3 नवंबर 2014 - 19:52
इमाम हुसैन अ. के रौज़े का अतीत।

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के की क़ब्र की सबसे पहली निशानी एक बेर का पेड़ा था और आज क़ब्र पर शानदार रौज़ा बना है। ऐसा रौज़ा कि दुनिया में सबसे ज़्यादा लोग जिन जगहों पर इकट्ठा होते हैं उसमें से एक यह रौज़ा भी है। इस रौज़े पर कई बार दुश्मनों ने हमला किया किन्तु आज यह रौज़ा कर्बला के मरुस्थल में एक नगीने की भांति चमक रहा है। इस रौज़े की इमारत भी ईरानी कलाकारों के कलात्मक कौशल का जीता जागता सुबूत है।

अबनाः हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के की क़ब्र की सबसे पहली निशानी एक बेर का पेड़ा था और आज क़ब्र पर शानदार रौज़ा बना है। ऐसा रौज़ा कि दुनिया में सबसे ज़्यादा लोग जिन जगहों पर इकट्ठा होते हैं उसमें से एक यह रौज़ा भी है। इस रौज़े पर कई बार दुश्मनों ने हमला किया किन्तु आज यह रौज़ा कर्बला के मरुस्थल में एक नगीने की भांति चमक रहा है। इस रौज़े की इमारत भी ईरानी कलाकारों के कलात्मक कौशल का जीता जागता सुबूत है।
इस्ना की रिपोर्ट के अनुसार कर्बला की महात्रासदी के कुछ दिनों के बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम जिस जगह पर शहीद हुए थे, बनी असद के क़बीले के लोगों ने दफ़्न किया। उसी समय बनी असद क़बीले के लोगों ने निशानी के तौर पर क़ब्र के पास बेर का एक पेड़ लगाया ताकि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र का पता चल सके।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र पर रौज़े के लिए बनने वाली सबसे पहली इमारत के बारे में मतभेद हैं। कुछ लोगों का मानना है कि कर्बला के अमर शहीदों के शवों को दफ़्न करने वाले बनी असद क़बीले ने ही इमाम हुसैन की क़ब्र पर पहला रौज़ा बनाया। कुछ दूसरे इतिहासकारों का कहना है कि मुख़्तार सक़फ़ी ने इमाम हुसैन के लिए पहला रौज़ा बनावाया।

कोई भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की निशानी को न मिटा सका

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र पर रौज़े के रूप में बनी पहली इमारत के समय से अब तक विभिन्न कालों में रौज़े की इमारत पर दुश्मनों ने हमला किया। अब्बासी शासक हारून रशीद के आदेश पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम
की क़ब्र की पहली निशानी बेर के पेड़ को काट दिया गया। अब्बासी शासक मामून के सत्ता पर पहुंचने के बाद और शीयों को अपेक्षाकृत थोड़ी आज़ादी मिलने से रौज़े की नई इमारत बनी जिसे अब्बासी शासक मुतवक्किल ने गिराने, ज़मीन पर हल चलाकर वहां पर खेती करने का आदेश दिया। मुतवक्किल के बेटे मुनतसिर के शासन काल में फिर से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का रौज़ा बना।
इस समय कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र पर जो रौज़ा बना है उसे आले बुवैह शासन श्रंख्ला के दौरान बनाया गया। उस समय अज़दुद दौला दैलमी के आदेश पर 367 हिजरी क़मरी में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े का निर्माण शुरु हुआ जो 4 साल बाद पूरा हुआ। हालांकि उस समय से अब तक इमाम हुसैन के रौज़े के भीतरी और बाहरी रूप में बहुत सी तब्दीली हुयी और अनेक बार रौज़े का निर्माण व मरम्मत की गयी है। एक बार आग लगने से रौज़े की इमारत को भारी नुक़सान पहुंचा किन्तु रौज़े की मुख्य इमारत का आधार वहीं माना जाता है जो दैलमी के काल में बना था।
जलायरयान शासन श्रंख्ला के संस्थापक सुल्तान उवैस भी उन लोगों में हैं जिन्होंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े के निर्माण व मरम्मत में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। इसी प्रकार उनके दो बेटे सुल्तान हुसैन और सुल्तान अहमद ने भी रौज़े के पुनर्निर्माण में योगदान दिया।

इमाम हुसैन के रौज़े के पुनर्निर्माण में ईरानियों का योगदान

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े की सजावट में सफ़वी राजाओं ने बढ़ चढ़ कर योगदान दिया। नादिर शाह भी उन शासकों में है जिन्होंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े का पुनर्निर्माण कराया और सजाया। उसके बाद क़ाजारी शासक आगे आए। आग़ा मोहम्मद ख़ान ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े के पुनर्निर्माण और उस पर सोने की पॉलिश करने का आदेश दिया। फ़त्ह अली शाह ने भी वह्हाबियों के हमलों से रौज़े के तबाह हुए भाग का पुनर्निर्माण कराया। नासेरुद्दीन शाह के काल में रौज़े के गुंबद पर फिर से सोने की पॉलिश करायी गयी।
विभिन्न कालों में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े के लिए ज़रीह बनाने वाले कलाकार ईरानी थे। इस रौज़े के लिए ताज़ा ज़रीह भी ईरान में बनायी गयी। नई ज़रीह दिखने में पुरानी ज़रीह की तरह है मगर यह थोड़ी ऊंची है। इसे बनाने में 118 किलोग्राम सोना-चांदी और सागवन की लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है। इस ज़रीह का क्षेत्रफल लगभग 34 वर्गमीटर है और उसमें 20 खिड़किया हैं। इसके इलावा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े पर आइनाकारी का काम भी ईरानी कालाकारों ने अंजाम दिया है।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े के प्रांगण में प्रवेश के लिए दस द्वार हैं जिनके नाम इस प्रकार हैः अलक़िबला, अर्रहमा, ज़ैनबिया, रअसुल हुसैन, अस्सुलतानिया, अस्सिदरा, अलइस्लाम, अलकरामह, अश्शोहदा और क़ाज़ेयिल हाजात। रौज़े के दोनों ओर दो ऊंची मीनारे हैं।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े की ज़रीह की एक अनोखी विशेषता इसका शष्टकोणीय रूप है। इसका एक कारण इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पैरों की तरफ़ उनके बेटे हज़रत अली अकबर की क़ब्र है इसलिए यह ज़रीह शष्टकोणीय बनी है।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े के निर्माण में ईरानी कलाकारों की रूचि

शहीद रजाई विश्वविद्यालय में आर्किटेक्ट संकाय के सदस्य हमीद रज़ा अज़मती ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े के निर्माण के बारे में समाचार एजेंसी इस्ना को बताया, “इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े की निर्माण कला के बारे में जो बात पूरे विश्वास से कही जा सकती है वह यह कि इसका निर्माण ईरानी वास्तुकला पर आधारित है।” उन्होंने कहा, “ सफ़वी शासन काल भी उन कालों में हैं जिसके दौरान हमारे देश में वास्तुकला के क्षेत्र में अच्छा विकास हुआ और वास्तुकला के क्षेत्र में अधिक विकसित प्रौद्योगिकी प्रयोग हुयी। महत्वपूर्ण सरकारी, धार्मिक एवं शैक्षणिक इमारतों में इसे देखा जा सकता है। इस प्रौद्योगिकी का प्रभाव पड़ोस के देशों की वास्तुकला में देखा जा सकता है। पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के देशों विशेष तौर पर इराक़ में कुछ इमामों के रौज़े, सफ़वी काल में ईरानी वास्तुकला पर आधारित हैं।” अज़मती ने कहा, “ आज जब एक ईरानी इराक़ में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े सहित अन्य पवित्र रौज़ों में जाता है तो उसे अजनबियत का एहसास नहीं होता क्योंकि ये इमारतें ईरान में पवित्र रौज़ों की इमारतों से बहुत मिलती जुलती हैं। ईरानी वास्तुकला का देश के बाहर इस प्रकार की इमारतों के निर्माण में प्रभाव रहा है। ईरानी कलाकार अन्य देशों में एक दक्ष कलाकार के रूप में जाते थे और उन्होंने इन देशों की वास्तुकला के उत्कृष्ठ नमूनों में सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया है कि इसकी एक स्पष्ट मिसाल आगरा का ताज महल है।”
अज़मती ने कहा, “ शीया इमामों से ईरानियों को श्रद्धा की झलक इमामों के रौज़ों की इमारतों के निर्माण व सजावट में दिखाई देती है।”