हालांकि यूएई के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस पर किसी तरह की कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है।
यहां निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि 2015 में शुरू होने वाला यह लम्बा युद्ध अब अबू धाबी और रियाज़ के लिए भारी पड़ रहा है, लेकिन इस युद्ध में हार के परिणामों से बचने के लिए हमलावर शक्तियां इसे और लम्बा खींच रही हैं।
युद्ध छेड़ते वक़्त हमलावर देशों ने जिन लक्ष्यों की घोषणा की थी, पिछले चार साल के दौरान बड़े पैमाने पर भारी जानी व माली नुक़सान के बावजूद उसके विपरीत परिणाम सामने आए हैं।
यूएई ने ख़ुद को सऊदी अरब के साथ एकजुटता दिखाते हुए इस युद्ध में झोंक दिया था, इन देशों को विश्वास था कि यमन जैसे निर्धन देश के मुक़ाबले में वह जल्दी ही जीत दर्ज कर लेंगे।
अमरीका और यूरोप के आधुनिक हथियारों के सहारे युद्ध छेड़ने वाले आक्रमणकारी देशों ने ज़मीनी सच्चाई और युद्ध के लम्बा खिंचने के स्थिति में शक्ति के संतुलन में परिवर्तन का कोई आंकलन नहीं किया था।
इस दौरान यमनी सेना और स्वयं सेवी बलों ने अपनी रक्षात्मक शक्ति में कहीं अधिक वृद्धि करके न केवल हमलावर देशों बल्कि पूरी दुनिया को चौंका दिया है।
अब स्थिति यह है कि सऊदी अरब इस युद्ध से फ़रार का रास्ता खोज रहा है तो वहीं यूएई ने
अपने लड़ाकू विमानों, टैंकों और सैन्य हेलीकाप्टरों के एक बड़े हिस्से को धीरे-धीरे और बिना किसी शोर-शराबे के युद्ध से निकालना शुरू कर दिया है।
यूएई के इस युद्ध से फ़रार करने के कई कारण हैः
पहला: यमनी सेना और अंसारुल्लाह आंदोलन ने सऊदी अरब के हवाई अड्डों और सीमा से 850 किलोमीटर भीतर तेल पाइपलाईन पर बमबारी करके यह संदेश दे दिया कि उनका अगला लक्ष्य यूएई के हवाई अड्डे और रणनीतिक ठिकानें होंगे।
दूसरा: अंसारुल्लाह और उसके सहयोगियों की बढ़ती ताक़त और हथियारों की उन्नती विशेष रूप से उनके मिसाइलों और ड्रोन विमानों की सफलता ने आक्रमणकारी सैन्य गठबंधन के हवाई हमलों को पूरी तरह से प्रभावहीन कर दिया।
तीसराः यमन ने सऊदी अरब और यूएई में 300 से अधिक लक्ष्यों को निशाना बनाने की घोषणा कर दी। हमलावर गठबंधन देशों ने ज़मीन और वायु रक्षा के लिए अरबों डॉलर ख़र्च किए। अरबों डॉलर के हथियारों के समझौते करके पैट्रियट रक्षा प्रणाली ख़रीदी, लेकिन अंसारुल्लाह आंदोलन के मिसाइलों के मुक़ाबले में यह असहाय है।