ट्रम्प पराजित होकर सीरिया की धरती से बाहर निकल रहे हैं। अमरीका को इराक़ से भी अपने सैनिक निकालने होंगे। सैनिक ही नहीं बल्कि अपने अन्य अधिकारियों और विशेषज्ञों को भी उन्हें इराक़ से बाहर निकालना पड़ेगा। अमरीका हार गया। ट्रम्प ने स्वीकार किया कि अमरीका ने मध्यपूर्व के इलाक़े में सात ट्रिलियन डालर ख़र्च कर डाले और उन्हें नतीजे के नाम पर कुछ नहीं मिला। यह कई ट्रिलियन डालर की रक़म विध्वंस पर ख़र्च हुई और अब ट्रम्प अपनी पराजय स्वीकार कर रहे हैं। ट्रम्प चुपके से इराक़ जाने पर मजबूर हैं। आप सोचिए कि एक देश सात ट्रिलियन डालर की रक़म ख़र्च करता है और हालत यह है कि उसी इराक़ की राजधानी में जिसके आज़ाद कराने का अमरीका दावा करता है अमरीकी राष्ट्रपति एलान के साथ जाने की हिम्मत नहीं कर पाता।
इराक़ी प्रशासन ने बहुत अच्छी प्रतिक्रिया दी। इराक़ी सरकार ने ट्रम्प की इस यात्रा को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया और अपना विरोध दर्ज कराया। तो यह साल प्रतिष्ठा की वापसी का साल है।
सीरिया जीत गया है। सीरिया की विजय हुई है क्योंकि उसने डटकर मुक़ाबला किया। आज अरब देश जा जाकर सीरिया का दरवाज़ा खटखटा रहे हैं। फ़टाफ़ट अपने दूतावास खोल रहे हैं। सूडान के राष्ट्रपति उमर अलबशीर ने पहले अरब राष्ट्राध्यक्ष के रूप में दमिश्क़ का दौरा किया है, अब देखना है कि दूसरा राष्ट्राध्यक्ष कौन होगा जो सीरिया के दौरे पर जाएगा?
कुछ अरब देश यह इशारा दे रहे हैं कि वह दमिश्क़ में अपने दूतावास इसलिए खोल रहे हैं कि सीरिया को ईरान से दूर कर सकें! आप यह किस प्रकार की बात कर रहे हैं क्या आपने लोगों को बेवक़ूफ़ समझ रखा है?! आपने संकट से पहले दसियों अरब डालर सीरिया पर लुटा दिए कि उसे ईरान से दूर कर सकें। मगर सीरिया ने साफ़ कर दिया कि वह ईरान से दूर होने के लिए तैयार नहीं है वह ईरान का स्ट्रैटेजिक पार्टनर है। इसके बाद आपने यह ठान लिया कि हम सीरिया को सबक़ सिखाएंगे। हम सीरियाई सरकार की गर्दन तोड़ देंगे! हम सीरिया में सरकार बदल देंगे। यहां हम सऊदी अरब के पूर्व विदेश मंत्री आदिल अलजुबैर को याद करना चाहेंगे। वह कहां पहुंच गए? वह हमेशा यही वाक्य रटते रहते थे कि बश्शार असद को जाना होगा सैनिक मार्ग से या राजनैतिक मार्ग से! यह सब कुछ किया और उसके बाद आज आप कह रहे हैं कि हम सीरिया को ईरान से दूर करेंगे! यह लोग किस प्रकार की बातें कर रहे हैं?! यह आपकी क्या राजनीति है? यह आपकी कैसी रणनीति है? ईरान ही तो वह देश है जिसने सीरिया को बचाया। ईरान, रूस और हिज़्बुल्लाह ने सीरिया की रक्षा की और उनकी मदद से सीरिया ने भयानक अमरीकी साज़िश का मुक़ाबला किया और आख़िरकार सीरिया को विजय मिली। आप आज कह रहे हैं कि सीरिया को ईरान से दूर करना है! आप सीरिया के सामने शर्तें रखने की पोज़ीशन में हैं?!
सीरियाई सेना मिन्बिज में दाख़िल हो चुकी है। कुर्द फ़ोर्सेज़ ने सीरियाई सेना से मदद मांगी और सीरियाई सेना वहां पहुंच गई। अब तुर्क अधिकारी इस पर आपत्ति क्यों कर रहे हैं। मिन्बिज तो सीरिया का शहर है। सीरियाई सेना को अधिकार है कि वह मिन्बिज ही नहीं इदलिब और हर इलाक़े में जाए और उसे अपने नियंत्रण में ले। जिस तरह दयार बक्र शहर या इस्तांबूल शहर तुर्की के शहर हैं उसी तरह मिन्बिज इफ़्रीन और इदलिब सीरिया के शहर मैं। तुर्की को इस पर आपत्ति करने का अधिकार नहीं है।
अब नया चरण शुरू हो चुका है। नया चरण यह है कि इस्लामी प्रतिरोधक मोर्चा विजयी हो चुका है। इस्लामी प्रतिरोधक मोर्चे में ईरान है, हिज़्बुल्लाह है, सीरिया है, फ़िलिस्तीनी संगठन हैं। यह मोर्चा विजयी हो चुका है और नए साल में नई सफलताएं भी हासिल करने वाला है। दूसरी ओर इस्राईल गहरी चिंता में है, इस्राईल कांप रहा है। इलाक़े में जो बदलाव आया है उससे इस्राईल की नींद उड़ गई है। इमारात और क़तर जैसे देश जितना चाहें इस्राईल से दोस्ती बढ़ाएं उन्हें आख़िरकार पछताना पड़ेगा क्योंकि पूरे इलाक़े के हालात बदल गए हैं।
इस्राईल ने हालिया दिनों दमिश्क के पश्चिम में स्थित सैनिक ठिकाने पर 16 मिसाइल फ़ायर किए जिनमें से 14 मिसाइल सीरियाई एयर डिफ़ेन्स सिस्टम ने हवा में ही मार गिराए। दो मिसाइल सैनिक ठिकाने के ग़ैर महत्वपूर्ण भाग में गिरे। अब अगर इस्राईल ने फिर लेबनान की वायु सीमा का प्रयोग करके सीरिया के किसी भी ठिकाने पर इस प्रकार का कोई हमला किया तो लेबनानी सीमा के भीतर ही इस्राईली विमानों को निशाना बनाया जाएगा। इसीलिए हम कहते हैं कि यह हमला इस्राईल का आख़िरी हमला साबित हो सकता है। क्योंकि ज़माना बदल गया है। रूस ने भी इस हमले पर इस्राईल को कठोर संदेश दिया है और यह कठोर संदेश इस्राईल को भलीभांति पहुंच गया है। इस्राईल पर भय छा गया है। इस्राईल ने दक्षिणी लेबनान के इलाक़े में सुरंगों का मुद्दा उठाया और इन सुरंगों के लिए हिज्बुल्लाह की ओर आरोप की उंगली उठाई। इस्राईल सुरक्षा परिषद में एक निंदा प्रस्ताव पारित नहीं करवा सका क्योंकि वह अपने दावे के पक्ष में एक भी साक्ष्य पेश नहीं कर पाया।
हम अरबों के लिए इन हालात से क्या पाठ मिलता है। यह पाठ मिलता है कि हमें अपने भीतर आत्म विश्वास पैदा करना चाहिए। हमें इस्लामी प्रतिरोध मोर्चे का हिस्सा बनना चाहिए। यही मोर्चा है जिसने इस्राईल बुरी तरह डरा दिया है। इसी मोर्चे ने ताक़त के समीकरणों को बदल दिया है। अब वह ज़माना गुज़र चुका है जब कुछ अरब देश अपने पैसों से समीकरण बनाते थे और बदलते थे। अब इस्लामी प्रतिरोध मोर्चे का ज़माना है।
यह नया साल सफलताओं का साल है, यह साम्राज्यवादी शक्तियों की पराजय का साल है, यह इस्राईली एजेंडे की पराजय का साल है।
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक अब्दुल बारी अतवान की संपादित टिप्पणी