अपनी इसी नीति के तहत इस्लामी गणतंत्र ईरान ने तालेबान से कई बार संपर्क किया है और आगे भी यह सिलसिला जारी रहेगा। ईरान की उच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली शमख़ानी ने जब यह बयान दिया तो बहुत से लोगों को इस पर हैरत हुई क्योंकि ईरान ने तालेबान को कभी मान्यता नहीं दी। इस बिंदु को काबुल में ईरान के राजदूत ने स्पष्ट किया। राजदूत का कहना था कि ईरान अब भी तालेबान को मान्यता नहीं देता इसीलिए हमने तालेबान से केवल संपर्क किया संबंध स्थापित नहीं किया। संपर्क करने का उद्देश्य भी यह था कि तालेबान को शांति प्रक्रिया में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
अली शमख़ानी ने काबुल में कहा कि तालेबान से ईरान ने जो भी संपर्क किया और जो भी वार्ता की उससे काबुल सरकार को सूचित किया गया। उनका कहना था कि ईरान क्षेत्र में शांति व स्थापना का एक स्तंभ है और अपनी इसी भूमिका के तहत वह सहयोग कर रहा है। उनका कहना था कि दोनों देशों के बीच सहयोग से अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा समस्याओं को हल करने में मदद मिलेगी।
यह पहला मौक़ा है जब ईरान ने तालेबान से अपनी किसी वार्ता और संपर्क का एलान किया है।
पिछले हफ्ते अबू धाबी में तालेबान और अमरीका की वार्ता हुई जिसमें सऊदी अरब, इमारात, अफ़ग़ानिस्तान सरकार और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
बातचीत का यह सिलसिला एसे समय तेज़ हुआ है जब अमरीका अफ़ग़ानिस्तान से अपने 7 हज़ार सैनिकों को वापस बुलाने की बात कर रहा है। अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिकों की संख्या 14 हज़ार से कुछ ज़्यादा बताई जाती है।
अमरीका अपने सैनिकों को वापस ले जाना चाहता है तो यह सवाल फिर सामने आ रहा है कि उसने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला और क़ब्ज़ा किस लक्ष्य से किया था। क्या अमरीका का लक्ष्य आतंकवाद को परास्त करना था? अगर यह लक्ष्य था तो अमरीका इसमें नाकाम रहा।
एक विचार यह है कि अमरीका वास्तव में अपने कुछ मज़बूत ठिकाने बनाने की कोशिश में था ताकि क्षेत्रीय देशों को कंट्रोल कर सके। यदि यह लक्ष्य था तब भी अमरीका को नाकाम ही हाथ लगी है क्योंकि क्षेत्रीय देशों की शक्ति लगातार बढ़ रही है और पूरे इलाक़े में अमरीका की स्थिति कमज़ोर होती जा रही है। यह बात ख़ुद अमरीकी थिंक टैंक भी स्पष्ट शब्दों में कह रहे हैं।
बहरहाल अमरीका का लक्ष्य जो भी रहा हो यह निश्चित है कि उसे नाकामी ही हाथ लगी है और वह किसी भी तरह अपनी विफल योजनाओं से जान छुड़ाना चाहता है।
अफ़ग़ानिस्तान की भौगोलिक स्थिति एसी है कि क्षेत्रीय देशों के लिए इस देश की सुरक्षा और स्थिरता का बहुत महत्व है। इस्लामी गणतंत्र ईरान की तो साढ़े नौ सौ किलोमीटर लंबी ज़मीनी सीमा अफ़ग़ानिस्तान से मिलती है। इसीलिए इस्लामी गणतंत्र ईरान अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा को विशेष महत्व देता है।
अफ़ग़ानिस्तान इस समय एक अंतरिम दौर से गुज़र रहा है और क्षेत्रीय देशों के लिए यह बिंदु महत्वपूर्ण है कि यह देश सही दिशा में आगे जाए और अपनी आंतरिक समस्याओं से सफलता के साथ निपटे, इसकी हालत लीबिया जैसी न हो।