चीन और रूस के मध्य एक व्यापारिक समझौता हुआ है जिसके अंतर्गत दोनों देश अमेरिकी डॉलर में व्यापारिक लेन- देन नहीं करेंगे।
चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग ने कहा कि रूस और चीन के बीच होने वाले समझौते के अनुसार दोनों देश अमेरिकी डालर में व्यापार के बजाये अपनी राष्ट्रीय मुद्रा में व्यापार करेंगे।
यह समझौता चीन के राष्ट्रपति की रूस यात्रा के दौरान हुआ और इस समझौते को अमेरिकी डालर के मुकाबले में दोनों देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं को मज़बूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम समझा जा रहा है।
कुछ मामलों को लेकर रूस और चीन दोनों के अमेरिका के साथ गंभीर मतभेद व तनाव हैं और दोनों देशों ने यह व्यापारिक समझौता करके वाइट हाउस के दबाव के एक भाग को सीमित कर दिया है।
रोचक बात है कि वर्ष 2014 से रूस को पश्चिम के दबाव का सामना है उस समय से रूस चीन की राष्ट्रीय मुद्रा को अपना विदेशी मुद्रा भंडार बनाने के प्रयास में है।
रूसी सेन्ट्रल बैंक के प्रमुख इस बारे में कहते हैं" अंतरराष्ट्रीय लेन -देने में अमेरिकी डालर को समाप्त करने की रूस की नीति, इस देश को विदेशी और आर्थिक नीतियों के खतरों से बचायेगी।"
इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि रूस और चीन द्विपक्षीय व्यापारों में अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं के प्रयोग के साथ यूरोपीय मुद्रा यूरो का भी प्रयोग करते हैं।
अर्थशास्त्री मेहरदाद एमादी कहते हैं" दुनिया के विभिन्न देशों द्वारा यूरो को अपनी विदेशी मुद्रा भंडार बनाया जाना और डालर की मांग का कम हो जाने का परिणाम यह निकलेगा कि डालर का मूल्य खुद ब खुद कम हो जायेगा।
अलबत्ता केवल रूस और चीन नहीं हैं जिन्होंने अपने द्विपक्षीय व्यापारिक लेन- देन से अमेरिकी डालर को खत्म किया है बल्कि दुनिया के विभिन्न देश हैं जिन्होंने डालर में व्यापारिक लेन- देन को समाप्त कर दिया है जिससे डालर का मूल्य व महत्व कम हो गया है।
हालिया महीनों में तुर्की और मलेशिया भी उन देशों की सूची में शामिल हो गये हैं जिन्होंने डालर में व्यापारिक लेन- देन को खत्म कर दिया है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने घोषणा की है कि दुनिया के विभिन्न देश जो डालर में अपना विदेशी मुद्रा भंडार रखते थे उसमें 2018 की पहली तिमाही में कमी आ गयी है और विभिन्न देशों में यूरो, यूआन और पाउंड को अपना विदेशी मुद्रा भंडार बनाने के रुझान में वृद्धि हुई है।
बहरहाल जानकार हल्कों का मानना है कि अगर अमेरिकी डालर को व्यापारिक लेन- देन से समाप्त करने की प्रक्रिया जारी रहती है तो विभिन्न देशों पर राजनीतिक और आर्थिक दबाव डालने का एक अमेरिकी हथकंडे का अंत हो जायेगा।