संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकारियों ने जिनमें यमन के मामलों में सुयक्त राष्ट्र के विशेष दूत मार्टिन ग्रीफ़िथ्स भी शामिल हैं, कई बार मांग की कि यमन पर हमले बंद हों और शांति वार्ता शुरू हो लेकिन अब तक सऊदी गठबंधन ने अपने हमले बंद नहीं किए हैं।
इस समय यमन शांति वार्ता के प्रयास एसी स्थिति में शुरू किए गए हैं कि यह आशा की जा रही थी कि अंतर्राष्ट्रीय दबाव को देखते हुए सऊदी अरब अपने हमले बंद कर देगा लेकिन सऊदी गठबंधन अब भी अपनी ज़िद पर अड़ा हुआ है। सऊदी अरब अब तक कई बार शांति वार्ता के कार्यक्रम को भी हाई जैक कर चुका है।
फ़्रांसीसी मैगज़ीन लिब्रेशन ने अपने एक लेख में लिखा कि सऊदी अरब के रवैए को देखते हुए एसा लगता है कि यमन में शांति बहाल करने की संयुक्त राष्ट्र संघ की कोशिशें सफल नहीं हो पाएंगी।
यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन ने हालिया दिनों एलान कर दिया था कि वह देश में शांति चाहता है और इसी उद्देश्य से सऊदी अरब और इमरात पर अपने जवाबी मिसाइली और ड्रोन हमले रोक रहा है। इस तरह अंसारुल्लाह ने तो शांति स्थापना की संयुक्त राष्ट्र की कोशिशों में अपने व्यवहारिक सहयोग का सुबूत पेश कर दिया मगर सऊदी गठबंधन ने यमन पर हमले जारी रखे हैं।
टीकाकार यह कहते हैं कि सऊदी अरब के अनुभवहीन क्राउन प्रिंस ने यमन युद्ध छेड़ कर अपनी साख दांव पर लगा दी। बिन सलमान को यह लग रहा था कि ग़रीब देश यमन को परास्त करके वह क्षेत्रीय स्तर पर भी और देश के भीतर भी अपनी साख मज़बूत कर लेंगे। मगर नतीजा वह नहीं निकला जो बिन सलमान चाहते थे। यमन के किसी भी मोर्चे पर सऊदी अरब को कोई भी सफलता नहीं मिल पायी है अलबत्ता मानवाधिकारों के हनन की सऊदी अरब की लंबी सूची और भी लंबी ज़रूर हो गई है।
मुहम्मद बिन सलमान न क्षेत्रीय स्तर पर अपनी शक्ति का लोहा मनवा सके और न ही देश के भीतर लोगों को अपने निर्णयों से प्रभावित कर सके। यही नहीं बिन सलमान के निर्णय तो इतने ग़लत साबित हुए कि सऊदी अरब के घटकों को भी लगने लगा कि बिन सलमान सऊदी अरब को डुबो देंगे। वरिष्ठ सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की निर्मम हत्या करवाकर बिन सलमान ने अपने विरोधियों को कड़ा संदेश देना चाहा मगर उनके इस कृत्य से सारी दुनिया में दरिंदगी का संदेश गया और विश्व स्तर पर बिन समलान का विरोध होने लगा।