उस समय अमरीकी रणनीति ने मुस्लिम देशों में चरमपंथ के बीज बोने और फैलाने का काम शुरू किया सदी अरब, मिस्र और पाकिस्तान की सरकारों ने इस संदर्भ में भारी सहयोग किया जिसका नतीजा यह हुआ कि लड़ाकों और चरमपंथियों को एकत्रित करके अफ़ग़ानिस्तान भेजा गया ताकि वह सोवियत संघ के खिलाफ़ लड़ें। जब सोवियत संघ बिखर गया तो अब अमरीका ने अरब देशों में अपने घटकों की मदद से चरमपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ आप्रेशन शुरू किया क्योंकि अमरीका को उनसे जो काम लेना था वह ले चुका था।
इन हालात में चरमपंथियों ने अरब सरकारों को निशाना बनाने की कोशिश की मगर वह अरब सरकारों को ख़त्म नहीं कर पाए तो उन्होंने इन सरकारों का समर्थन करने वाले पश्चिमी देशों के हितों पर हमले शुरू कर दिए। उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में अपना ठिकाना बना लिया। इस लक्ष्य के तहत ओसामा बिन लादेन और एमन अज़्ज़वाहेरी के बीच वर्ष 1998 में एक समझौता भी हो गया।
अमरीका इस कोशिश में था कि अफ़ग़ानिस्तान की तालेबान सरकार वाशिंग्टन की नीतियों और हितों का पालन करे। अमरीका मध्य एशिया के इलाक़े से पाकिस्तान और भारत को गैस की सप्लाई करना चाहता जिसमें उसे तालेबान के सहयोग की ज़रूरत थी। अमरीका चाहता था कि पाकिस्तान और भारत ईरान से गैस न ख़रीदें क्योंकि यदि ईरान से पाकिस्तान और भारत तक गैस पाइपलाइन बिछाई गई तो ईरान का प्रभाव पाकिस्तान और भारत दोनों देशों में बढ़ेगा।
अमरीका ने वर्ष 1996 में अफ़ग़ानिस्तान में नार्थ एलायंस के ख़िलाफ़ तालेबान की मदद की और पाकिस्तान, सऊदी अरब और इमारात ने अमरीका के कहने पर तालेबान की सरकार को औपचारिकता भी दे दी। तालेबान और अमरीका की युनिकाल कंपनी के बीच एक समझौता हुआ जिसके तहत तुर्कमनिस्तान से अफ़ग़ानिस्तान होते हुए भारत तक गैस पाइपलाइन बिछाने पर सहमति हुई। इस पाइपलाइन की लंबाई 1730 किलोमीटर थी। इसी सदर्भ में तालेबान के प्रतिनिधिमंडल ने 1997 में अमरीका के ह्यूस्टन शहर का दौरा किया।
मगर एक बड़ा मोड़ यह आया कि तालेबान ने अलक़ायदा का समर्थन शुरू कर दिया। वर्ष 1998 में अलक़ायदा ने नैरोबी और दारुस्सलाम में अमरीकी दूतावासों पर हमले किए थे इसलिए अमरीका चाहता था कि अलक़ायदा को कहीं से कोई समर्थन न मिले।
ईरान और रूस जिन्हें अमरीका अपनी प्रतिद्वंद्वी समझता है गैस के बड़े भंडारों के मालिक हैं और वह अपने पड़ोसी देशों को पाइपलाइन के माध्यम से गैस की सप्लाई कर रहे हैं। इससे इन दोनों देशों की अर्थ व्यवस्था को काफ़ी मदद मिल रही है और दुनिया में उनका प्रभाव बढ़ रहा है। ईरान की योजना थी कि वह पाकिस्तान से भारत तक गैस पाइपलाइन बिछाए मगर अमरीका ने इसमें रुकावट डाली।
रूस ने यह किया कि मध्य एशिया के इलाक़े में अमरीका के प्रभाव को समाप्त करने के लिए इन देशों से गैस ख़रीदी और उसे अपनी गैस के साथ मिलाकर यूरोपीय देशों को बेचना शुरू कर दिया। इस तरह अमरीका की योजना फ़ेल हो गई।
वर्ष 2001 में जार्ज बुश जुनियर सत्ता में पहुंचे तो उन्होंने अपने उप राष्ट्रपति डिक चेनी के साथ मिलकर तालेबान की सरकार गिराने की योजना बनाई ताकि मध्य एशिया की गैस रूस के बजाए अमरीका के हाथ में रहे और अमरीका यह गैस भारत और पाकिस्तान को सप्लाई करवा सके। इसके लिए अमरीका को अफ़ग़ानिस्तान में एक पिट्ठू सरकार की ज़रूरत थी। कहा जाता है कि 11 सितम्बर की घटना को अमरीकी सरकार ने अपने इस पुराने लक्ष्य के लिए प्रयोग किया बल्कि यहां तक कहा जाता है कि यह घटना और इस संदर्भ में अमरीका की भूमिका ही पूरी तरह संदिग्ध है।
11 सितम्बर के हमलों से अमरीकी सरकार को अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा करने का अच्छ मौका मिल गया मगर तालेबान और अलक़ायदा की ओर से अमरीकी सैनिकों पर हमले जारी रहे और अमरीका को यह मौक़ा नहीं मिल पाया कि वह अफ़ग़ानिस्तान को गैस पाइपलाइन बिछाने के लिए प्रयोग कर सके।
दूसरी ओर ईरान और पाकिस्तान के बीच गैस पाइपलाइन बिछाने का समझौता हो गया मगर अमरीका ने पाकिस्तान पर फिर दबाव डाला और उसे इस समझौते पर आगे बढ़ने से रोका मगर पाकिस्तान को बिजली के संकट की वजह से ईरान की गैस की ज़रूरत है और अब यह कोशिश हो रही है कि समुद्र के रास्ते से यह गैस पाकिस्तान और भारत तक पहुंच जाए। इस संदर्भ में पाकिस्तान ने वर्ष 2018 में रूस की गैस प्रोम कंपनी से एक समझौता भी किया है। पाकिस्तान चाहता है कि गैस पाइपलाइन उसके बलोचिस्तान प्रांत से गुज़रने के बजाए समुद्री रास्ते से गुज़रे।
अब अमरीका तालेबान से फिर वार्ता कर रहा है। ट्रम्प को यह आशा है कि तालेबान से समझौता हो जाने की स्थिति में वह मध्य एशियाई देशों की गैस पाकिस्तान और भारत पहुंचा सकेंगे इसलिए कि तालेबान का दमन करने की अपनी कोशिशों की विफलता का अमरीका को यक़ीन हो चुका है। मगर अमरीका को यह भी डर है कि तालेबान से उसका समझौता बहुत मज़बूत नहीं होगा अतः अमरीकी हितों पर कभी भी हमले शुरू हो सकते हैं।
दूसरा खेल अमरीका ने मध्यपूर्व के देशों में शुरू किया। वहां अमरीका ने दाइश को पनपने का मौक़ा दिया और फिर दाइश पर अंकुश लगाने के लिए सीरियाई कुर्दों की मदद शुरू कर दी। कुर्दों की तुर्की से पुरानी दुशमनी है। रूस गैस के व्यापार में तुर्की का भी प्रयोग करना चाहता है। रूस चीन को गैस की सप्लाई का समझौता कर चुका है वह भारत और पाकिस्तान को ईरान की गैस की सप्लाई के समझौते में भी गैस प्रोम कंपनी के माध्यम से शामिल है अब मास्को की कोशिश है कि तुर्की से उत्तरी यूरोप के देशों को गैस की सप्लाई करे। क्या इन हालात में रूस अमरीका को अफ़ग़ानिस्तान में यह मौक़ा देगा कि वह तालेबान के साथ मिलकर गैस के बाज़ार में मास्को के हितों को निशाना बनाए?।
मोअतज़्ज़ अली
राजनैतिक मामलों के टीकाकार