समाचारपत्र ने लिखा है कि वाॅशिंग्टन, क्षेत्रीय देशों में अपनी सैन्य छावनियों को मज़बूत बना रहा है, फ़ार्स की खाड़ी के तरटवर्ती अरब देशों को हथियार और सैन्य सिस्टम बेच रहा है और उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित बनाने के बहाने उनके ख़ज़ानों से खरबों डाॅलर दूह रहा है। पत्र ने लिखा है कि क्षेत्र में जारी तनाव की छाया में, विशेष रूप से तेल टैंकरों के रोके जाने और अमरीकी ड्रोन के मार गिराए जाने के बाद सऊदी अधिकारियों ने अधिक बुरी परिस्थितियों के समय अपनी रक्षा पंक्तियों की मज़बूती के लिए दो क़दम उठाए हैं।
- वर्ष 1996 से लेकर अब तक पहली बार उसने 500 अमरीकी सैनिकों को रियाज़ के दक्षिण पूर्व के अलख़र्ज क्षेत्र में स्थित सुलतान बिन अब्दुल अज़ीज़ सैन्य छावनी में तैनात किया है।
- अमरीकी रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा है कि अमरीका में हथियार तैयार करने वाली सबसे बड़ी कंपनी लाॅकहीड मार्टिन ने सऊदी अरब से थाड डिफ़ेंस सिस्टम की बिक्री के लिए डेढ़ अरब डाॅलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस प्रकार सऊदी अरब से उसके समझौतों का मूल्य पांच दशमलव 3 अरब डाॅलर तक पहुंच गया है।
रायुल यौम ने लिखा है कि सऊदी अधिकारियों ने अमरीकी सैनिकों को अपने देश से निकालने के 1996 के फ़ैसले पर पुनर्विचार किया है और यमन व फ़ार्स की खाड़ी की ओर से कथित ख़तरों से सुरक्षा के लिए उन्हें फिर से अपने देश में बुला लिया है। 1996 में सऊदी अरब में एक सैन्य छावनी में हुए आत्मघाती हमले में 19 अमरीकी सैनिक मारे गए थे जिसके बाद रियाज़ ने सभी अमरीकी सैनिकों को उनके देश वापस भेज दिया था। सऊदी अरब की सरकारी समाचार एजेंसी वास ने बताया है कि सऊदी नरेश शाह सलमान ने देश की रक्षा का स्तर ऊंचा उठाने के लिए सऊदी अरब में अमरीका की सैन्य उपस्थिति पर सहमति जताई है। कुछ सूत्रों का कहना है कि वाॅशिंग्टन की इच्छा पर ही अमरीकी सैनिक सऊदी अरब में तैनात हुए हैं। तैय यह था कि अमरीका इस तैनाती का ख़र्चा सहन करेगा लेकिन अरब देशों को दूहने की डोनल्ड ट्रम्प की इच्छा के चलते उन्होंने कहा कि रियाज़ इन अमरीकी सैनिकों का ख़र्चा सहन करेगा।
रायुल यौम ने लिखा है कि रियाज़ को इन सैनिकों का ख़र्चा सीधे सीधे प्रदान नहीं करना होगा बल्कि वह परोक्ष रूप से और हथियारों के समझौतों की शक्ल में यह ख़र्चा अदा करेगा। अलबत्ता सऊदी अरब की ओर से थाड एंटी मीज़ाइल सिस्टम की ख़रीदारी पर ध्यान दिया जाए तो इसका अर्थ यह है कि पेट्रियट मीज़ाइल सिस्टम सफल नहीं था और यमनियों के मीज़ाइलों को रोकने में अक्षम इस सिस्टम की ख़रीदारी पर ख़र्च होने वाले सऊदी अरब के अरबों डाॅलर व्यर्थ हो गए हैं। यमन के मीज़ाइल सऊदी अरब के रडारों और मीज़ाइल डिफ़ेंस सिस्टम को भेद कर अपने लक्ष्यों तक पहुंच रहे हैं और उन्होंने कई बार दक्षिणी सऊदी अरब के जीज़ान, नजरान और अबहा हवाई अड्डों की उड़ानों को रुकवा दिया है। यही कारण है कि सऊदी अरब ने अमरीका के पेट्रियट मीज़ाइल सिस्टमों और रडारों को अलग रख दिया है जबकि तुर्की जैसे देशों ने रूस से एस-400 जैसे सिस्टम ख़रीद लिए हैं।
रायुल यौम लिखता है कि कुछ टीकाकारों का मानना है कि अमरीका के इन सैनिकों को सऊदी अरब भेजने का उद्देश्य सऊदी सैनिकों का प्रशिक्षण और उन्हें थाड मीज़ाइल इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग देना है। अलबत्ता एक अन्य बिंदु है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती और वह यह है कि अलख़र्ज के क्षेत्र में सुलतान बिन अब्दुल अज़ीज़ सैन्य छावनी में अमरीकी सैनिकों की उपस्थिति, बहरैन, क़तर, कुवैत, संयुक्त अरब इमारात और ओमान में अमरीकी सैन्य छावनियों की तरह ही ईरान की जवाबी कार्यवाही का निशाना बन सकती है। अंत में सबसे अहम सवाल यह है कि क्या फ़ार्स की खाड़ी के तटवर्ती सभी अरब देशों में स्थित पश्चिमी देशों की सैन्य छावनियां इन देशों की सुरक्षा को सुनिश्चित बना सकी हैं?