8 अगस्त 2013 - 19:30
लखनऊ के दंगों में सुन्नी नहीं वहाबियों का हाथ।

पिछले दिनों लखनऊ में हुए सुन्नी शिया फ़सादों को शिया-सुन्नी फ़साद का नाम देना ग़लत है क्योंकि किसी भी फ़साद का सम्बंध अहलेसुन्नत वल जमात से नहीं होता बल्कि यह काम वहाबियों द्वारा किया जाता है।

अवधनामा समाचार पत्र की ख़बर के अनुसार पिछले दिनों लखनऊ में हुए सुन्नी शिया फ़सादों को शिया-सुन्नी फ़साद का नाम देना ग़लत है क्योंकि किसी भी फ़साद का सम्बंध अहलेसुन्नत वल जमात से नहीं होता बल्कि यह काम वहाबियों द्वारा किया जाता है।मौलाना ख़ालिद रशीद को चाहिये कि वह जुलूसों पर पाबंदी की मांग के स्थान पर धार्मिक संदेश देकर आपसी एकता की बात करते। उन्होंने ऐसा न कर के झगड़े की बात करने का अपना पुराना व्यवहार अपना रखा है। यह विचार, आज एक प्रेस कांफ़ेंस को सम्बोधित करते हुए आल इण्डिया मोहम्मदी मिशन के अध्यक्ष मौलाना सय्यद अशरफ़ कचौछवी नें व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि जो लोग अज़ादारी के जुलूस को बिदअत या शिर्क कहते हैं वह ख़ुद ही बिदत करते हैं। वह लोग जो जुलूसों को बंद करने की बात करते हैं वह इस्लाम को छोड़ कर वहाबियत को अपने कंधे पर लेकर चल रहे हैं। मौलाना अशरफ़ नें कहा कि सभी नगरवासियों को शांति और एकता का माहौल बनाए रखना चाहिये। मौलाना अशरफ़ कचौछवी नें अहले हदीस पर भी निशाना साधा और कहा कि उन्होंने अपने आपको लखनऊ में मज़बूत करने के लिये अपनी सरगरमियों को तेज़ करते हुए मस्जिदों पर भी क़ब्ज़ा कर लिया और यह वहीं से अपना काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मैंने सऊदी अरब में अपनी आँखों से वहाबियत को देखा है। मौलाना नें कहा कि मुसलमानों के आपसी मतभेदों से कुछ लोग राजनीतिक गठजोड़ पैदा कर के बीजेपी और कांग्रेस के साथ चले जाते हैं।