2007 में बसरा में तैनात रहे कुछ ब्रिटिश सैनिकों ने मिडिल ईस्ट आई से बात करते हुए कहा है कि उन्हें हर उस व्यक्ति को देखते ही गोली मारने का आदेश दिया गया था, जिसके हाथ में मोबाइल फ़ोन या बेलचा जैसी कोई चीज़ दिखाई दे।
ब्रिटिश सेना ने इराक़ और ब्रिटेन में तैनान अपने सैनिकों को आदेश दिया था कि वह निहत्थे संदिग्धों को देखते ही गोली मार दें।
इस आदेश के अनुसार, ब्रिटिश सैनिकों ने कई बच्चों और युवकों को मौत के घाट उतार दिया था।
एक पूर्व रॉयल मरीन का कहना था कि उनके एक अधिकारी ने उनके साथियों के सामने 8 वर्षीय अफ़ग़ान लड़के को गोली मारने की बात स्वीकार की थी, जिसके बाद लड़के का बाप अपने बेटे का शव हाथों पर उठाकर सैन्य ठिकाने के प्रवेश द्वार पर पहुंचा था और उसने रोते हुए ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों से पूछा था कि इस मासूम बच्चे की क्या ग़लती थी, जो इसे मार डाला?
एक अन्य पूर्व सैनिक ने भी इसी तरह का अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उसने दो निहत्थे बच्चों को गोली मारी थी।
एक और पूर्व सैनिक का कहना है कि इराक़ के दक्षिण में स्थित बसरा शहर में उसने ख़ुद अपने साथियों को आम नागरिकों पर फ़ायरिंग करते और उनकी हत्या करते हुए देखा है।
पूर्व ब्रिटिश सैनिक का कहना था कि उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिलाया था कि अगर इस तरह की किसी घटना की कोई जांच होती भी है तो हम तुम्हें बचा लेंगे, तुम सिर्फ़ इतना कह देना कि हमने अपनी सुरक्षा में गोली चलाई थी।
ब्रिटिश सैनिकों के नए रहस्योद्घाटनों के बारे में ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने किसी तरह की कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है।
इराक़ में ब्रिटिश सैनिकों के इस अमानवीय अपराध की शुरूआत जून 2004 में अमाराह के इलाक़े से शुरू हुई, जहां उन्हें शिया मुस्लिम प्रतिरोधकर्ताओं का सामना था।
प्रिंसिज़ रोयल रेजिमेंट के एक सैनिक डैन मिल्स ने अमाराह की लड़ाई में भाग लिया था। मिल्स का कहना है कि आम नागरिकों को निशाना बनाकर वे और उनके साथी काफ़ी रिलैक्स फ़ील करते थे।
ब्रिटिश सैनिकों ने यह युद्ध अपराध ऐसी स्थिति में किए हैं कि जब अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, बच्चों और महिलाओं को विशेष सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है।
ब्रिटेन के एक पूर्व सैनिक का कहना है कि हम बूढ़ लोगों, जवानों और महिलाओं को गोली मार दिया करते थे। मैंने अपने जीवन में कभी इस तरह की अराजकता और हिंसा नहीं देखी थी।