नौं और दस मोहर्रम को पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों से श्रद्धा रखने वाले लोग विशेष रूप से शीया समुदाय के लोग दुनिया के कोने कोने में शोक सभाएं आयोजित करते हैं, मजलिस का आयोजन करते हैं और जुलूस निकालते हैं। जबकि इस अवसर पर कर्बला में एक अलग ही वातावरण होता है जहां इमाम हुसैन और उनके साथियों को शहीद कर दिया गया।
कर्बला में बिल्कुल अलग अंदाज़ से शोक कार्यक्रम होते हैं। इस समय पूरा कर्लबा शहर काले कपड़ों और शोक में डूबा हुआ दिखाई देता है। कर्बला शहर के भीतर भी और कर्बला जाने वाले मार्गों पर भी श्रद्धालुओं के स्वागत और विश्राम के लिए केन्द्र बनाए गए हैं जिन्हें मौकिब कहा जाता है। कर्बला के भीतर इमाम हुसैन और हज़रत अब्बास के रौज़ों की ओर जाने वाली सड़कों पर श्रद्धालुओं का एक सैलाब लगातार रवां दवां दिखाई देता है।
श्रद्धालुओं की बहुत बड़ी संख्या कर्बला पहुंच चुकी है जबकि अब भी कर्बला ओर श्रद्धालुओं की भीड़ प्रवाहित है। लोग कर्बला पहुंच कर आशूर की घटना को याद करना और पैग़म्बरे इस्लाम तथा उनके परिजनों से संवेदना व्यक्त करना चाहते हैं।
इराक़ के नजफ़, बग़दाद और बसरा नगरों इसी प्रकार ईरान सीरिया, लेबनान, अफ़गानिस्तान, भारत पाकिस्तान यही नहीं अफ़्रीक़ी देशों जैसे मोरीतानिया और नाइजेरिया से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु कर्बला पहुंचे हैं। यह इमाम हुसैन की धरती है जिसके लिए सबका दिल धड़कता है।