1 जून 2019 - 08:06
ट्रम्प और उनके दामाद को ज़ोरदार तमांचा, क्या बड़े गुरु नेतेन्याहू के साथ ही सेंचुरी डील भी धराशायी हो गयी? अब्दुल बारी अतवान का

इस्राईल में सरकार बनाने में नेतेन्याहू की नाकामी का अब्दुलबारी अतवान ने विभिन्न आयामों से जायज़ा लिया है।

(ABNA24.com) पिछले दिनों जब नयी सरकार के गठन में नेतेन्याहू की नाकामी के बाद इस्राईली संसद ने फिर से चुनाव आयोजित कराने की घोषणा की तो इसे ट्रम्प और उनके दामाद, जे. कुशनर के मुंह पर ज़ोरदार तमांचा कहा गया।

    इन दोनों का एसा तमांचा लगा है जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी क्योंकि जिस तरह अपमानित होकर और कमज़ोरी के साथ नेतेन्याहू को विफलता मिली है उससे क मध्य पूर्व में कई साज़िशों की नाकामी निश्चित हो गयी है क्योंकि, " द डील आफ सेंचुरी" और ईरान के खिलाफ युद्ध जैसे कई मामलों में नेतेन्याहू मुख्य भूमिका के स्वामी थे और इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, चुनाव में विजय के लिए उन्हें बहुत अधिक मेहनत की थी।

    यह सही है कि अमरीकी सरकार ने घोषणा की है कि मनामा सम्मेलन अपने निर्धारित समय पर होगा जिसकी अध्यक्षता जे.कुशनर करेंगे। यह सम्मेलन 25-26 जून को होने वाला है और इसमें सेंचुरी डील के आर्थिक आयामों का एलान होने वाला है लेकिन यह भी एक तथ्य है कि अब इस डील को आगे बढ़ाने के लिए नेतेन्याहू की शक्ति क्षीण पड़ चुकी है और अब उनके लिए इस डील पर दसियों अरब डालर खर्च करने के लिए अरबों को तैयार करना भी कठिन हो गया है।

    हमें अच्छी तरह से मालूम है कि सेंचुरी डील की सफलता की पहले भी बहुत कम संभावना भी क्योंकि फिलिस्तीनी गुटों ने एकमत होकर इस डील को अस्वीकार कर दिया है लेकिन कुछ अरब नेताओं के निकट मित्र और मज़बूत नेता समझे जाने वाले नेतेन्याहू के दांत और नाखून झड़ चुके हैं।

    नेतेन्याहू की नाकामी में चरमंथी लीडर लेबरमैन का बड़ा हाथ रहा है जो गठबंधन के लिए अपनी किसी भी मांग से पीछे हटने पर तैयार नहीं हुए। उनकी मांग थी कि फिलिस्तीनी बंदियों को मृत्यु दंड दिये जाने का कानून बनाया जाए, चरमपंथी यहूदी धर्मगुरुओं के लिए भी सेना में अनिवार्य सेवा, ज़रूरी की जाए, खान अहमद से अरब निवासियों को बाहर निकाल दिया जाए तथा हमास और अन्य फिलिस्तीनियों के निशस्त्रीकरण के लिए गज़्ज़ा पर हमला किया जाए। वह अपनी एक मांग से भी पीछे हटने पर तैयार नहीं थे और इस तरह वह " किंग मेकर" से " किंग किलर" बन गये।

    ट्रम्प का इस्राईली साम्राज्य, नेतेन्याहू के घमंड की ही तरह चूर चूर हो रहा है और स्वंय इस्राईल में एक बड़ा संकट पैदा हो गया है अलबत्ता हमें यह भी पता है कि आज इस्राईल की जो दशा है उसकी फिलिस्तीनी संघर्षकर्ताओं और उनकी राकेटों की भी प्रभावशाली भूमिका रही है विशेषकर इस लिए भी कि पिछली झड़प में फिलिस्तीनियों के राकेट, तेलअबीब तक पहुंच गये थे।

     " द डील आफ द सेंचुरी " लहुलुहान है और नेतेन्याहू पर भरोसा करने वाले अरब नेता, उदास हैं और अब अपनी योजनाओं की विफलता का शोक मनाने की तैयारी कर रहे हैं। इन अरब नेताओं का पतन भी निकट ही है। (Q.A.) साभार, अब्दुल बारी अतवान, रायुल यौम




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