कुवैत के सरकारी बयान में कहा गया है कि तुर्की कुवैत सामरिक सहयोग समिति की पांचवीं बैठक में दोनों देशों के सेनाधिकारियों के बीच वर्ष 2019 के लिए संयुक्त सामरिक सहयोग के रोडमैप पर हस्ताक्षर हुए हैं जिसका लक्ष्य आपसी सामरिक सहयोग को मज़बूत करना है।
कुवैत की समाचार एजेंसी ने जिसने इस समझौते की रिपोर्ट दी है यह भी बताया है कि कुवैत के डिप्टी चीफ़ आफ़ आर्मी स्टाफ़ और उनके तुर्क समकक्ष जनरल इमूत येलदीर ने समझौते पर हस्ताक्षर किए इस समझौते के तहत सैनिक अनुभवों का आदान प्रदान होगा। इस बारे में और ब्योरा नहीं दिया गया।
कुवैत के सूत्रों का कहना है कि इस संभावना को ख़ारिज नहीं किया जा सकता कि तुर्क सेना की कुवैत में तैनाती हो जाए और कुवैत तुर्की से हथियार ख़रीदे जिस तरह क़तर और तुर्की के बीच सामरिक समझौता है और इस समझौते के तहत तुर्की ने क़तर का उस समय साथ दिया जब सऊदी अरब, इमारात, बहरैन और मिस्र ने बहिष्कार कर दिया और उसकी नाकाबंदी कर दी। यहां तक कहा गया कि तुर्की ने इस तरह क़तर को सैनिक हमले से बचा लिया। यह बात कुवैत के शासक शैख़ सबाह अलअहमद अलजाबिर ने कही थी कि उनके देश की मध्यस्थता के कारण युद्ध का ख़तरा टल गया।
इस समय क़तर में तुर्की के 35 हजार सैनिक तैनात बताए जाते हैं जो भारी हथियारों से लैस हैं। तुर्की ने नाकाबंदी के विनाशकारी प्रभावों से क़तर को बचाने में बहुत प्रभावी भूमिका अदा की है। इसके बदले में क़तर ने यह किया कि जब तुर्की पर आर्थिक संकट मंडराने लगा तो तुर्की की करेंसी को संभालने के लिए वहां 15 अरब डालर का निवेश कर दिया और तुर्की का लीरा किसी हद तक संभल गया।
इससे पहले तुर्की के शहर अंतालिया में यूरेशियाई देशों के संसद सभापतियों की बैठक में कुवैत के संसद सभापति मरज़ूक़ ग़ानिम ने कहा कि तुर्की कोई बनाना रिपब्लिक नहीं है वह वर्तमान आर्थिक युद्ध से विजयी होकर निकलेगा।
पहले संसद सभापति का यह बयान और अब दोनों देशों के बीच सामरिक समझौता महत्वपूर्ण है।
पहली बात तो यह है कि समझौता एसे समय हुआ है जब सऊदी अरब और तुर्की के संबंध सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी के ग़ायब हो जाने के कारण बहुत ख़राब हैं। दूसरी बात यह है कि तुर्की और कुवैत एक दूसरे के क़रीब एसे समय में आ रहे हैं कि जब सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान की कुवैत यात्रा पूरी तरह नाकाम हो गई। दो दिन के बजाए यह यात्रा दो घंटों में ख़त्म हो गई।
तीसरी बात यह है कि सऊदी राजकुमार ख़ालिद बिन अब्दुल्लाह बिन फ़ैसल बिन तुर्की आले सऊद ने ट्वीट करके हंगामा खड़ा कर दिया कि यमन की तरह कुवैत को भी एक संकल्प तूफ़ान की ज़रूरत है जो आंतरिक रूप से होना चाहिए।
एसा लगता है कि फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद में शामिल देश पूरी तरह बंट चुके हैं। एक तरफ़ सऊदी अरब, इमारात और बहरैन हैं तो दूसरी ओर कुवैत, ओमान और क़तर हैं। इसी प्रकार क़तर की तरह और अब कुवैत भी तुर्की के क़रीब हो गया है।