इस संबंध में ट्रम्प सरकार की नीतियां अहम भूमिका निभा रही हैं और बहुत सी सरकारें अमरीका के आर्थिक सिस्टम से अपनी निर्भरता को कम करने की कोशिशों में लग गई हैं। इसी के साथ अमरीका के घटक और प्रतिस्पर्धी अनेक देशों ने डाॅलर को किनारे रख कर अन्य विदेशी मुद्राओं के प्रयोग के लिए क़दम उठाने शुरू कर दिए हैं। इसके चलते अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा भंडार में डाॅलर की भागीदारी कम और यूरो जैसी अन्य मुद्राओं की भागीदारी बढ़ती जा रही है।
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़ ने अन्य देशों को क्षति पहुंचाने के उद्देश्य से अमरीका की ओर से डाॅलर के ग़लत इस्तेमाल की ओर से चेतावनी दी है। उन्होंने इस बात का उल्लेख करते हुए कि अमरीका अल्पकालीन लक्ष्यों के लिए डाॅलर के माध्यम से अन्य देशों को नुक़सान पहुंचा रहा है लेकिन दीर्घावधि में इस नीति से अमरीका को ही नुक़सान पहुंचेगा।
अमरीका के इस रवैये के चलते अब वाॅशिंग्टन की नीतियों और कार्यवाहियों के ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय प्रतिरोध रूप धारण करने लगा है। इसी के साथ हम यह भी देख रहे हैं कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की मज़बूत मुद्रा के रूप में डाॅलर को किनारे लगाने की निरंतर कोशिशें आरंभ हो गई हैं। रूस और चीन इस प्रक्रिया के ध्वजवाहक हैं जबकि भारत, तुर्की और ईरान भी अपने विदेशी लेन-देन से डाॅलर को अगल कर रहे हैं। वर्तमान प्रक्रिया के कारण डाॅलर का इस्तेमाल कम होता जाएगा और वैश्विक व्यापार एवं अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक लेन-देन में उसकी स्थिति कमज़ोर पड़ती जाएगी।