14 मई 2019 - 14:56
यूएई में आयल टैंकरों पर हमला, कहीं विश्व युद्ध का फलीता तो नहीं? कौन हो सकता है इस हमले के पीछे? पढ़े प्रसिद्ध अरब समीक्षक अतवान

लंदन से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र रायुल यौम में अब्दुलबारी अतवान ने फुजैरा धमाकों की कई पहलुओं से समीक्षा की है।

ओमान सागर में यूएई की बंदरगाह फुजैरा में चार आयल टैंकरों पर हमले के बारे में अभी पूरी मालूमात नहीं है और लेख लिखे जाने तक औपचारिक रूप से यह नहीं बताया गया कि इन धमाकों के पीछे किसका हाथ है? इसी प्रकार किसी भी पक्ष ने इस हमले की ज़िम्मेदारी भी स्वीकार नहीं की है। यूएई सरकार ने बस यह कहा है कि यह एक आतंकवादी कार्यवाही थी और जांच की जा रही है।

हैरानी की बात यह है कि जहां पर हमला हुआ है उसके निकट ही अमरीका की सैन्य छावनी है जिसमें 1800 सैनिक रहते हैं लेकिन उसने भी चुप्पी साध रखी है और कोई बयान जारी नहीं किया है जबकि ईरान ने हमले में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका की बात ही कही है लेकिन किसी सरकार या पक्ष की ओर संकेत नहीं किया है।

यदि हम यह विचार को सही मानें कि स्टाक मार्केट को सब से पहले खतरे का आभास होता है तो फिर यह बताना पड़ेगा कि फार्स की खाड़ी, सऊदी अरब और यूएई के स्टाक मार्केट में इस हमले से भूंकप आ गया। दुबई स्टाक मार्केट ने 4 प्रतिशत का गोता लगाया जबकि अबूधाबी स्टाक मार्केट 3.3 और सऊदी स्टाक मार्केट 3.5  प्रतिशत गिर गयी और तेल के मूल्य में 2.6 प्रतिशत की वृद्धि हो गयी।

यह हमला, विशेष समय की वजह से चिंता का कारण है। तेलवाहक जहाज़ों के लिए बेहद अहम हुरमुज़ स्ट्रेट से यह बंदरगाह मात्र 150 किलोमीटर दूर है। यूएई, हुरमुज़ स्ट्रेट से बचने के लिए अपने तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा, पाइप लाइन की मदद से फुजैरा तक पहुंचाता है। इस से यह पता चलता है कि हमले के पीछे जो भी था, उसे अच्छी तरह मालूम था कि वह क्या कर रहा है?। उसने दो बड़ा झटका दिया है, पहला झटका, सुरक्षा संबंधी है और दूसरा आर्थिक झटका है, वह भी एस क्षेत्र में जहां एक चिंगारी, किसी बड़ी लड़ाई की आग भड़का सकती है जो विश्व युद्ध में भी बदल सकती है।

 चार तेल वाहक जहाज़ों को इस हमले से कोई खास नुक़सान नहीं पहुंचा है और न ही किसी की जान गयी है जिसका दो ही मतलब हो सकता हैः या तो हमला करने वाले के पास हमले की सीमित क्षमता थी और इससे अधिक बड़ा हमला वह कर ही नहीं सकता था या फिर उसने जान बूझ कर हल्का हमला किया ताकि एक हंगामा खड़ा हो और कुछ पक्षों को विशेष संदेश भी पहुंच जाए।

हम इस संदर्भ में हम सन 2000 में अदन की खाड़ी में अमरीका के यूएसएस कोल युद्धपोत पर आत्मघाती हमले की ओर संकेत करना चाहेंगे जिसकी ज़िम्मेदारी अलक़ाएदा ने स्वीकार की थी। इस हमले में अमरीका के 17 नौसैनिक मारे गये थे जबकि 37 घायल हुए थे और यूएसएस कोल युद्धपोत कई वर्षों के लिए बेकार हो गया था।

इस लिए फुजैरा में इमाराती और सऊदी तेल वाहक जहाज़ों पर हमले के ज़िम्मेदार के बारे में कई प्रकार की संभावनाएं प्रकट की जा रही हैः

पहलीः हो सकता है इस हमले के पीछे अन्सारुल्लाह आंदोलन हो जो, यमन में सऊदी अरब और यूएई के सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ संघर्ष कर रहा है। विशेषकर इस लिए भी कि उसने कई बार यह धमकी दी है कि अगर यमन पर हमले जारी रहे तो वह अबूधाबी और दुबई जैसे यूएई क नगरों को निशाना बना सकता है। अन्सारुल्लाह ने बाबुलमंदब स्ट्रेट में सऊदी और इमाराती जहाज़ों को निशाना बनाया भी है लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि अगर अंसारुल्लाह इस हमले के पीछे होता तो हुदैदा बंदरगाह से पीछे नहीं हटता।

दूसरी संभावनाः कुछ लोग यह दावा कर रहे हैं कि इसके पीछे आईआरजीसी के गोताखोर यूनिट के लोग हो सकते हैं जिन्हें इस क्षेत्र की पूरी जानकारी है और हालिया दिनों में आईआरजीसी ने हुरमुज़ स्ट्रेट के निकट कीश द्वीप में सैन्य अभ्यास भी किया था। लेकिन इस की संभावना बहुत कम है क्योंकि ईरान इस प्रकार का कोई क़दम कभी नहीं उठाएगा क्योंकि इस तरह से वह डोनाल्ड ट्रम्प और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जान बोल्टन को अपने खिलाफ कार्यवाही का बहाना दे देगा।

तीसरी संभावनाः हो सकता है इसके पीछे कोई आतंकवादी संगठन हो जिसने अदन खाड़ी में अमरीकी युद्धपोतों पर अलकाएदा के हमले की ही भांति, इस हमले की योजना बनायी हो। विशेषकर इस लिए भी कि यमन के हज़रमौत और एबयन में अलकाएदा पूरी तरह से सक्रिय है और यह जगह घटनास्थल से बहुत दूर नहीं है।

चौथी संभावनाः हमला करने वाला कोई तीसरा पक्ष हो सकता है जिसका उद्देश्य फार्स की खाड़ी में युद्ध की आग भड़काना और ईरान पर आरोप लगाना हो ताकि अमरीका ईरान के खिलाफ कार्यवाही कर दे। यह पक्ष कोई देशी या विदेशी हो सकता है। इस संदर्भ में सब से पहला नाम मोसाद का लिया जाता है जो क्षेत्र में पूरी तरह से सक्रिय है और इस प्रकार की कार्यवाहियों का रिकार्ड है उसके पास और सन 2010 में इस्राईली खुफिया एजेन्सी मोसाद के एजेन्टों ने दुबई में जाकर हमास के नेता महमूद अलमबहूह की हत्या की  थी जिसका अर्थ यही है कि मोसाद को इस क्षेत्र की पूरी जानकारी है।

हम अब भी यही समझते हैं कि युद्ध की आशंका, शांति की संभावना से अधिक है क्योंकि ईरान अब तक अमरीकी धमकियों से प्रभावित नहीं हुआ है कि जिसकी वजह से वह वार्ता की मेज़ पर आए जहां उसे अमरीकी शर्तों के साथ नये परमाणु समझौते पर मजबूर करना संभव हो। ईरान ने ट्रम्प की ओर से फोन नंबर दिये जाने और वार्ता के प्रस्ताव का मज़ाक़ उड़ाते हुए यूरेनियम के संवर्धन को दोबारा शुरु करने की धमकी दी है और परमाणु समझौते के कई अनुच्छेदों का पालन रोक दिया है।

हम, अमरीकी चुप्पी के टूटने और माइक पोम्पियो की औचक ब्रसल्ज़ यात्रा के परिणामों का इंतेज़ार कर रहे है। यह तो निश्चित है कि ईरानी राष्ट्रपति रूहानी, ट्रम्प से संपर्क नहीं करेंगे इस दशा में केवल ओमान नरेश की मध्यस्थता का ही विकल्प बचता है।

फार्सी की खाड़ी के देश, उनकी अर्थ व्यवस्था और उनकी सुरक्षा को इस तनाव से सब से अधिक नुक़सान पहुंचेगा जबकि इससे सब से अधिक लाभ, रूस और फिर सऊदी अरब को पहुंचेगा क्योंकि तेल के मूल्य में केवल एक डालर की वृद्धि से ही रूस को 4 अरब डालर का फायदा होता है और युरोप और तीसरी दुनिया को बड़ा घाटा होता है।

आने वाले दिन खतरनाक हैं, युद्ध होगा या फिर वार्ता, हमें इंतेज़ार करना होगा इसके अलावा क्या कुछ और हम कर सकते हैं? (Q.A. लेखक के विचारों से पार्स टूडे का सहमत होना ज़रूरी नहीं।  साभार , अब्दुल बारी अतवान, रायुलयौम )