30 नवंबर 2014 - 20:09
 क्या इस्राईल का झंडा जलाना बहरैन के क़ानून के ख़िलाफ़ है?

बहरैन के संसद सभापति ने इस देश के एक पूर्व सांसद की ओर से अंतर संसदीय संघ में की गयी शिकायत का जवाब दिया है।

बहरैन के संसद सभापति ने इस देश के एक पूर्व सांसद की ओर से अंतर संसदीय संघ में की गयी शिकायत का जवाब दिया है।
अलआलम के अनुसार ख़लीफ़ा अज़्ज़ोहरानी ने अंतर संसदीय संघ में इस देश के पूर्व सांसद ओसामा महना की शिकायत के जवाब में, उनकी बहरैन की संसद की सदस्यता ख़त्म करने की कार्यवाही के औचित्व में दावा किया कि ओसामा महना ने बहरैन की संसद को तलवारबाज़ी का अखाड़ा बना दिया था। अज़्ज़ोहरानी ने अपने ख़त में महना के बहरैन की संसद के परिसर में इस्राईल के झंडे को जलाने के क़दम की ओर इशारा करते हुए दावा किया कि उन्होंने इस क़दम सांसदों की जान को ख़तरे में डाल दिया था। उन्होंने बल दिया कि महना ने बहरैन की संसद में 3 साल के कार्यकाल के दौरान बहरैनी जनता के नैतिक मूल्यों और संसदीय संहिता से हटकर अजीब क़दम उठाया है।
बहरैन के संसद सभापति ने इसी प्रकार इस ख़त में दावा किया कि बहरैनी जनता के पीड़ित होने और इस देश में नागरिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित महना की सभी बातें झूठी हैं और बहरैन में कोई मुश्किल नहीं है।बहरैनी संसद ने एक अभूतपूर्व क़दम उठाते हुए 20 मई 2014 को ओसामा महना की सदस्यता रद्द कर दी।अंतर संसदीय संघ के महासचिव ने जुलाई में कहा था कि यह संघ महना के मामले की समीक्षा करना चाहता है। इस संघ ने इससे पहले आले ख़लीफ़ा शासन द्वारा बहरैनी संसद के दो पूर्व सांसदों मतर मतर और जवाद फ़ीरोज़ की गिरफ़्तारी और उनकी नागरिकता के रद्द किए जाने पर आपत्ति जतायी थी।ओसामा महना द्वारा अतिग्रहणकारी इस्राइली शासन के झंडे को जलाने की कार्यवाही के बाद कुछ सांसदों ने उनके ख़िलाफ़ कार्यवाही की मांग की थी।ओसामा महना ने कुछ सांसदों की ओर से शिकायत पर आश्चर्य जताते हुए बल दिया कि उनके ख़िलाफ़ शिकायत ऐसी स्थिति में की गयी जब फ़िलिस्तीनियों को उनकी भूमि पर ज़िन्दा जलाया गया। उन्होंने कहा कि क्या ज़ायोनी शासन के झंडे को जलाना बहरैन के क़ानून से विरोधाभास रखता है?!!ओसामा महना ने कहा कि ऐसी स्थिति में जब फ़िलिस्तीनी जनता बमों और विस्फोटक पदार्थों से ज़िन्दा जलायी जा रही है, शिकायत करने वाले बहरैनी जनता के प्रतिनिधि ज़ायोनी शासन का झंडा जलाने का विरोध कर रहे हैं!!उन्होंने कहा कि ये प्रतिनिधि अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन के झंडे को जलाने से नाराज़ हैं जबकि बहरैनी जनता, अरब और सारे मुसलमानों को 1969 में ज़ायोनियों द्वारा मस्जिदुल अक़्सा को लगायी गयी आग की घटना याद है।