मगर हमें इतना तो ज़रूर पता है कि जो भी सलाहकार हैं उन्होंने बिन सलमान को ग़लत मशविरा दिया और उन्हें इस क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय यात्रा पर जाने के लिए प्रोत्साहित किया जो गुरुवार को संयुक्त अरब इमारात की यात्रा से शुरू हुई।
बिन सलमान बहरैन भी गए और इसके बाद वह मिस्र, ट्यूनीशिया, अलजीरिया और मोरीतानिया जाएंगे। आख़िर में वह अर्जेन्टीना की राजधानी ब्यूनस आयरस जाएंगे जहां गुट-20 का शिखर सम्मेलन आयोजित होने वाला है।
यह तो ज़ाहिर है कि इस यात्रा का उद्देश्य यह संदेश देना है कि क्राउन प्रिंस को जमाल ख़ाशुक़जी हत्याकांड के बाद क्षेत्रीय देशों और विश्व स्तर पर आने वाली कठोर प्रतिक्रिया की कोई चिंता नहीं है, वह अब भी सऊदी अरब के शासक हैं, उन्हें किसी ख़तरे का सामना नहीं है, न ही कोई अंदरूनी साज़िश चल रही है जैसा कि कुछ मीडिया गलियारों में अटकलें है। मगर इस यात्रा पर जो प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी है उनको देखते हुए लगता है कि इस यात्रा का नतीजा बिल्कुल उलटा हो जाएगा क्योंकि इस यात्रा से उन घावों पर नमक छिड़क उठेगा जिनके लिए मुहम्मद बिन सलमान को ज़िम्मेदार माना जाता है।
हम यह तो मानते हैं कि इमारात, बहरैन इसी तरह मिस्र की यात्रा में मुहम्मद बिन सलमान को किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं होगी क्योंकि यह देश सऊदी अरब के घटक समझे जाते हैं मगर जब वह ट्यूनीशिया, अलजीरिया और मोरीतानिया की यात्रा पर जाएंगे तो स्थिति कुछ और होगी क्योंकि वहां मज़बूत राजनैतिक दल और संस्थाएं पायी जाती हैं तथा सक्रिय विपक्ष मौजूद है, वहां मीडिया भी प्रभावी भूमिका में है जबकि जनता की बात की जाए तो उसे मुहम्मद बिन सलमान और उनकी नीतियों से तनिक भी हमदर्दी नहीं है।
अब समस्या केवल यह नहीं है कि वरिष्ठ पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की गला दबाकर हत्या कर दी गई, उनके अंगों को काटा गया और फिर उसे एसिड से गलाकर का बहा दिया गया बल्कि सबसे बड़ा विवाद तो यह है कि अरब देशों को इस्राईल से दोस्ती के लिए तैयार करने में सऊदी अरब और ख़ुद मुहम्मद बिन सलमान की मुख्य भूमिका की बात सामने आ रही है।
अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने जो बिन सलमान के पक्के समर्थक माने जाते हैं इस मामले में बड़ी बेवक़ूफ़ी वाला बयान दिया जिसमें उन्होंने कहा कि यदि सऊदी अरब न होता तो इस्राईल का अस्तित्व बाक़ी न रह पाता। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि मुहम्मद बिन सलमान का क्राउन प्रिंस के पद पर बने रहना अमरीका और इस्राईल के हित में है। उनके बयान से अंग्रेज़ी की यह कहावत याद आती है कि एसे दोस्तों के होते हुए दुशमनों की क्या ज़रूरत है?!
अब तक सऊदी अरब से कोई औपचारिक बयान जारी नहीं हुआ जिसमें यह कहा गया है कि बिन सलमान ट्यूनीशिया, अलजीरिया और मोरीतानिया की यात्रा करेंगे और न ही मेज़बान देशों ने इस बारे में कुछ कहा है मगर इन देशों की सिविल सोसायटी ने इस यात्रा को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया है और प्रदर्शन करके तथा हस्ताक्षर अभियान चलाकर बता दिया है कि देश की जनता बिन सलमान को कदापि पसंद नहीं करती। यह ख़ामोशी हो सकता है कि यात्रा के निरस्त हो जाने का कारण बने।
हम अपनी इस बात के विवरण में यह कहना चाहते हैं कि अलजीरिया के वकीलों ने इस यात्रा को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया है और एक बयान जारी करके कहा है कि वह इस यात्रा को इस्राईल से दोस्ती के लिए भूमि समतल करने की कोशिश के रूप में देखते हैं। संगठन के प्रवक्ता ने कहा कि सऊदी क्राउन प्रिंस का हम कदापि स्वागत नहीं करते क्योंकि उन्होंने यमन की जनता का जनसंहार किया, क्षेत्र के सीरिया और लीबिया जैसे देशों बल्कि पूरे इलाक़े को तबाह करके रख दिया। मोरीतानिया में रेफ़ाह पार्टी के अध्यक्ष मुहम्मद वल्द फ़ाल ने कहा कि राजनैतिक दलों और हस्तियों की ओर से मांग की जा रही है कि इस यात्रा का पूरी तरह बहिष्कार किया जाए। एक ट्यूनीशियाई सांसद ने एक प्ले कार्ड उठाया जिस पर लिखा था कि देश की संसद में आपका कोई स्वागत नहीं है। ट्यूनीशिया के कई सामाजिक संगठनों ने भी मंगलवार को प्रदर्शन करके कहा कि वह बिन सलमान की ट्यूनीशिया यात्रा का विरोध करते हैं। मिस्र में भी विरोधियों ने बिन सलमान की यात्रा का विरोध किया।
अर्जेन्टीना में गुट-20 की शिखर बैठक में क्या हो सकता है इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी। वहां कुछ एसे नेता भी पहुंच रहे हैं जिन्होंने बिन सलमान से मिलने की योजना का एलान किया है इनमें पुतीन, ट्रम्प और अर्दोगान शामिल हैं लेकिन फ़्रांस के राष्ट्रपति मैकक्रां, जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल, ब्रिटश प्रधानमंत्री टेरेज़ा मे और कैनेडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने इस बारे में कुछ भी नहीं कहा है अतः वहां बिन सलमान के लिए नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह की स्थितियां हो सकती हैं। नकारात्मक बातों की संभावना ज़्यादा है।
इस समय हमारे सामने दो मोर्चे दिखाई देते हैं। एक मोर्चा ट्रम्प संभाले हुए हैं जो बिन सलमान को बेगुनाह ज़ाहिर करना चाहते हैं और दूसरा मोर्चा उन्हें जघन्य अपराधी के रूप में पेश करके सऊदी अरब पर प्रतिबंध लगवाना चाहता है यह दूसरा मोर्चा तुर्क राष्ट्रपति अर्दोग़ान ने संभाल रखा है जबकि इस मोर्चे में अमरीकी कांग्रेस तथा अमरीकी और यूरोपीय मीडिया भी शामिल है।
हम यह भी मानते हें कि धन बहुत बड़ी शक्ति है और सौदे हमेशा मानवाधिकार के मूल्यों से आगे बढ़ जाते हैं मगर उस सिविल सोसायटी और संसदीय शक्ति को भी कम नहीं समझना चाहिए जिसे मीडिया विशेष रूप से इकानामिस्ट, वाशिंग्टन पोस्ट, गार्डियन, इंडिपेन्डेंट जैसे मीडिया हाउसेज़ का समर्थन हासिल है और जो ख़ाशुक़जी की हत्या के लिए बिन सलमान को ज़िम्मेदार मानते हैं।
बिन सलमान की क्षेत्रीय यात्रा का दो में से एक नतीजा हो सकता है। या तो उन्हें विश्व समुदाय में वापसी का मौक़ मिल जाएगा या फिर उन्हें बिल्कुल हाशिए पर डाल दिया जाएगा बल्कि शायद पद से हटा दिया जाएगा। एक तीसरा विकल्प इन दोनों के बीच का है और वह यह कि बिन सलमान अपने पद पर कमज़ोर स्थिति में बाक़ी रहें। होता क्या है यह आने वाले दिनों में स्पष्ट हो जाएगा।
अब्दुल बारी अतवान
अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार