उन्होंने इस दिन के बारे मे कहा था। क़ुद्स दिवस केवल फ़िलिस्तीन का दिन नहीं है बल्कि यह वह दिन है जब बड़ी शक्तियों को यह समझा दिया जाना चाहिए कि अब वे इस्लामी देशों में पैर नहीं पसार सकतीं। क़ुद्स दिवस वह दिन है जब हमें सभी बड़ी शक्तियों को यह चेतावनी दे देनी चाहिए कि अब इस्लाम तुम्हारे चंगुल में नहीं रहेगा और क़ुद्स दिवस इस्लाम के जीवन का दिन है। श्रोताओ इस कार्यक्रम में हम बैतुल मुक़द्दस और विश्व क़ुद्स दिवस के महत्व और इसी तरह इस संबंध में रचे जाने वाले षड्यंत्रों के बारे में बात करेंगे, हमारे साथ रहें।
विश्व क़ुद्स दिवस इस बात का उचित अवसर है कि सभी मुसलमान और स्वतंत्राप्रेमी फ़िलिस्तीन समस्या के बारे में, इस्राईल के अत्याचारों के बारे में फ़िलिस्तीनियों पर ज़ायोनियों द्वारा तोड़े जा रहे अत्याचार के पहाड़ों के बारे में एक बार फिर विचार करें। इमाम ख़ुमैनी के संदेश और विचार यह दर्शाते हैं कि बैतुल मुक़द्दस और फ़िलिस्तीन का मामला, कुछ अरब देशों का नहीं बल्कि पूरे इस्लामी जगत की सबसे बड़ी समस्या है और इस्लामी जगत को इस निर्णायक मामले में एकजुट रहना चाहिए। विश्व क़ुद्स दिवस ने अतिग्रहणकारी और अपराधी ज़ायोनियों के मुक़ाबले में फ़िलिस्तीनी जनता की मज़लूमियत को उजागर किया और आज स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के इसी क़दम के कारण पश्चिमी एशिया से लेकर अमरीका व अफ़्रीक़ा के कोने कोने से फ़िलिस्तीनी जनता और बैतुल मुक़द्दस के समर्थन में आवाज़ें उठ रही हैं।
फ़िलिस्तीन समस्या पर ध्यान देने के कारण आम जनमत और विभिन्न बुद्धिजीवियों ने इमाम ख़ुमैनी की सराहना की है और आज उनके नाम और फ़िलिस्तीन समस्या में चोली दामन का साथ है। जो भी जहां भी फ़िलिस्तीन समस्या का नाम लेगा वह इस मामले को जीवित रखने में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के प्रयासों का ज़रूर उल्लेख करेगा। इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद फ़िलिस्तीन पर लोगों का ध्यान बढ़ने लगा और पूरे संसार के लोगों का ध्यान इमाम ख़ुमैनी के अमर विचारों के चलते फ़िलिस्तीन की अतिग्रहित धरती में जारी स्थिति की ओर आकृष्ट हुआ और उन्हें पता चला कि फ़िलिस्तीनियों पर किस प्रकार के अत्याचार किए जा रहे हैं।
इस साल विश्व क़ुद्स दिवस ऐसी स्थिति में मनाया जा रहा है कि फ़िलिस्तीन और विशेष रूप से ग़ज़्ज़ा की जनता के ख़िलाफ़ ज़ायोनी शासन के अत्याचार कई गुना बढ़ चुके हैं। इस्राईल, अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प और कुछ अरब देशों की मदद से अंतर्राष्ट्रीय नियमों यहां तक कि सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का खुले आम उल्लंघन कर रहा है और फ़िलिस्तीनियों पर हमले करने में उसे कोई संकोच नहीं है। बमबारी, मिसाइल हमले और प्रदर्शनकारियों पर फ़ायरिंग की घटनाएं लगातार हो रही हैं। कुछ सप्ताह पहले ही इस्राईल ने ग़ज़्ज़ा पर पाश्विक हमले किए थे लेकिन फ़िलिस्तीन के संघर्षकर्ता गुटों की ओर से उसके हमलों का भरपूर जवाब दिए जाने के कारण वह जल्द ही संघर्ष विराम के लिए विवश हो गया।
फ़िलिस्तीन की वर्तमान स्थिति इस बात की सूचक है कि फ़िलिस्तीनी काफ़ी मज़बूत हो चुके हैं और वे अधिक एकजुटता के साथ और प्रतिरोध के मार्ग पर चल कर इस्लाम के दुश्मनों की साज़िशों को नाकाम बना सकते हैं। फ़िलिस्तीन समस्या के समाधान के लिए विभिन्न योजनाएं पेश की जा चुकी हैं लेकिन उनमें से कोई भी फ़िलिस्तीनियों के संपूर्ण अधिकारों को बहाल नहीं कर सकी है। कथित शांति वार्ता भी एक चाल है ताकि उसे लम्बे समय तक खींच कर फ़िलिस्तीनी जनता को ज़ायोनी शासन के मुक़ाबले में प्रतिरोध से दूर किया जा सके जबकि वास्तविकता यह है कि प्रतिरोध और इंतेफ़ाज़ा से ही फ़िलिस्तीन समस्या का समाधान किया जा सकता है। वर्ष 2000 के इंतेफ़ाज़ा आंदोलन और फिर पत्थर के इंतेफ़ाज़ा आंदोलन के सहारे इस समय क़ुद्स के इंतेफ़ाज़ा आंदोलन ने फ़िलिस्तीन के समीकरणों को बदल दिया है और अगर इस मार्ग को जारी रखा गया तो फ़िलिस्तीनी अपने सभी अधिकार प्राप्त कर लेंगे।
इस साल का विश्व क़ुद्स दिवस इस लिए भी बहुत अहम हो गया है कि अमरीकी सरकार ने, फ़िलिस्तीन समस्या के हल के लिए डील आफ़ द सेंचुरी के नाम से एक गहरा षड्यंत्र रचा है। इसी षड्यंत्र के अंतर्गत अमरीका ने पहले तो बैतुल मुक़द्दस को इस्राईल की राजधानी के रूप में औपचारिक रूप से स्वीकार किया और अपना दूतावास तेल अवीव से बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित करने की घोषणा की और फिर उसने गोलान हाइट्स को भी इस्राईली क्षेत्रों के रूप में स्वीकार कर लिया है। इस पूरे प्रकरण में सऊदी अरब, संयुक्त अरब इमारात और कुछ अन्य अरब देशों की भूमिका अत्यंत निंदनीय है। वे इस्लामी जगत की सबसे बड़ी समस्या के रूप में फ़िलिस्तीन समस्या को विश्व मंच पर उठाने के बजाए फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ अमरीका व इस्राईल से हाथ मिला चुके हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में डील आफ़ द सेंचुरी को लागू करने के पहले क़दम के रूप में आयोजित होने वाली कान्फ़्रेंस अमरीका या इस्राईल में नहीं बल्कि बहरैन में आयोजित होने वाली है।
लेबनान के हिज़्बुल्लाह संगठन के प्रमुख सैयद हसन नसरुल्लाह ने अमरीका द्वारा बैतुल मुक़द्दस को ज़ायोनी शासन की राजधानी के रूप में स्वीकार किए जाने की घोषणा पर अपने एक भाषण में प्रतिक्रिया स्वरूप इस मामले में कुछ अरब देशों की विध्वंसक भूमिका की निंदा की थी और कहा था कि अमरीका के लिए इस्राईल से बढ़ कर कोई भी नहीं है। अरब व मुस्लिम घटकों का महत्व ट्रम्प की दृष्टि में कितना है? कुछ भी नहीं, अमरीका, इस्राईल और उसके हितों की रक्षा के अलावा किसी भी चीज़ को महत्व नहीं देता। हसन नसरुल्लाह के शब्दों में आज बालफ़ोर घोषणापत्र को जारी होने के 100 साल बाद उसका दूसरा संस्करण सामने आ रहा है।
वास्तव में ज़ायोनी दसियों साल से जो चीज़ चाह रहे थे उसे ट्रम्प ने एक ही क्षण में कर दिया और यह बहुत बड़ा ख़तरा है। ट्रम्प ने वास्तव में कथित शांति वार्ता का गला घोंट दिया है क्योंकि जब फ़िलिस्तीन का दिल और उसकी अस्ली पहचान यानी बैतुल मुक़द्दस ही निकल जाएगा तो फ़िलिस्तीन बचेगा ही नहीं। इस आधार पर बैतुल मुक़द्दस का मामला ज़मीन हड़पने से कहीं अधिक अहम है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि फ़िलिस्तीन के पीड़ित राष्ट्र को इस बड़े अत्याचार से मुक्ति दिलाना एक मानवीय, धार्मिक व नैतिक दायित्व है और विश्व समुदाय के सदस्यों के रूप में सभी मानव समाजों की ज़िम्मेदारी है कि इस संबंध में क़दम उठाएं। अपने भविष्य निर्धारण का अधिकार, विश्व स्तर पर स्वीकृत अधिकारों में से है जिस पर राष्ट्र संघ के घोषणापत्र में भी बल दिया गया है। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने वर्ष 2000 में फ़िलिस्तीन के भविष्य निर्धारण के लिए जनमत संग्रह का प्रस्ताव दिया था।
आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने एक न्यायपूर्ण, क़ानूनी और मानवीय प्रस्ताव के रूप में सभी स्वीकार्य अंतर्राष्ट्रीय सिद्धांतों विशेष कर संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणापत्र के अनुसार फ़िलिस्तीन के भविष्य निर्धारण के लिए जनमत संग्रह का प्रस्ताव पेश किया था। उन्होंने इस प्रस्ताव के बारे में कई बार कहा है कि फ़िलिस्तीन समस्या के समाधान का एकमात्र रास्ता यह है कि अतिग्रहणकारी पलायनकर्ता नहीं बल्कि फ़िलिस्तीन के वास्तविक नागरिक, चाहे वे फ़िलिस्तीन के अंदर हों या बाहर, ईसाई हों, यहूदी हों या मुसलमान, अपने देश के भविष्य का निर्धारण करें।
वरिष्ठ नेता ने अपने प्रस्ताव में कहा था कि अगर किसी राष्ट्र के मतों पर भरोसा करना, दुनिया में प्रजातंत्र के दावेदारों की नज़र में सही बात है तो फिर फ़िलिस्तीनी राष्ट्र भी एक राष्ट्र है और उसे अपने भविष्य के बारे में फ़ैसला करने देना चाहिए। आज फ़िलिस्तीन में जो अतिग्रहणकारी सरकार है उसका इस धरती पर कोई हक़ ही नहीं है, वह ग़ैर क़ानूनी, झूठी और अत्याचारी शक्तियों द्वारा बनाई गई सरकार है। अतः किसी को भी फ़िलिस्तीनी जनता से यह नहीं कहना चाहिए कि वह इस सरकार को औपचारिक रूप से स्वीकार कर ले।
फ़िलिस्तीन के मामलों के विशेषज्ञ मजीद सफ़ा ताज डील आफ़ द सेंचुरी की योजना के पीछे अमरीका के लक्ष्यों की समीक्षा करते हुए कहते हैं। यह योजना इस्राईल और फ़िलिस्तीनियों के बीच पिछले सत्तर साल से जारी टकराव को समाप्त करने के लिए पेश की गई है लेकिन इसके सभी बिंदु और अनुच्छेद इस्राईल के पक्ष में हैं। यहां तक कि इस योजना की विषय वस्तु के बारे में जो अनुमान लगाए गए हैं उनके अनुसार बैतुल मुक़द्दस का पूर्वी भाग ज़ायोनी शासन को दे दिया जाएगा और फ़िलिस्तीनियों को अपने देश के गठन की जो अनुमति दी जाएगी वह भी तेल अवीव के राजनैतिक परिप्रेक्ष्यों के अंतर्गत ही दी जाएगी। एक अन्य बिंदु यह है कि इस्राईल इस बात की कोशिश कर रहा है कि डील आफ़ द सेंचुरी के माध्यम से फ़िलिस्तीनियों के स्वदेश वापसी के अधिकार को समाप्त कर दे। सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात इसी बात को व्यवहारिक बनाने की चेष्टा में हैं।
यद्यपि इस समय प्रतिरोध के मोर्चे और इस्लामी चेतना की लहर ने इस्लाम के शत्रुओं की भूमिका को विस्तृत होने से रोक दिया है और उनकी अनेक विभाजनकारी साज़िशों को विफल बना दिया है लेकिन इस चाल को गंभीरता से लेना चाहिए। इस मामले में स्वयं ट्रम्प का आगे बढ़ना दर्शाता है कि अंतर्राष्ट्रीय ज़ायोनिज़्म फ़िलिस्तीन की भूमि और बैतुल मुक़द्दस की इस्लामी पहचान मिटाने पर विशेष ध्यान दे रहा है। राजनैतिक टीकाकार ख़य्याम ज़ोबी कहते हैं कि यद्यपि अरब जगत के दुश्मन, फ़िलिस्तीन समस्या को लोगों के मन से मिटा देना चाहते हैं लेकिन वे ऐसा कर नहीं पाएंगे क्योंकि यह एक ऐतिहासिक अधिकार का मामला है। बैतुल मुक़द्दस मुसलमानों के पहले क़िब्ले और फ़िलिस्तीनी जनता के सम्मान के रूप में बाक़ी रहेगा।