इस्राईली प्रधानमंत्री नेतेन्याहू की यह बिल्कुल आदत नहीं है कि वह अपने दुश्मनों को सलाह दें और जब से फिलिस्तीन की भूमि पर इस अवैध शासन का अस्तित्व हुआ है , इस सरकार के नेताओं ने अपने दुश्मनों के साथ हमेशा ताक़त की ज़बान का इस्तेमाल किया है और हमेशा अपनी सैनिक शक्ति का प्रदर्शन किया है इसी लिए जब इस्राईली प्रधानमंत्री नेतेन्याहू ने ईरान को, सीरिया से निकलने की सलाह दी तो वास्तव में उन्होंने इस्राईल की पुरानी परंपरा तोड़ी और क्षेत्र में शक्ति के एसे समीकरण का संकेत दिया जो किसी भी रूप में इस्राईल के हित में नहीं है।
ईरान को सीरिया से निकलने की सलाह देने के बाद इस्राईली प्रधानमंत्री ने " ईरानी ठिकानों " पर हमले की धमकी भी दी है लेकिन हमें तो नहीं लगता कि ईरानी, नेतेन्याहू की इस सलाह को मानेंगे और सीरिया से निकल जाएंगे क्योंकि वह नेतेन्याहू या उनके अमरीकी मित्रों से अनुमति लेकर तो सीरिया गये नहीं थे इस लिए नेतेन्याहू की यह सलाह हक़ीक़त में इस्राईल और उनकी कमज़ोरी और मजबूरी को ही दर्शाती है।
नेतेन्याहू पहले यह कह चुके हैं कि गत सात वर्षों के दौरान इस्राईल ने सीरिया में " ईरानी ठिकानों " सैंकड़ों हमले किये हैं लेकिन यह तो स्पष्ट है कि इस्राईल के इन हवाई हमलों से ईरानी डरे नहीं और न ही वह सीरिया से निकलने पर तैयार हुए तो सवाल यह है कि नेतेन्याहू इस से ज़्यादा और क्या कर सकते हैं?
नेतेन्याहू की इस नाकामी को तीन आयामों से देखा जा सकता हैः
पहली संभावना तो यह है कि नेतेन्याहू झूठ बोल रहे हों और सीरियि में " ईरानी ठिकानों " पर सारे हमले , काल्पनिक हों क्योंकि ईरान की सैन्य उपस्थिति केवल सीरिया में नहीं बल्कि लेबनान, इराक, यमन और गज़्ज़ा पट्टी में भी बढ़ ही रही है।
दूसरी संभावना यह है कि सीरिया की मज़बूत सेना ने इस प्रकार के सभी हमलों को नाकाम बना दिया हो।
तीसरी संभावना यह है कि सीरिया में ईरान की उपस्थिति इस प्रकार की हो ही न और नेतेन्याहू सीरिया में ईरान की उपस्थिति को बढ़ा – चढ़ाकर पेश कर रहे हों ताकि अमरीका और अरबों से लाभ उठाएं और ईरानी खतरे की बात करके अपने हित साधने की कोशिश कर रहे हों।
अगर नेतेन्याहू का दावा सही होता तो पिछले सात वर्षों के दौरान जितने हमले और जिस तरह के हमले की बात वह कर रहे हैं उसके बाद सीरिया में एक ईरानी जीवित नहीं बचता!
इस अवसर पर नेतेन्याहू ने एक और ध्यान देने वाली बात कही जिससे उनका भय और मजबूरी झलकती है। उन्होंने ईरान को धमकियां देने के बाद यह भी कहा कि हमें ईरान की ओर से एक मुख्य खतरे और चैलेंज का सामना है जो आतंकवाद के रूप में हमारे सामने है और इस्राईली, अपने अस्तित्व के लिए इस खतरे का मिल कर मुक़ाबला करेंगे।
उन के इस वाक्य पर ध्यान देने का जी इस लिए भी और चाहता है कि अमरीका ने हालिया दिनों में इराक़ी स्वंय सेवी बल की 67 इकाइयों को खत्म करने की मांग की है जिसकी मिसाल अतीत में नहीं मिलती। इन लोगों ने दाइश के खिलाफ युद्ध किया है तो अब क्या हो गया जो अमरीका इन गुटों को खत्म करने की अभूतपूर्व मांग कर रहा है?
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अब हुआ यह है कि इराक़ ताक़तवर हो रहा है और यह संगठन, इराक़ से अमरीकी सैनिकों को बाहर निकालने की मांग कर रहे हैं और इस्राईल का खुल कर विरोध कर रहे हैं।
ईरानी बल और उसके सहयोगी, सीरिया सरकार की अपील पर इस देश में गये हैं और उन्होंने सीरियाई सैनिकों के साथ खून बहाया है और उनका यह संकल्प है कि सीरियाई सेना को पूरी तरह से मज़बूत किये बिना वह इस देश से बाहर नहीं जाएंगे क्योंकि जब सीरियाई सेना मज़बूत थी तो इस देश में एक भी ईरानी सैनिक मौजूद नहीं था। एक अरब होने के नाते मुझे यह देख कर बहुत दुख होता है कि नेतेन्याहू हर बैठक में ईरान को तो इस्राईल के अस्तित्व के लिए खतरा बताते हैं लेकिन अरब नेताओं और अरब कमांडरों के साथ वह और उनके जनरल भेंट करते हैं और एक दूसरे से दोस्ती का दम भरते हैं।अब्दुलबारी अतवान, रायुल यौम, लेखक के विचार निजी, पार्स टूडे का सहमत होना आवश्यक नहीं है।)