लेबरमैन ने कहा कि हम अपने आप को केवल सीरिया की धरती तक सीमित नहीं रखेंगे यह बात बिल्कुल स्पष्ट रहनी चाहिए, हम ईरानी ख़तरे से निपटेंगे, फिर वह चाहे जहां भी हो।
यह बात तो सही है कि लेबरमैन ने उन लक्ष्यों का निर्धारण नहीं किया जिन्हें वह निशाना बनाने की बात कर रहे हैं लेकिन हम यह समझते हैं कि इराक़ उनमें सर्वोपरि है जबकि अन्य देशों विशेष रूप से तीसरी दुनिया के देशों में ईरानी दूतावासों पर आतंकी हमले भी इस्राईल की योजना का हिस्सा हो सकते हैं।
यह धमकी बताती है कि इस समय इस्राईल के राजनैतिक और सैनिक नेतृत्व में किस प्रहार की निराशा और बौखलाहट फैली हुई है। क्योंकि सीरिया में ईरानी कहे जाने वाले ठिकानों पर मिसाइल हमले और बमबारी से इस्राईल ईरान को सीरिया से बाहर निकालने में सफल नहीं हो सका बल्कि इसका उलटा नतीजा निकला है।
ईरान और सीरिया के नेतृत्व ने इस्राईली हमलों को सहन किया और संयम का प्रदर्शन किया ताकि इस्राईल को सीरिया की धरती पूरी तरह आज़ाद कराने के लिए जारी युद्ध के पूरा होने से पहला नया युद्ध छेड़ देने का मौक़ा न मिल जाए। इस समय इदलिब और फ़ुरात नदी के पूर्वी इलाक़े अभी आतंकियों के कब़्ज़े से आज़ाद कराए जाने हैं।
लेबरमैन चाहते हैं कि ईरान कोई एसी सैनिक कार्यवाही कर दे जो अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की योजना में मददगार बन जाए। ट्रम्प की योजना भी वास्तव में इस्राईली योजना ही है कि किसी तरह ईरान पर हमला हो जाए और ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध कठोर हो जाएं। शायद यही कारण है कि इस्राईली विदेश मंत्री इराक़, दक्षिणी लेबनान या फिर ख़ुद सीरिया में ईरानी लक्ष्यों को निशाना बनाने की बात करते हैं।
इस्राईल ने जो संदेश दिया है वह अपने गंतव्य अर्थात ईरानी नेतृत्व तक निश्चित रूप से पहुंच गया होगा लेकिन इसका कोई असर नहीं होगा। ईरान में तीन देशों, ईरान, तुर्की और रूस का शिखर सम्मेलन होने वाला है जिसमें इलाक़े के नए नक़्शे के बारे में विचार विमर्श होगा क्योंकि इस इलाक़े में अमरीका का वर्चस्व बहुत तेज़ी से सिमटता जा रहा है।
यह बात अब किसी से ढंकी छिपी नहीं है कि इस्राईल अपने आप को इस हालत में नहीं देख रहा है कि वह ईरान से युद्ध की हिम्मत करे। इस्राईल तो किसी तरह इस कोशिश में है कि हमास संगठन से उसका कोई युद्ध न हो क्योंकि हालिया दिनों हमास ने इस्राईली हमलों के जवाब में 100 से अधिक मिसाइल बरसा दिए और ज़ायोनियों को पूरी पूरी बस्तियां ख़ाली करनी पड़ गईं। इस स्थिति में इस्राईल किसी बड़े हमले को कैसे सहन कर पाएगा।
यह भी निश्चित है कि इस्राईल को अपनी गरदन में फंदा तंग होता नज़र आ रहा है क्योंकि इलाक़े के हालात जिस रुख़ पर जा रहे हैं उसमें इस्राईल के लिए अपना अस्तित्व बचाना मुश्किल नज़र आ रहा है।