इराक़ के सुप्रीम कोर्ट में अपील कोर्ट के उपाध्यक्ष मुनीर हद्दाद अल-फ़ुरात टीवी चैनल से बात करते हुए कहा कि आज भी मैं सद्दाम को फांसी की सज़ा सुनाने की क़ीमत चुका रहा हूं।
उन्होंने कहा, सद्दाम की बासी पार्टी के बचे खुचे समर्थक मुझे विभिन्न तरीक़ों से परेशान करते रहते हैं।
इसी प्रकार, न्यायाधीश हद्दाद ने इराक़ की राष्ट्रीय सुरक्षा के पूर्व सलाहकार मोवफ्फ़क़ रबी के उस दावे को ख़ारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि सद्दाम की गर्दन में फांसी का फंदा ख़ुद उन्होंने डाला था और उसे फांसी के तख़्ते पर चढ़ाया था।
इराक़ के वरिष्ठ जज ने कहा, रबी की इसमें कोई भूमिका नहीं थी। क्योंकि वे न तो जज थे और न ही अपील कोर्ट के प्रमुख और न ही प्रधान मंत्री।
उन्होंने आगे कहा, जब अदालत ने सद्दाम को मौत की सज़ा देने का फ़ैसला सुनाया तो न ही प्रधान मंत्री और न ही राष्ट्रपति ने इसका विरोध किया।
हद्दाद मुनीर का कहना था कि मैंने व्यक्तिगत रूप से सद्दाम की वसीयत लिखी और सद्दाम से उनकी आख़िरी ख़्वाहिश पूछी।
उन्होंने कहा, फांसी देने से ठीक पहले जब मैंने सद्दाम से पूछा कि क्या तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा है? तो सद्दाम ने कहा, जीते रहो बेटा।
न्यायाधीश मुनीर का कहना है कि सद्दाम इस केस की सुनवाई करने वाले और जांच करने वाले समस्त न्यायाधीशों को पहचानते थे।
उन्होंने कहा, स्वयं बासी होने के बावजूद सद्दाम ने बासियों पर अल-ख़ुल्द सैन्य छावनी में सबसे बड़ा अत्याचार किया था।
इराक़ के वरिष्ठ न्यायाधीश का कहना था कि सद्दाम ने मानवता के ख़िलाफ़ अपराध किए थे और अपने ही देश वासियों का नरसंहार किया था, जिसके लिए मौत की सज़ा भी काफ़ी नहीं थी।