इराक़ और सऊदी अरब के संबंधों में काफ़ी उतार चढ़ाव देखने को मिला। यद्यपि इराक़ पर बास पार्टी के शासन के समय सऊदी अरब के बग़दाद के साथ कूटनयिक संबंध नहीं थे किन्तु सऊदी अरब उन अरब देशों में है जो इराक़ के बासी शासन के पतन और इराक़ में नयी व्यवस्था के गठन से प्रसन्न नहीं था क्योंकि रियाज़ मध्यपूर्व क्षेत्र में शांति और राजनीति को धार्मिक पहचान की दृष्टि से देखता था और वह इस क्षेत्र में सुन्नी मुसलमानों के हितों की रक्षा का दावा करता था।
इस बात के दृष्टिगत कि इराक़ में बादी व्यवस्था के बाद सत्ता के ढांचे में शीया मुसलमानों का स्थान मज़बूत हुआ तो इस देश के बारे में सऊदी अरब के बर्ताव में परिवर्तन आ गया है और उसने आक्रमक रवैया अपना लिया था और इसी परिधि में सऊदी अरब ने राजनैतिक शक्ति को अस्थिर करने, धार्मिक दृष्टि से अस्थिरता फैलाने, बास पार्टी का दोबारा गठन करने तथा इराक़ सरकार को कमज़ोर करने जैसी नीतियां अपनाईं।
राजनैतिक अस्थिरता व असुरक्षा के गुज़ारने, देश में नई राजनैतिक व्यवस्था के गठन तथा तेहरान से बग़दाद के संबंधों के मज़बूत होने के कारण हालिया वर्षों में रियाज़ से बग़दाद के बारे में अपनी नीतियां बदल दीं और इराक़ की नई राजनैतिक पहचान को कमज़ोर करने या उसे नकारने के बजाए उसने बग़दाद के साथ सहयोग के लिए प्रया शुरु कर दिए। दूसरी ओर इराक़ सरकार भी क्षेत्रीय शांति और स्थितरता को बढ़ावा देने और पड़ोसी देशों के साथ तनाव से दूरी पर बल देते हुए सऊदी अरब के साथ संबंधों को मज़बूत करने का स्वागत करती है और यही कारण है कि इराक़ के प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी ने सऊदी अरब की यात्रा की है।