इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई ने मंगलवार को तेहरान में वक्ताओं और कवियों से भेंट में यह बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में सत्य और असत्य का लामबंद होना, वही पैग़म्बरे इस्लाम और इमामों के काल में लामबंद होने जैसा ही है। जिस तरह से उस काल में असत्य का मोर्चा लोगों की भारी संख्या और साधनों से लैस होने तथा ज़बरदस्त प्रोपेगैंडों के बावजूद तबाह हो गया ठीक वैसा ही अंजाम आज भी इस्लामी क्रांति के मुक़ाबले वाले मोर्चे की प्रतीक्षा में है। उन्होंने कहा कि दुश्मन से भयभीत नहीं होना चाहिए और हिसाब किताब में ग़लती नहीं करनी चाहिए। वरिष्ठ नेता का कहना था कि ईरानी राष्ट्र ने पिछले चार दशकों के दौरान वरचस्ववादी व्यवस्था के मुक़ाबले में प्रतिरोध का मार्ग अपनाकर यह सिद्ध कर दिया कि कोई भी शक्ति ईरानी राष्ट्र को क्षति नहीं पहुंचा सकती। उन्होंने कहा कि अब ईरान, वैश्विक आदर्श में बदल चुका है। यह एसा आदर्श है जिसने न केवल ईरानी राष्ट्र के भविष्य को बदल दिया बल्कि इस्लामी जागरूकता का मार्ग भी प्रशस्त किया। यही कारण है कि अमरीका ने इस्लामी क्रांति के आरंभ से ही ईरान के विरुद्ध कार्यवाही को अपनी नीतियों में सर्वोपरि रखा ताकि ईरान की इस्लामी शासन व्यवस्था को गिराया जा सके।
निःसन्देह, जैसाकि पैग़म्बरे इस्लाम (स) कह चुके हैं कि ईश्वरीय परंपरा के अनुसार शत्रु की पराजय सुनिश्चित है। वरिष्ठ नेता ने कहा कि अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति का हाल भी इस देश के पूर्व राष्ट्रपतियों से बेहतर नहीं होगा। पिछले चालीस वर्षों की सफलताओं ने इस वास्तविकता को सिद्ध कर दिया कि ईरानी राष्ट्र, हर प्रकार के दबावों के बावजूद अपने लक्ष्यों को प्राप्त करेगा दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि धार्मिक मूल्यों की कटिबद्धता ने ईरानी राष्ट्र के दृढ संकल्प और महानता प्रदान की। यही मानदंड वर्चस्ववादी शक्तियों के मुक़ाबले में सफलता को सुनिश्चित करता है। यही कारण है कि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने धार्मिक वक्ताओं और कवियों को इस्लामी व क्रांति के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने का भंडार और पूंजी बताया। उन्होंने कहा कि इस पूंजी से हुसैनी और फ़ातेमी लक्ष्यों तथा क्रांति की शिक्षाओं को बयान के लिए लाभ उठाया जाना चाहिए।