अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणा पत्र 10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में पारित हुआ था। यह दस्तावेज़ दूसरे विश्व युद्ध के बाद पारित हुआ जिसमें पहली बार सभी इंसानों को निर्धारित अधिकार दिए जाने की बात कही गई। इस घोषणा पत्र में 30 अनुच्छेद हैं जिनमें मानवाधिकार के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ के दृष्टिकोण को रेखांकित किया गया है।
इस समय यमन में जो कुछ हो रहा है वह सऊदी अरब के सैनिक गठबंधन के हाथों बहुत बड़े पैमाने पर और बहुत आलोचनीय ढंग से मानवाधिकारों के हनन और युद्ध अपराध का नमूना है। सऊदी अरब ने मार्च 2015 से यमन पर युद्ध थोप कर इस ग़रीब देश को बहुत नुक़सान पहुंचाया लेकिन दूसरी ओर यह भी सच्चाई है कि यमन की जनता, सेना और स्वयंसेवी बलों ने ज़ोरदार प्रतिरोध दिखाया जिसके चलते हमलावर एलायंस की सारी योजना फ़ेल हो गई। यमन युद्ध के कारण इस समय सऊदी अरब की दुनिया भर में आलोचना हो रही है और वरिष्ठ सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या के बाद आलोचनाओं का क्रम और भी तेज़ हो गया है।
भारी दबाव के चलते सऊदी अरब को यमन संकट पर शांति वार्ता की अनुमति देनी पड़ी लेकिन स्वेडन में जारी शांति वार्ता में भी वह तत्व रुकावट डाल रहे हैं जिन्हें सऊदी अरब का समर्थन हासिल है। यमन की सनआ सरकार का प्रतिनिधिमंडल इस वार्ता में इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि देश के भीतर एक अंतरिम सरकार बने जिसमें सभी दलों और पक्षों का प्रतिनिधित्व है और फिर यह सरकार देश का संचालन संभाले, सारे पक्ष अपने हथियार इसी सरकार को सौंपे तथा अगले चरण में चुनावों के आयोजन और नई सरकार के गठन जैस विषयों और उपायों के बारे में बातचीत हो मगर सऊदी अरब समर्थित पक्ष इस बात पर अड़ा हुआ है कि सबसे पहले यमन की सेना और स्वयंसेवी बल हथियार डल दें।
इस स्थिति को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि किस तरह सऊदी अरब और उसके द्वारा समर्थित तत्व यमन के संकट के संबंध में संवेदनहीनता का प्रदर्शन कर रहे हैं।