5 नवंबर 2013 - 20:30
बहरैन में इमाम हुसैन अ. के अज़ादारों पर हमला।

रिपोर्ट के अनुसार अल-विफ़ाक़ इस्लामिक पार्टी बहरैन के अनुसार अज़ादारों नें पहली मोहर्रम के अवसर पर मनामा के दक्षिणी क्षेत्र मआमीर में अज़ादारी शुरू की थी कि आले ख़लीफ़ा के लोगों नें उन पर आँसू के गैस के गोलों से हमला कर दिया जिनमें कई बच्चे, महिलाएं और बूढ़े घायल हो गए।

रिपोर्ट के अनुसार अल-विफ़ाक़ इस्लामिक पार्टी बहरैन के अनुसार अज़ादारों नें पहली मोहर्रम के अवसर पर मनामा के दक्षिणी क्षेत्र मआमीर में अज़ादारी शुरू की थी कि आले ख़लीफ़ा के लोगों नें उन पर आँसू के गैस के गोलों से हमला कर दिया जिनमें कई बच्चे, महिलाएं और बूढ़े घायल हो गए।अल-विफ़ाक़ इस्लामिक पार्टी नें इस अत्याचारी क़दम की आलोचना करते हुए कहा कि इससे पता चलता है कि आले ख़लीफ़ा धार्मिक स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ है। अलविफ़ाक़ के अनुसार यह पहली बार नहीं है कि आले ख़लीफ़ा की सरकार अज़ादारों पर हमले कर रही है बल्कि पिछले साल भी इस तरह के अपराध बार बार देखने को मिले थे। इस सिलसिले में पाकिस्तानी नागरिक आंदोलन के उप प्रमुख आग़ा मुर्तज़ा पोया से जब यह जानने की कोशिश की गई कि कल रात मनामा में आले ख़लीफ़ा के अधिकारियों नें अज़ादारी पर हमला करके क्या मोहर्रम की पवित्रता को चोट नहीं पहुँचाई तो उन्होंने कहा कि वैसे तो बहरैन की जनता की आवाज़ का जवाब लाठी, गोली और हिंसा से दिया जा रहा है लेकिन असके बाद भी इनके इरादे और मांगों में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है और यह लगातार सरकार की अत्याचारी पॉलीसियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं।करबला की लडाईकरबला ईराक का एक प्रमुख शहर है । करबला, इराक की राजधानी बगदाद से 100 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में एक छोटा-सा कस्बा है! यह क्षेत्र सीरियाई मरुस्थल के कोने में स्थित है । करबला शिया स्मुदाय में मक्का के बाद दूसरी सबसे प्रमुख जगह है । कई मुसलमान अपने मक्का की यात्रा के बाद करबला भी जाते हैं । इस स्थान पर इमाम हुसैन का मक़बरा भी है जहाँ सुनहले रंग की गुम्बद बहुत आकर्षक है । इसे 1801 में कुछ अधर्मी लोगो ने नष्ट भी किया था पर फ़ारस (ईरान) के लोगों द्वारा यह फ़िर से बनाया गया ।   यहा पर इमाम हुसैन ने अपने नाना मुहम्मद स्० के सिधान्तो की रक्षा के लिए बहुत बड़ा बलिदान दिया था । इस स्थान पर आपको और आपके लगभग पूरे परिवार और अनुयायियों को यजिद नामक व्यक्ति के आदेश पर सन् 680 (हिजरी 58) में शहीद किया गया था जो उस समय शासन करता था और इस्लाम धर्म