कर्बला, अत्याचार, अन्याय, झूठ और यज़ीदियत के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत थी। इमाम हुसैन अ.ह ने यज़ीद से साफ़ साफ़ कह दिया था कि मुझ जैसा तुझ जैसे की बैअत नहीं कर सकता, यानी जब भी यज़ीदियत सिर उठाएगी तो हुसैनियत उसके मुक़ाबले में डट जाएगी, जब भी यज़ीदियत इस्लाम को चुनौती देगी तो हुसैनियत इस्लाम को सरबुलंद रखेगी और यज़ीदियत को नाबूद करेगी,यही वजह है कि आशूरा के बाद विभिन्न बेरहम शासकों के खिलाफ कई आंदोलन किये गए और कुछ सफल भी हुए, लेकिन बाक़ी वही रहे, जिनका आधार इस्लाम, कर्बला और हुसैनियत था।मोहर्रम का महीना इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन की याद दिलाता है। कर्बला के मैदान में हुसैनी आंदोलन हमेशा के लिए अमर हो गया। हो सकता है कि आपके मन में यह सवाल उठे कि पैग़म्बरे इस्लाम की वफ़ात के पचास साल बाद की कम अवधि में इस्लामी समाज कहां पहुंच गया कि करबला की घटना घटी और पैग़म्बरे इस्लाम के नाती इमाम हुसैन को शहीद कर दिया गया। इमाम हुसैन के मदीने से मक्के और मक्के से करबला की ओर पलायन और यात्रा के दौरान इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के भाषणों पर अगर ध्यान दिया जाए तो हमारे बहुत से सवालों के जवाब मिल जाएंगे।इमाम हुसैन (अ) ने मदीने से मक्के और मक्के से करबला की यात्रा 160 दिनों में तय की। इमाम हुसैन (अ) ने यज़ीद की बैअत का इन्कार करते हुए 28 रजब को अपने नाना के मदीने को छोड़ दिया और मक्के की ओर रवाना हो गये और तीन शाबान को उन्होंने मक्के की ज़मीन पर क़दम रखा। पवित्र शहर मक्के में इमाम हुसैन (अ) शाबान, रमज़ान, शव्वाल, ज़ीक़ाद और आठ ज़िल्हिज्जा तक रहे और जब उन्हें पता चला कि हाजियों के वेश में हत्यारे काबे के तवाफ़ के दौरान उनको क़त्ल कर देना चाहते हैं तो उन्होंने इतिहास के सबसे महान आंदोलन का आधार रखने के लिए वहां से करबला की ओर कूच किया।पैग़म्बरे इस्लाम के बाद घटने वाली घटनाएं इस वास्तविकता की पुष्ट करती हैं कि समाज के कुछ धड़ों ने जेहालत के ज़माने की परंपराओं और आस्थाओं को दोबारा ज़िंदा करने की कोशिश की और कुछ लोग अपनी ढुलमुल ईमान के कारण ख़ामोश रहे और हुकूमत तक अपनी पहुंच बनाने का रास्ता तय्यार करते रहे। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपने अमर संदेश और अपने महान व अध्यात्मिक व्यक्तित्व से उस समय के समाज में भारी तब्दीली ईजाद की लेकिन उनके बाद लोगों ने उनके अहलेबैत से मुंह फेर लिया और दीन में नई - 2 बातें दाखिल करने की कोशिश करने लगे। यह मामला मुआविया और उसके भ्रष्ट बेटा यज़ीद की हुकूमत के ज़माने में अपने चरम पर पहुंच गये थे।इन हालात में इमाम हुसैन जैसी हस्ती खामोश नहीं रह सकती थी और इन ख़तरनाक व भ्रष्ट विचारधाराओं की मूकदर्शक नहीं रह सकती थी। मदीने से मक्के और मक्के से करबला तथा करबला में शहादत से पहले उन्होंने जितने पत्र लिखे, भाषण दिए और बयान दिए वह उस समय के इस्लामी समाज की विपदा को बयान करने वाले और उनकी क्रांति के लक्ष्य को बयान करने वाले थे।22 रजब सन साठ हिजरी क़मरी में मुआविया के मरने के बाद उसका भ्रष्ट बेटे यज़ीद शासक बना और गद्दी संभालते ही उसने तुरंत विभिन्न स्थानों पर अपने गर्वनरों को पत्र लिखकर मुआविया के मरने और अपने शासक बनने की सूचना दी। उसने पत्र में उन्हें अपने पदों पर बने रहने और लोगों से दोबारा बैअत का वचन लेने का आदेश दिया। उसने इसी प्रकार मदीने के गवर्नर वलीद को भी ख़त लिखा और उसने इस ख़त के साथ एक छोटा सा दूसरा ख़त भी भेजा जिसमें उन तीन मशहूर हस्तियों से बैअत लेने पर बल दिया गया था जो मुआविया के ज़माने में यज़ीद की बैअत पर तैयार नहीं थे। पत्र में आया था कि किसी भी प्रकार हुसैन इब्ने अली, अब्दुल्लाह बिन उमर और अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर से बैअत लो और उन्हें किसी भी तरह की छूट व अवसर न दो।वलीद को जैसे ही यह पत्र मिला उसने मुआविया के ज़माने के गवर्नर मरवान बिन हकम को बुलाया और इस ख़त के बारे में सलाह करने लगा। उसने सुझाव दिया कि इन तीनों लोगों को मुआविया की मौत की सूचना फैलने से पहले जितनी जल्दी हो सके दरबार में बुलाओ और यहीं इन लोगों से बैअत ले लो। वलीद ने उसी समय अपने एक कारिंदे को इमाम हुसैन के पास दरबार में आने की दावत लेकर भेजा। इमाम हुसैन वलीद के पास पहुंचे और जब उसने यज़ीद की बैअत का प्रस्ताव पेश किया तो इमाम हुसैन ने कहा कि मुझ जैसा यज़ीद जैसे की बैअत नहीं कर सकता। हम पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. के अहलेबैत हैं, हम पवित्रता के प्रतीक हैं, हम इलाही संदेश के स्रोत हैं, हमारा परिवार फ़रिश्तों के आने जाने और इलाही संदेश उतरने का स्थान है लेकिन यज़ीद जो मुझसे बैअत की आशा रखता है, शराबी है और निर्दोष लोगों का हत्यारा। वह ऐसा इंसान है जिसने इलाही आदेशों का उपहास किया और खुलकर सबके सामने हराम काम करता है और शराब पीता है। मुझ जैसा शरीफ़ यज़ीद जैसे शराबी की बैअत नहीं कर सकता। इस संबंध में हमें यह देखना होगा कि इस्लामी समाज पर हुकूमत के योग्य कौन है और लोगों की हिदायत व मार्गदर्शन और उनपर हुकूमत करने का किसे अधिकार है।इस प्रकार इमाम हुसैन (अ) ने अपने इस बयान से यह स्पष्ट कर दिया कि वह मुआविया के बेटे यज़ीद के बारे में क्या दृष्टिकोण रखते हैं और उसकी सरकार को ग़ैर क़ानूनी समझते हैं। इमाम हुसैन ने अपने परिवार की विशेषताओं व गुणों को जो इस्लामी समाज के मार्गदर्शन के योग्य है, बयान करने के बाद यज़ीद की धज्जियां उड़ा दीं और यह साबित कर दिया कि वह इस्लामी नेता बनने के योग्य नहीं है। इमाम हुसैन (अ) ताक़त के उस भ्रम को तोड़ना चाहते थे जो अयोग्य होते हुए मुसलमानों पर हुकूमत करना चाहती थी और भ्रष्टता फैलाकर इस्लामी समाज को गुमराह करना चाहती थी। इमाम हुसैन यह बात भलिभांति जानते थे कि यज़ीद चाहता था कि इस्लामी हुकूमत की आड़ में इस्लाम व क़ुरआन से संघर्ष में अबू सुफ़ियान के परिवार के लक्ष्य को अमली बनाए।अलबत्ता उस ज़माने में इमाम हुसैन के इस फ़ैसले पर प्रतिष्ठित लोगों की भी प्रतिक्रिया सामने आयी। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बेटे मुहम्मद हनफ़िया उन लोगों में से एक थे जो इमाम हुसैन के फ़ैसले से चिंतित और घबराए हुए थे । मशहूर इतिहासकार तबरी और अन्य इतिहासकारों के हवाले से आया है कि मुहम्मद हनफ़िया ने जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का यह फ़ैसला सुना तो वह आपकी सेवा में हाज़िर हुए और इस तरह कहा कि भाई, आप लोगों में सबसे लोकप्रिय और सम्मानीय हैं, मैं जिस चीज़ में भलाई समझता हूं, मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं आपको बताऊं। मैं समझता हूं कि आपके लिए जहां तक संभव हो किसी एक शहर में न रहें और ख़ुद को अपने बच्चों को यज़ीद की पहुंच से बहुत दूर रखें और यहां से बहुत दूर चले जाएं और लोगों की ओर अपने प्रतिनिधि भेंजे और लोगों का समर्थन हासिल करें और अगर उन्होंने आपकी बैअत की तो अल्लाह का आभार व्यक्त करें और अगर दूसरों की बैअत कर लें तब भी आपको कोई नुक़सान नहीं पहुंचेगा। हज़रत इमाम हुसैन ने अपने भाई मुहम्मद हनफ़िया के जवाब में कहा कि भाई तुम यज़ीद की बैअत से बचने के लिए एक शहर से दूसरे शहर जाने का सुझाव दे रहे हो तो यह जान लो कि अगर इस विस्तृत संसार में मेरे लिए कोई शरण न हो तब भी मैं यज़ीद की बैअत नहीं करूंगा। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने बारम्बार रोकने पर कहा कि मेरे भाई, अल्लाह आपको इनाम दे कि आपने भलाई करने की ज़िम्मेदारी निभाई लेकिन मैं अपनी ज़िम्मेदारियों से भलिभांति अवगत हूं, मैंने मक्का जाने का फ़ैसला कर लिया है। मैने, मेरे बेटों, और मेरे भाईयों और भतीजों व भांजों तथा मेरे कुछ अनुयाइयों ने मेरे साथ जाने का फ़ैसला किया है क्योंकि हमारी मक़सद समान हैं और हमारे लक्ष्य एक हैं लेकि
12 नवंबर 2013 - 20:30
समाचार कोड: 480886
कर्बला, अत्याचार, अन्याय, झूठ और यज़ीदियत के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत थी। इमाम हुसैन अ.ह ने यज़ीद से साफ़ साफ़ कह दिया था कि मुझ जैसा तुझ जैसे की बैअत नहीं कर सकता, यानी जब भी यज़ीदियत सिर उठाएगी तो हुसैनियत उसके मुक़ाबले में डट जाएगी, जब भी यज़ीदियत इस्लाम को चुनौती देगी तो हुसैनियत इस्लाम को सरबुलंद रखेगी और यज़ीदियत को नाबूद करेगी,