दुनिया भर के मुसलमान इस बात पर सहमत हैं कि कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महा बलिदान ने इस्लाम को मिटने से बचा लिया। हालांकि, कुछ मुसलमान इस्लाम की इस व्याख्या से असहमत हैं और कहते हैं की इस्लाम में कल्मे यानि "ला इलाहा इल्लल्लाह" और "मुहम्मदुर रसूलुल्लाह" के सिवा कुछ नहीं है।इस्लाम के मुख्य स्तम्भ (तौहीद, अद्ल, नुबूव्वत और क़यामत) में तो सभी विश्वास रखते हैं लेकिन यह गुट पैगम्बर इस्लाम (स.अ) द्वारा बताये, सिखाये और दिखाए हुए “इमामत” को न तो पहचानता ही है और न ही इसको कलमा का एक ज़रूरी हिस्सा मानता है!मुसलमानों के केवल एक समुदाय ने इमामत को पहचाना और यह विश्वास रखते हैं कि हर इमाम अल्लाह का प्रतिनीधि और उसी द्वारा नियुक्त होते हैं। यह अल्लाह के इल्म में था कि कुछ मुसलमान हज़रत अली (अस) को "अमीरुल मोमेनीन" के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे! इसलिए अल्लाह ने इन लोगों का परीक्षण करने के लिए और लोगों को अली (अ.स) की विलायत के क़बूल करने या न करने के हिसाब से इनाम या सज़ा देने का फैसला किया था। अल्लाह ने उनकी हठधर्मी के फल स्वरूप हज़रत मुहम्मद द्वारा यह ऐलान कर दिया कि हज़रत अली (अ.स) के बिना कोई भी काम या इबादत क़बूल नहीं की जाएगी और न ही अल्लाह उनके दीन को को स्वीकार करेगा! इसी कारण हजरत मुहम्मद (स अ व ), उनकी बेटी हज़रत फातिमा ज़हरा (स:अ) ने सारी ज़िंदगी अल्लाह के इस फैसले को बचाने में निछावर कर दी और इन्ही कारणों से उन्हें शहीद भी कर दिया गया।जब इमाम हुसैन (अ.स) कूफ़े के रेग़िस्तान से कर्बला की तरफ जा रहे थे तो किसी ने उनसे उनकी यात्रा का उद्देश्य पूछा तो इमाम (अ.स) ने कहा: मै कर्बला, इस्लाम को पुनर्जीवित करने के लिए जा रहा हूँ और मै उन हत्यारों को उजागर करने जा रहा हूँ जिन्होंने मेरे नाना मुहम्मद मुस्तफा (स.अ) मेरी माँ फ़ातिमा ज़हरा (स.अ), मेरे भाई हजरत हसन (अ.स) को क़त्ल किया है और इस्लाम को नीस्तो नाबूद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इमाम हुसैन अ.ह ने अपने नाना के दीन को बचाने के लिए अपने और अपने परिवार की क़ुर्बानी दी और इस्लाम को क़यामत तक के लिये ज़िंदा कर दिया।
5 नवंबर 2013 - 20:30
समाचार कोड: 478934
दुनिया भर के मुसलमान इस बात पर सहमत हैं कि कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महा बलिदान ने इस्लाम को मिटने से बचा लिया। हालांकि, कुछ मुसलमान इस्लाम की इस व्याख्या से असहमत हैं और कहते हैं की इस्लाम में कल्मे यानि "ला इलाहा इल्लल्लाह" और "मुहम्मदुर रसूलुल्लाह" के सिवा कुछ नहीं है।