3 जून 2019 - 05:44
भेदभाव का शिकार हुई डॉ. पायल सलमान तड़वी की जान बच सकती थी, एम्स के प्रोफ़ेसर एलआर मुर्मु

उच्च शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव पर चर्चा के लिए दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया है।

(ABNA24.com) उच्च शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव पर चर्चा के लिए दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया है।

इस कार्यक्रम में एम्स की महिला डॉक्टरों ने भेदभाव और प्रताड़ना के अपने अनुभव साझा किए और इस भेदभाव को रोकने पर विचार विमर्श किया गया।

एम्स के प्रोफ़ेसर एलआर मुर्मु का कहना था कि यह कार्यक्रम 13 मई को आयोजित होना था, अगर यह उसी दिन आयोजित किया जाता तो शायद भेदभाव का शिकार होकर अपनी जान दे देने वाली पायल सलमान

तड़वी तक यह संदेश ज़रूर पहुंच जाता और संभव है कि वह आत्महत्या नहीं करतीं।

ग़ौरतलब है कि यह कार्यक्रम मुंबई के टीएन टोपीवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज की 26 वर्षीय छात्रा डॉक्टर पायल सलमान तड़वी की मौत के बाद आयोजित किया गया है।

तड़वी ने अपने सीनियर डॉक्टरों द्वारा प्रताड़ित किए जाने के बाद आत्महत्या कर ली थी।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ‘एम्स फ्रंट फ़ॉर सोशल कॉन्शियसनेस’ द्वारा शुक्रवार को आयोजित इस कार्यक्रम में शिक्षाविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ अपना अनुभव साझा करते हुए उन्होंने उन घटनाओं का ज़िक्र किया जहां पर उन्हें अपने सीनियरों से भेदभाव का सामना करना पड़ा।

एम्स की एक महिला डॉक्टर का कहना था कि विभागाध्यक्ष ने मुझे कई बार परेशान किया लेकिन कभी मैंने हिम्मत नहीं हारी। जितनी बार भी उन्होंने मुझे पीछे धकेलने की कोशिश की उतनी बार मैं और भी हिम्मत के साथ आगे बढ़ती गई। आपको लगातार लड़ना पड़ेगा। वर्षों तक भेदभाव के बावजूद मैं आज यहां खड़ी हूं और आगे भी ऐसा करती रहूंगी।

हालांकि एम्स के प्रशासन ने ऐसी किसी घटना की जानकारी होने से इनकार कर दिया।

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए एम्स के रजिस्ट्रार संजीव लालवानी ने कहा, ‘मुझे ऐसी किसी घटना की जानकारी नहीं है। एम्स में हमारे पास ऐसी कई समितियां हैं जो ऐसे मामलों को देखती हैं। उनकी सिफारिशों के आधार पर फैसले लिए जाते हैं।

इस कार्यक्रम में अन्य मेडिकल और शैक्षणिक संस्थानों के लोगों ने भी अपने ऐसे अनुभवों को साझा किया। विशेषज्ञों ने देश की शिक्षा प्रणाली पर भी सवाल उठाया।

हिंदू कॉलेज के प्रोफेसर डॉ रतन लाल ने कहा, ‘रोहित वेमुला से शुरू हुआ अभियान डॉ पायल तड़वी तक पहुंच चुका है। यह एक घटना नहीं बल्कि एक संकेत है। ऐसी घटनाएं हमें एक संस्थानिक संकट की ओर लेकर जा रही हैं। आईआईटी और एम्स जैसे संस्थानों में काम करने वाले लोग लैब में तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं, लेकिन अपनी निजी ज़िंदगी में रूढ़िवादी होते हैं।

13 मई को आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम को तब टाल दिया गया था, जब अस्पताल प्रशासन ने इसे मंज़ूरी देने के लिए कुछ शर्तें रख दी थीं।

प्रोफेसर मुर्मु का कहना था कि अगर यह कार्यक्रम अपने निर्धारित समय पर आयोजित किया जाता तो शायद यह संदेश पायल तक पहुंच जाता। तब शायद वे अपना फैसला बदल देतीं। उन्हें सिस्टम ने निराश किया। संविधान, क़ानून और प्रशासन तब विफल हो गए जब उसे इसकी सबसे अधिक आवश्यकता थी। ऐसा लगता है कि संविधान कुछ लोगों के लिए है ही नहीं।




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