18 मई 2019 - 13:58
ईरान से संपर्क लाइन बनाने की कोशिश, ट्रम्प चौंकाने वाले और क्या क़दम उठाना चाहते हैं? अमरीका ने स्वीज़रलैंड को क़तर पर प्राथमिकत

इलाक़े में जंग की उन्मादी बातें कुछ ठंडी पड़ी हैं। अमरीका, ईरान तथा फ़ार्स खाड़ी के देशों ने बड़े युद्ध की संभावना से इंकार किया है लेकिन यह भी सच्चाई है कि ख़तरा टला नहीं है बल्कि यह आशंका बनी हुई है कि जिस तरह इमारात की अलफ़ुजैरा बंदरगाह पर तेल टैंकरों पर हमला हुआ या जिस तरह क हमला सऊदी अरब के भीतर तेल प्रतिष्ठानों पर हुआ, वैसा हमला फिर हो जाए।

ईरान के रिवोलुश्नरी गार्ड कार्प की अलक़ुद्स फ़ोर्स के कमांडर जनरल क़ासिम सुलैमानी इन दिनों अलग अलग मोर्चों के दौरे कर रहे हैं और उन्होंने घटकों से मुलाक़ातें तेज़ कर दी हैं।

दूसरी तरफ़ तेहरान और वाशिंग्टन के बीच मध्यस्थता के प्रयास भी शुरू हो गए हैं। एक कोशिश क़तर ने शुरू की और ऐसा लगता है कि क़तर ने वाशिंग्टन से इशारा मिलने के बाद ही और इसी कोशिश के तहत क़तर के विदेश मंत्री ने तेहरान का तत्काल गुप्त दौरा किया जैसा की मीडिया में इस बारे में कुछ रिपोर्टें भी आईं।

क़तर तो मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए पूरी जान लगाए हुए है क्योंकि यदि क़तर की कोशिशों के नतीजे में ईरान और अमरीका के बीच कोई समझौता हो जाता है तो यह फ़ार्स खाड़ी के क्षेत्र में क़तर के कट्टर प्रतिद्वंद्वियों के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा होगा जो ट्रम्प को ईरान से टकराव की दिशा में ढकेल रहे हैं। एक कारण यह भी है कि क़तर के ईरान से बड़े अच्छे संबंध हैं। यदि ईरान और अमरीका का टकराव बढ़ता है तो अमरीका क़तर पर दबाव डालेगा कि वह ईरान से दूर हो।

अब तक तो यही लग रहा है कि क़तर को मध्यस्थता की भूमिका निभाने में सफलता नहीं मिली है लेकिन अब भी इस मैदान में उसकी सफलता की संभावना समाप्त नहीं हुई है। इराक़ ने तो एलान करके कहा कि वह तनाव कम करने में मदद करना चाहता है। वर्तमान तनाव का काफ़ी नुक़सान इराक़ को पहुंच रहा है। ओमान भी इसी पंक्ति में है क्योंकि वह पहले भी ईरान और अमरीका के बीच गुप्त वार्ता की मध्यस्थता कर चुका है और इसके नतीजे में एक व्यापक परमाणु समझौता हुआ था जिसे बहुत बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि माना गया था अलबत्ता बाद में ट्रम्प ने इस समझौते से निकल कर सब कुछ गड़बड़ कर दिया। हमें लगता है कि अब ओमान पहले वाली भूमिका नहीं निभाएगा क्योंकि उसकी विदेश नीति में कुछ बड़े बदलाव हुए हैं।

एक और चैनल है जो बहुत महत्वपूर्ण क्योंकि वह ईरान में अमरीका के हितों का संरक्षक है और वह स्वीज़रलैंड। स्वीज़रलैंड के राष्ट्रपति ओली मावरेर ने अचानक अमरीका की यात्रा की। अमरीकी और इस्राईली मीडिया का अनुमान है कि यह यात्रा भी अमरीका और ईरान के बीच मध्यस्थता के लिए ही है। लगता है कि ईरान भी स्वीज़रलैंड वाले चैनल को प्राथमिकता देगा। मगर समस्या यह है कि ईरान ने कोई भी गुप्त वार्ता करने से इंकार किया है और यह भी साफ़ कर दिया है कि ईरान की मिसाइल क्षमता का विषय तो वार्ता में शामिल ही नहीं होगा जबकि ट्रम्प की कोशिश है कि अमरीका को ईरान की मिसाइल क्षमता पर बात करने का मौक़ा मिल जाए।

हमें यह लगता है कि ट्रम्प कोशिश कर रहे हैं कि अपने वार्ताकारों को कहीं और भेजने के बजाए तेहरान स्थित स्वीज़रलैंड के दूतावास में भेजें और वहीं ईरान के अधिकारियों से वार्ता की कोशिश करें और वार्ता का अगला दौर वाशिंग्टन में संपन्न करना चाहें।

सवाल यह है कि यदि यह सब कुछ होता है तो अमरीका के इस प्रस्ताव पर ईरान का जवाब क्या होगा? और यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस्लामी क्रान्ति की सफलता के बाद से ईरान और अमरीका के पारस्परिक संबंधों के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण मोड़ होगा चाहे दोनों पक्षों के बीच समझौता हो या न हो।

डोनल्ड ट्रम्प की अजीबो ग़रीब गतिविधियों से यही महसूस होता है कि वह कुछ नया और गैर पारम्परिक क़दम उठाने वाले हैं और वह क़दम युद्ध नहीं होगा। युद्ध की संभावना को हम बहुत पहले ही ख़ारिज कर चुके हैं।

ट्रम्प के आस पास जो युद्धोन्मादी अधिकारी वाइट हाउस के भीतर मौजूद हैं या फ़ार्स खाड़ी के इलाक़े के जो शासक युद्ध की आग भड़काने के लिए हाथ पांव मार रहे हैं उन्हें बहुत बड़ा झटका लगने वाला है। कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि इसी साल के आखिर तक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जान बोल्टन की छुट्टी हो सकती है बल्कि इससे पहले भी उन्हें रवाना किया जा सकता है।

यदि अमरीका और ईरान के बीच वार्ता का कोई रास्ता शुरू होता है तो जो टीम आज युद्ध का ढोल पीट रही है वह वार्ता को नाकाम बनाने की कोशिशों में व्यस्त हो जाएगी। मगर सच बात तो यह है युद्धोन्मादी तत्वों की इस टीम का समय ख़राब चल रहा है क्योंकि वार्ता होती है तो दो ही विकल्प सामने होंगे। या तो वार्ता सफल होगी और इस स्थिति में इस टीम के सारे सपने चकनाचूर हो जाएंगे, या फिर वार्ता नाकाम हो जाएगी तो फिर से सब कुछ ज़ीरो प्वाइंट से शुरू होगा और जब तक यह सब होगा तब तक ट्रम्प का शासनकाल समाप्त हो चुका होगा। फिर वाइट हाउस में जो आएगा वह अमरीका की नई रणनीति बनाएगा।

अरब देशों को लिए विवेकपूर्ण विकल्प यह है कि वह चुपचाप ईरान से वार्ता के चैनल स्थापित करें, अमरीका और इस्राईल की मदद से ईरान को पराजित करने का विचार दिमाग़ से बाहर निकाल दें।

 

कमाल ख़लफ़

वरिष्ठ फ़िलिस्तीनी पत्रकार व लेखक