27 अप्रैल 2019 - 12:50
"आतंकवाद के ख़िलाफ़ इस्लामी गणबंधन" नामक गठबंधन की बैठक से फ़ायदा उठाने में सऊदी अरब की नाकामी

26 अप्रैल को सऊदी अरब की राजधानी रियाज़ में "आतंकवाद के ख़िलाफ़ इस्लामी गणबंधन" नामक गठबंधन सदस्य देशों की बैठक आयोजित हुयी।

यह गठबंधन 14 दिसंबर 2015 को गठित हुआ जिसका नेतृत्व सऊदी अरब के हाथ में है। यह गठबंधन ऐसी हालत में आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई के लक्ष्य के तहत गठित हुआ कि इसका नेतृत्व करने वाला सऊदी अरब आतंकवादी गुटों का सबसे बड़ा समर्थक है। जैसा कि इतालवी अख़बार एल-जर्नल ने इस बारे में लिखाः "सऊदी अरब अपनी सीमा से बाहर आतंकवाद की पैसों से मदद कर रहा और चरमपंथी गुटों की ओर से रियाज़ को पैसों की मदद को रोकने के लिए कोई क़दम नहीं उठा रहा है।" सऊदी अरब आतंकवादी गुटों को पैसों, हथियारों और कूटनैतिक मदद देने के साथ साथ इन गुटों की वैचारिक ज़रूरत को भी पूरा करता है। जैसा कि वहाबी विचारधारा और दाइश तथा अन्नुस्रा फ़्रंट जैसे गुटों के बीच गहरा संबंध किसी से छिपा नहीं है।

26 अप्रैल को रियाज़ में बैठक पूरी तरह प्रचारिक आयाम पर आधारित थी क्योंकि यह बैठक ऐसी हालत में आयोजित हुयी कि आले सऊद शासन 37 सऊदी नागरिकों की ग़ैर क़ानूनी व अन्यायपूर्ण तरीक़े से मौत की सज़ा देने की वजह से विश्व जनमत की ओर से गहरे दबाव में है। सऊदी अरब की सत्ता पर क़ब्ज़ा जमाए परिवार ने इस देश के 37 नागरिकों को मंगलवार को आतंकवादी गुटों से संपर्क के निराधार आरोप के बहाने मौत की सज़ा दी।

26 अप्रैल की बैठक के संबंध में अहम बिन्दु यह है कि इस बैठक से स्पष्ट हो गया कि आले सऊद शासन का आतंकवाद के ख़िलाफ़ इस्लामी गठबंधन नामक गठबंधन के गठन का लक्ष्य हासिल नहीं हुआ है। इस बैठक में 41 सदस्य देशों में से सिर्फ़ 13 देश शामिल हुए।

अंत में यह कि सऊदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने इस गठबंधन के ज़रिए सऊदी अरब की स्थिति को बेहतर करने की कोशिश की लेकिन 26 अप्रैल की बैठक में भागीदारी के स्तर के कम रहने से स्पष्ट हो गया कि सऊदी अरब की स्थिति ख़राब होती जा रही है।