यह संकेत मिल रहे हैं कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की ओर से सऊदी अरब पर भारी वित्तीय अदाएगी के लिए दबाव बनाया जा रहा है।
पहली घटना है अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो की धमकी। पोम्पेयो ने सीबीएस टीवी चैनल को साक्षात्कार देते हुए कहा कि उनकी सरकार इस बात की कदापि अनुमति नहीं देगी कि सऊदी अरब परमाणु शक्ति बन जाए और अमरीका तथा इस्राईल की सुरक्षा को ख़तरे में डाले। यह धमकी तब आई है जब सऊदी अरब में परमाणु बिजलीघर का निर्माण लगभग पूरा हो जाने की ख़बरें मीडिया में आई हैं।
दूसरा घटना है सऊदी अरब की ओर से दी जाने वाली धमकी। रायटर्ज़ ने तीन सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि सऊदी अरब ने तेल के मूल्य निर्धारण में डालर को प्रयोग करने के बजाए दूसरी करेन्सी का प्रयोग शुरू कर दिया जाएगा। रियाज़ सरकार ने कहा है कि यह क़दम तब उठाया जाएगा जब अमरीका वह क़ानून पास करेगा जिसके तहत व ओपेक के सदस्य देशों पर तेल की जमाख़ोरी का मुक़द्दमा चलाने की कोशिश करना चाहता है।
तीसरी घटना अमरीकी कांग्रेस में सऊदी अरब के ख़िलाफ़ क़ानून का प्रस्ताव है। अमरीकी कांग्रेस ने सहमति जता दी है कि यमन युद्ध में सऊदी अरब को अमरीका से मिलने वाली सामरिक मदद बंद करने के लिए क़ानून पेश किया जा सकता है। यह ट्रम्प के मुंह पर तमाचा है जो सऊदी अरब की सैनिक मदद जारी रखना चाहते हैं।
हमें यह नहीं लगता कि सऊदी अरब अगर परमाणु वारहेड बना रहा है तो वह उसे अमरीका या इस्राईल के ख़िलाफ़ प्रयोग करना चाहता है, विशेषकर इस समय जो हालात हैं उनमें तो हरगिज़ नहीं। पोम्पेयो ने जो धमकी दी है उसका लक्ष्य कुछ और है इसी तरह सऊदी अरब की धमकी भी किसी और बात की ओर संकेत है। सऊदी अरब ने अमरीका में 1 ट्रिलियन डालर का पूंजीनिवेश कर रखा है जबकि उसने 160 अरब डालर के अमरीकी बांड ख़रीद रखे हैं।
तेल की जमाखोरी रोकने के लिए अमरीका में क़ानून पास होने की संभावना कम है क्योंकि एसा होने की स्थिति में कम से कम 14 सरकारों से उसका टकराव होगा मगर यह भी सच्चाई है कि ट्रम्प प्रशासन यदि इस प्रकार के इशारे दे रहा है तो इसका भी कुछ ख़ास लक्ष्य ज़रूर है।
जब अमरीका ने 11 सितम्बर 2001 को अमरीका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारतों पर हुए हमलों में लिप्त सरकारों को दंडित करने के लिए जास्टा क़ानून पास किया तो सऊदी अरब ने तत्काल ट्रम्प सरकार को 450 अरब डालर की रक़म अदा की कि इस क़ानून को रोक दिया जाए। अब जब अमरीकी सरकार तेल की जमाख़ोरी का क़ानून लागू करने के इशारे दे रही है तो इसका मतलब यह है कि वह फिर सऊदी अरब से कई सौ अरब डालर वसूलने की कोशिश में है। विशेषकर इस समय जब अमरीकी कांग्रेस सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान को वरिष्ठ पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या की ज़िम्मेदार ठहराने की तैयारी में है।
अच्छा होगा कि सऊदी अरब भी चीन, रूस, भारत, तुर्की और ईरान के साथ मिल जाए और मिलकर अंतर्राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था से अमरीकी डालर के वर्चस्व को समाप्त कर दे ताकि अमरीकी सरकार डालर को अपने विरोधी देशों की अर्थ व्यवस्था ध्वस्त करने के लिए हथियार के रूप में प्रयोग न कर सके। मगर यह नहीं लगता कि सऊदी अरब इस दिशा में कोई भी क़दम बढ़ा पाएगा क्योंकि इसका सीधा मतलब यह होगा कि सऊदी अरब अमरीका विरोधी मोर्चे का हिस्सा बन गया है और फिर उसे अमरीका की ख़तरनाक प्रतिशोधात्मक कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है।
अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने तुर्की की अर्थ व्यवस्था ध्वस्त कर देने की धमकी दी तो कुछ ही दिनों में तुर्की की करेन्सी लीरा की क़ीमत में 50 प्रतिशत की गिरावट आ गई। इस स्थिति से परेशान होकर तुर्क राष्ट्रपति अर्दोग़ान ने अमरीकी पादरी एंड्र्यू ब्रान्सन को रिहा कर दिया। अब रूस से एस-400 मिसाइल ढाल सिस्टम ख़रीदने के तुर्की के फ़ैसले के कारण वाशिंग्टन और अंकारा के बीच तनाव बहुत बढ़ गया है तो संभव है कि तुर्की को एस-400 का सौदा रद्द करना पड़े।
अमरीका और सऊदी अरब के बीच तनाव के लक्षण दिखाई देने लगे हैं और आने वाले दिनों में यह तनाव और भी बढ़ेगा क्योंकि फ़िलिस्तीन के संबंध में डील आफ़ सेंचुरी नामक अमरीकी और इस्राईली साज़िश की घोषणा का समय क़रीब आ रहा है। ग्रेटर इस्राईल की स्थापना के लिए कम से कम 350 अरब डालर की ज़रूरत है और यह पैसा फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों से वसूलने की तैयारी है।
अब्दुल बारी अतवान
अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार