है। दुनिया हर उस देश के पर प्रतिबंध को सही समझती है जो इस्राईल का दोस्त नहीं और अरबों के खिलाफ उसके अत्याचारों का समर्थन न करता हो।
सब से ज़्यादा हैरत की बात तो यह है कि ईरान के साथ परमाणु समझौते से निकलने वाले ट्रम्प भी ईरान से समझौते का पालन करने की मांग करते हैं हालांकि वह ईरान पर दोबारा प्रतिबंध लगा चुके हैं। उस से अधिक हैरत युरोप पर होती है जिसका कर्तव्य था कि वह इस समझौते की सुरक्षा करे मगर अमरीका आसानी से निकल गया वह अमरीका को तो कुछ कह नहीं रहे और स्वंय भी अपने वादों का पालन नहीं कर रहे मगर ईरान से कह रहे हैं कि वह इस समझौते का पालन करे!
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी गुंडागर्दी और अन्याय का एक अन्य उदाहरण उस वक्त नज़र आता है कि जब ब्रिटिश नौसेना, दो हफ्तों पहले जिब्राल्टर स्ट्रेट से गुज़रते समय एक ईरानी आयल टैंकर पर क़ब्ज़ा कर लेती है। ध्यान रहे कि ईरान ने तत्काल इसका जवाब नहीं दिया बल्कि पहले उसने कूटनैतिक मार्गों से अपने आयल टैंकर को छुड़ाने का पूरा प्रयास किया लेकिन ब्रिटेन ने नहीं छोड़ा। ब्रिटेन की यह दलील है कि यह आयल टैंकर सीरिया के लिए तेल लेकर जा रहा था और सीरिया पर युरोपीय संघ ने प्रतिबंध लगा रखा है तो जब कोई यह पूछता है कि ब्रिटेन का युरोपीय संघ से क्या संबंध? क्या वह युरोपीय संघ से बाहर नहीं हो चुका है? और फिर युरोपीय संघ के प्रतिबंधों का युरोपीय संघ के बाहर के देशों से क्या संबंध? युरोपीय संघ के प्रतिबंध न ईरान पर लागू होते हैं न सीरिया पर बल्कि यह प्रतिबंध युरोपीय संघ के सदस्य देशों के लिए हैं कि वह सीरिया के साथ लेन देन न करें, तो इन सवालों का कोई जवाब नहीं देता लेकिन जब ईरान हुरमुज़ स्ट्रेट में ब्रिटिश आयल टैंकर पर क़ब्ज़ा कर लेता है तो पूरी दुनिया में हंगामा मच जाता है और सब समुद्र में जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही की ज़रूरत पर ज़ोर देते नज़र आते हैं। क्या सुरक्षित आवाजाही केवल अमरीका ब्रिटेन और उनसे संबधिंत देशों के जहाज़ों के लिए ही है? किसी ज़माने में पूरी दुनिया पर राज करने वाले ब्रिटेन का हाल आज क्या हो गया है कि वह इस तरह से आंख बंद करके अमरीका के पीछे पीछे चल रहा है और शांति के इच्छुक युरोप से दूर होता जा रहा है?
सवाल यह है कि ब्रिटेन ने ईरान के आयल टैंकर को पकड़ने की मूर्खता क्यों की? क्या ब्रिटेन और अमरीका यह समझते थे कि ईरान पहले धमकी देगा और फिर संयुक्त राष्ट्र संघ से गुहार लगाने और वहां से ऐसा प्रस्ताव पारित कराने पर संतोष कर लेगा जिसे कभी लागू नहीं किया जाएगा? ब्रिटेन व अमरीका से बड़ी गलती हो गयी है क्योंकि ईरान, कोई अरब देश नहीं है!