मैंने आख़िरी बार यह चर्च दिवंगत शायर महमूद दरवेश के साथ देखा था जिन्हें इस चर्च से गहरा लगाव था। वह जब फ़्रांस की राजधानी से फ़िलिस्तीन में रामल्ला चले आए थे तो थोड़े थोड़े अंतराल से जाकर इसी चर्च के क़रीब एक छोटे से होटल में ठहरते थे।
करोड़ों लोगों की तरह मुझे भी उस वक़्त दिली पीड़ा हुई जब इस वैभवशाली इमारत से शोले उठने की तसवीरें और वीडियो मैंने देखे और इसका शानदार टावर ढह गया। इस गहरे दुख को उस समय थोड़ी शांति मिली जब यह सुनने में आया कि लोगों ने एक अरब यूरो से अधिक दान दिया है ताकि इस चर्च का पुनरनिर्माण किया जा सके और इसे उसी वैभवशाली रूप में पलटाया जा सके जिसमें वह आग लगने से पहले था।
कुछ लोगों ने इस बारे में सवाल किया कि इस इमारत में आग लगने की घटना पर विश्व स्तर पर लोगों ने व्यापक रूप से क्यों ध्यान दिया है तो उन पर चारों ओर से हमले हुए। हालांकि यह सवाल अपनी जगह महत्वपूर्ण है क्योंकि अनेक जगहों पर धार्मिक और ग़ैर धार्मिक हर प्रकार की महत्वपूर्ण इमारतों को आतंकी हमलों तक का निशाना बनाया गया लेकिन उन घटनाओं पर इतनी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया।
अप्रैल 2002 में इस्राईली टैंकों ने बैतेलहम सहित कई फ़िलिस्तीनी शहरों को घेर लिया चर्च आफ़ नेटिविटी की भी घेराबंदी की गई और यह घेराबंदी 39 दिनों तक जारी रही क्योंकि इसमें फ़िलिस्तीनी संघर्षकर्ताओं ने शरण ली थी और वह समझ रहे थे कि इस इमारत की पवित्रता और धार्मिक महत्व को देखते हुए इस्राईली सैनिक उस पर हमला नहीं करेंगे। मगर इस्राईली सैनिकों ने अचानक इस चर्चा पर फ़ायरिंग शुरू कर दी। उसमें पादरी भी थे ननें भी थीं बच्चे भी थे। कुछ ही देर में वहां लाशें बिछ गईं। उन पर हर तरफ़ से इस्राईली सैनिक फ़ायरिंग कर रहे थे। हालांकि यह वह चर्च है जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां हज़रत ईसा मसीह का जन्म हुआ था।
कुछ लोग भीतर ही बंद रहे और भूखे प्यासे मर गए। चर्च की पानी और बिजली की लाइन काट दी गई। इमारत के भीतर शव सड़ गए और भयानक बदबू से पूरी इमारत जहन्नम बन गई। यह घेराबंदी जारी ही रही। बाद में अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थों के माध्यम से इस्राईली सरकार से बातचीत हुई जिसके नतीजे में पश्चिमी तट के इलाक़े से सभी संघर्षकर्ताओं को निकाल कर गज़्ज़ा पट्टी भेज दिया गया। हमने जो कुछ यहां लिखा है वह इस घटना में फंसे लोगों द्वारा बयान की गई दर्दनाक कहानी का बहुत छोटा सा हिस्सा है।
यह सब कुछ हुआ था लेकिन इस समय जो हमदर्दी देखने में आ रही है उसका दसवां हिस्सा भी उस समय नहीं देखने में आया था। चर्चा का एक भाग गिरा दिया गया था हालांकि यह चर्च एसा है जो दो हज़ार साल से अधिक पुराना है। इसमें हज़रत ईसा का जन्म हुआ है। इसका कारण यही है कि यह चर्चा फ़िलिस्तीन में स्थित है जिस पर इस्राईल ने क़ब्ज़ा कर रखा है और घेराबंदी तथा बर्बरतापूर्ण हमला करने वाले इस्राईली थे जिन्हें पश्चिमी जगत हर क़ानून से ऊपर रखता है और उनके अपराधों को भी सराहती है चाहे वह अपराध ईसाई धार्मिक स्थलों या मुस्लिम धार्मिक स्थलों के ख़िलाफ़ किए गए हों।
नेटिविटी चर्च पर हमले के अलावा ज़ायोनियों ने मस्जिदुल अक़सा को भी जान बूझ कर आग लगाई जो मुसलमानों का पहला क़िबला है।
जब धार्मिक हस्तियों का मज़ाक़ उड़ाने वाली मैगज़ीन शार्ली हेब्दो के कार्यालय पर हमला हुआ दर्जनों अरब और यूरोपीय राजनेता पेरिस की ओर दौड़ पड़े। सबने अपने सीने पर नारा लिखा हम सब शार्ली हेब्दो, लेकिन जब न्यूज़ीलैंड में मस्जिदों पर हमला हुआ और नमाज़ियों का क़त्ले आम किया गया तब तो हमने नहीं देखा कि फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैकक्रां न्यूज़ीलैंड गए हैं और उन्होंने पीड़ितों से सहानुभूति जताई हो अरब नेताओं और नरेशों का तो कोई उल्लेख ही नहीं है।
अरब देश यमन में प्राचीन और महान एतिहासिक इमारतों और अवशेषों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया मगर किसी के आंख में आंसू नज़र नहीं आए। जब अमरीका ने हमला किया तो उस समय इराक़ के संग्रहालयों को लूटा गया तो सबने आंख फेर ली। कोई कुछ सुनने को तैयार ही नहीं है। यही सब कुछ मस्जिदों और चर्चों के साथ हुआ मगर किसी को कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ा।
पश्चिमी जगत के इस दोग़लेपन की शिकायत करना हमारा हक़ है क्योंकि हम भी इंसान हैं, हमारी भी प्राचीन सभ्यता है बस इतनी सी बात है कि हम अरब और इस्लामी जगत की दुर्दशा वाले युग में जी रहे हैं।
इस दुख और कटुता की भावना में भी मैं अपने ईसाई भाइयों को ईस्टर की मुबारकबाद देता हूं।
अब्दुल बारी अतवान
अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार