13 अगस्त 2018 - 19:22
ईरान के सुप्रीम लीडर का दो टूक जवाबः अमरीका से कोई वार्ता नहीं करेंगे, किसी युद्ध का कोई ख़तरा नहीं है

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई ने सोमवार को विभिन्न वर्गों से संबंध रखने वाले हज़ारों लोगों की सभा को संबोधित करते हुए देश के हालात और अमरीका की साज़िशों और ईरान की भावी नीति के बारे में विस्तार से बात की।

ईरान की करेन्सी का मूल्य गिरने के संबंध में ईरान के सुप्रीम लीडर का यह कहना था कि इसका कारण केवल आर्थिक प्रतिबंध नहीं बल्कि आंतरिक प्रबंधन की ख़ामियां भी हैं जिनसे बचा जा सकता था। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध ठोस कार्यवाही की जानी चाहिए और साथ ही न्याय का मानकों और क़ानून का पूरा पूरा ख़याल रखा जाना चाहिए।
हालिया दिनों अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प और विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो की तरफ़ से वार्ता के संबंध में बयान आए ट्रम्प ने कहा कि वह ईरान के राष्ट्रपति से बग़ैर किसी शर्त के वार्ता के लिए तैयार हैं और यह वार्ता ईरान, अमरीका तथा पूरी दुनिया के लिए बहुत अच्छी साबित होगी वहीं पोम्पेयो ने अपने बयान में कहा कि वार्ता  के लिए अमरीका की कुछ शर्तें हैं। इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता का इस संदर्भ में कहना था कि अमरीका के साथ वार्ता नहीं की जा सकती क्योंकि वार्ता से अमरीकियों का तात्पर्य यह होता है कि दूसरा पक्ष उनके साथ वार्ता की मेज़ पर बैठे और अमरीका की सारी बातें मान ले। अमरीकी ताक़त और धन के बल पर वार्ता करते हैं, अपने लक्ष्य पहले ही तय कर लेते हैं और उन लक्ष्यों से एक इंच भी पीछे हटने पर तैयार नहीं होते उनकी कोशिश होती है कि दूसरा पक्ष उनकी सारी बातें मान ले और अब अमरीकी और भी बेशर्म और दुस्साहसी हो गए हैं वर्तमान धोखेबाज़ सरकार से क्या वार्ता हो सकती है। इमाम ख़ुमैनी ने भी अमरीका से बातचीत से मना किया था और मैं भी अमरीका से बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद कर रहा हूं।
इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता के इस बयान से इन अटकलों पर विराम लग गया है कि सितम्बर महीने में ईरान और अमरीका के बीच वार्ता हो सकती है। इस्राईली मीडिया ने यह अफ़वाह फैलाई थी कि सितम्बर के आख़िर में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के अधिवेशन के अवसर पर अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प और ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी की वार्ता हो सकती है।
इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने अपने भाषण में इस बिंदु का भी हवाला दिया कि एक अमरीकी अधिकारी युद्ध की धमकी देता है तो दूसरा वार्ता की बात करता है। युद्ध की बात करते हैं ताकि डरपोक लोग डर जाएं। इस संदर्भ में दो जनता से कहना चाहता हूं कोई युद्ध नहीं होने वाला है और हम कोई वार्ता नहीं करेंगे।
यदि इस भाषण पर ध्यान दिया जाए तो इस्लामी गणतंत्र ईरान की आगे की रणनीति पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है। इससे साफ़ हो जाता है कि अमरीका ने ईरान के संबंध में जो रवैया अपना रखा है और इस रवैए से वह जो लक्ष्य हासिल करना चाहता है वह कदापि हासिल नहीं कर पाएगा।
अमरीका ने उत्तरी कोरिया के संबंध में यह किया कि पहले तो उसे धमकियां दीं और फिर वार्ता का प्रस्ताव दिया। वार्ता हो भी गई लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला। कहा जाता है कि कोरिया के मामले में हालात ट्रम्प और ऊन की वार्ता से पहले जैसे ही हैं कुछ भी नहीं बदला है।
ट्रम्प प्रशासन को यह ग़लत फ़हमी है कि उसने उत्तरी कोरिया को अपनी चाल में फंसा लिया और यही चाल वह ईरान के मामले में भी आज़माना चाहता है। लेकिन स्थिति यह है कि यह चाल ईरान के संबंध में कामयाब होने वाली नहीं है और न ही उत्तरी कोरिया के मामले में अमरीका की चाल का कोई नतीजा मिला है।
इस्लामी गतणंत्र ईरान तो 1979 से अमरीका के प्रतिबंधों और धौंस धमकी का सामना करता आ रहा है जब अमरीका आज की तुलना में काफ़ी ताक़तवर था और ईरान की इस्लामी लोकतांत्रिक व्यस्था के पास वर्तमान समय वाली शक्ति नहीं थी। तो अब जब हालात बदल चुके हैं। अमरीका के पांव पश्चिमी एशिया के पूरे इलाक़े से उखड़ रहे हैं और ईरान का प्रभाव पूरे इलाक़े में बढ़ रहा है तो कैसे संभव है कि ईरान अमरीका की धौंस में आ जाएगा।
यह सही है कि अमरीका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए हैं लेकिन यह भी सही है कि दुनिया के अधिकतर देशों ने इन प्रतिबंधों को मानने से इंकार कर दिया है। यहां तक कि यूरोपीय देश जो अमरीका के पारम्परिक घटक हैं उन्होंने भी इन प्रतिबंधों का पालन करने से इंकार किया है।
ईरान के सुप्रीम लीडर के भाषण को देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि ईरान के नेतृत्व को पूरा विश्वास है कि वह आर्थिक समस्याओं को हल कर लेगा और यह भी यक़ीन है कि अमरीका में इतनी हिम्मत नहीं है कि ईरान से युद्ध करे।