5 नवंबर 2013 - 20:30
कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का बलिदान। (2)

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम बिन अली बिन अबी तालिब, अली अ० के दूसरे बेटे और पैग़म्बर मुहम्मद के नाती थे! आपकी माँ का नाम फ़ातिमा जाहरा था । आप अपने माँ बाप की दूसरी सन्तान थे। आप शियों के तीसरे इमाम हैं!

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम बिन अली बिन अबी तालिब, अली अ० के दूसरे बेटे और पैग़म्बर मुहम्मद के नाती थे! आपकी माँ का नाम फ़ातिमा जाहरा था । आप अपने माँ बाप की दूसरी सन्तान थे। आप शियों के तीसरे इमाम हैं!आपका जन्म 3 शाबान, सन 4 हिजरी, 8 जनवरी 626 ईस्वी को मदीने में हुआ था और आपकी शहादत 10 मुहर्रम 61 हिजरी (करबला, इराक) 10 अक्टूबर 680 ई. में हुई!आप के जन्म के बाद हज़रत पैगम्बर(स.) ने आपका नाम हुसैन रखा, आपके पहले "हुसैन" किसी का भी नाम नहीं था। आपके जन्म के बाद हजरत जिबरईल (अ.स) ने अल्लाह के हुक्म से हज़रत पैगम्बर (स) को यह ख़बर दी कि आप पर एक महान मुसीबत पड़ेगी, जिसे सुन कर हजरत पैगम्बर (स) रोने लगे थे और कहा था अल्लाह हुसैन को शहीद करने वाले पर लानत करे।आपकी मुख्य उपाधियाँ निम्नलिखित हैं : मिस्बाहुल हुदा, सैय्यदुश शोहदा, अबू अबदिल्लाह, सफ़ीनतुन नजात।इतिहासकार मसूदी ने उल्लेख किया है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम छः साल की आयु तक हज़रत पैगम्बर (स.) के साथ रहे। तथा इस समय सीमा में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को सदाचार सिखाने, अपना इल्म सिखाने तथा खाना खिलाने की ज़िम्मेदारी ख़ुद पैगम्बर(स.) के ऊपर थी। पैगम्बर (स.) इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बहुत ज़्यादा मुहब्बत करते थे। वह उनका छोटा सा दुखः भी सहन नहीं कर पाते थे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से मुहब्बत के सम्बन्ध में पैगम्बर (स.) की इस मशहूर हदीस का शिया व सुन्नी दोनो गुटों के उल्मा ने उल्लेख किया है। कि पैगम्बर (स.) ने कहा कि हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से हूँ। अल्लाह तू उससे मुहब्बत कर जो हुसैन से मुहब्बत करे।हज़रत पैगम्बर(स.) के स्वर्गवास के बाद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम तीस (30) साल तक अपने बाप हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम के साथ रहे। और सम्स्त घटनाओं व विपत्तियों में अपने बाप का हर तरह से सहयोग करते रहे।हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद दस साल तक अपने बड़े भाई इमाम हसन के साथ रहे। तथा सन् पचास (50) हिजरी में उनकी शहादत के पश्चात दस साल तक मुआविया की ग़लत बातों का विरोध करते रहे। जब सन् साठ (60) हिजरी में मुआविया का देहान्त हो गया और उसके बेटे यज़ीद ने गद्दी पर बैठने के बाद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बैअत करने के लिए कहा, तो आपने बैअत करने से मना कर दिया और इस्लाम की रक्षा के लिए वीरता पूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गये।हज़रत मुहम्मद (स.) साहब को अपने नातियों से बहुत प्यार था मुआविया ने अली अ० से खिलाफ़त के लिए लड़ाई लड़ी थी । अली के बाद उनके बड़े बेटे हसन को खलीफ़ा बनना था। मुआविया को यह बात पसन्द नहीं थी। वो हसन अ० से संघर्ष कर खिलाफ़त की गद्दी चाहता था। हसन अ० ने इस शर्त पर कि वो मुआविया की अधीनता स्वीकार नहीं करेंगे, मुआविया को खिलाफ़त दे दी। लेकिन इतने पर भी मुआविया प्रसन्न नहीं रहा और अंततः उसने हसन को ज़हर खिलवाकर मार डाला। मुआविया से हुई सुलह के मुताबिक, हसन के मरने बाद 10 साल तक उनके छोटे भाई हुसैन खलीफ़ा बनेंगे पर मुआविया को ये भी पसन्द नहीं आया । उसने हुसैन अ. को खिलाफ़त देने से मना कर दिया। इस दस साल की अवधि के आखिरी 6 महीने से पहले मुआविया की मौत हो गई। शर्त के मुताबिक मुआविया की कोई संतान खिलाफ़त की हकदार नहीं होगी, फ़िर भी उसका बेटा याज़िद खलीफ़ा बन गया और इस्लाम धर्म में अपने अनुसार बुराईयाँ जैसे शराबखोरी, अय्याशी, आदि लाना चाहता था, आप ने उसका विरोध किया, उस कुकर्मी शासन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए इमाम हुसैन (अस) को शहीद कर दिया गया, इसी कारण आपको इस्लाम में शहीद-ए-आज़म का दर्ज़ा हासिल है। आपकी शहादत के दिन को आशूरा कहते हैं और आपकी याद मनाने के लिए दुनिया भर के मुसलमान, मुहर्रम में अज़ादारी करते हैं।