ईरान के उपविदेशमंत्री सैयद अब्बास इराक़ची फार्स खाड़ी के अरब देशों की यात्रा के आरंभिक चरण में सबसे पहले ओमान पहुंचे। सैयद अब्बास इराकची ओमान के बाद कुवैत पहुंचे जहां उन्होंने अपने कुवैती समकक्ष से भेंटवार्ता की।
इसी प्रकार उन्होंने कुवैत के उप प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री शैख सबाह खालिद अलहम्द आले सबाह से भेंट में फार्स की खाड़ी के महत्वपूर्ण क्षेत्र में शांति व सुरक्षा स्थापित करने में ईरान की नीति की ओर संकेत किया और बल देकर कहा कि सुरक्षा का एक ऐसा अर्थ है जिसे अलग नहीं किया जा सकता और इसमें राजनीतिक और आर्थिक दोनों क्षेत्र शामिल हैं।
क्षेत्र के संबंध में इस्लामी गणतंत्र ईरान की विदेश नीति की दो विशेषताएं हैं। पहली विशेषता यह है कि वह समस्याओं व कठिनाइयों के समाधान के लिए क्षेत्रीय देशों के साथ वार्ता का पक्षधर है और उसका मानना है कि क्षेत्रीय देशों के साथ वार्ता करके समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।
ईरान की विदेश नीति की दूसरी विशेषता चुनौतियों को सहकारिता के अवसर में बदल देना है। सुरक्षा ऐसी चीज़ नहीं है जिसे दूसरे देशों का आह्वान करके प्राप्त किया जा सकता है बल्कि उसे परस्पर विश्वास और क्षेत्र के अंदर मौजूद संभावनाओं का प्रयोग करके प्राप्त किया जा सकता है।
इन्हीं बातों को आधार बनाकर ईरान फार्स की खाड़ी के समस्त देशों के साथ संबंध विस्तार के लिए पूर्णरूप से तैयार है। यही नहीं इस्लामी गणतंत्र ईरान ने समस्त क्षेत्रों में उच्च संयम का परिचय दिया है और उप विदेशमंत्री सैयद अब्बास इराक़ची की हालिया यात्रा को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।
ईरान के अनुसार क्षेत्र में जो तनाव है वह अमेरिकी नीतियों का परिणाम है और क्षेत्र के समस्त देशों के लिए हानिकारक है और अब तक क्षेत्र और क्षेत्र से बाहर के देशों पर उसके विभिन्न नकारात्मक प्रभाव पड़ चुके हैं।
यह प्रक्रिया ऐसी स्थिति में जारी है जब निष्पक्ष व स्वतंत्र टीकाकार यहां तक संयुक्त राष्ट्र संघ भी क्षेत्र में ईरान की उपस्थिति को कठिनाइयों को कम करने और शांति व सुरक्षा को मजबूत करने में प्रभावी समझते हैं और सीरिया एवं इराक में ईरान की रचनात्मक भूमिका को नमूने के तौर पर देखा जा सकता है।
बहरहाल ईरान के विदेशमंत्री ने बारमबार बल देकर कहा है कि तेहरान पड़ोसी देशों के साथ वार्ता का इच्छुक है। इसी प्रकार उन्होंने कहा है कि जो भी ईरान से युद्ध करना चाहता है उसे स्वयं उसके दुष्परिणामों को भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिये और हम तथा अरब इसके ख़तरनाक परिणामों से दूर रह सकते हैं।