4 अगस्त 2013 - 19:30
क़यामत का दिन

आख़िर रोज़े में ऐसा क्या है कि उसे जहन्नुम की आग के लिये ढ़ाल कहा गया है। रोज़ा यानी ख़ुद को रोकना। रोज़ेदार इन्सान ख़ुद को उन चीज़ों से रोकता है जिनसे रुकने को कहा गया है

जहन्नुम की आग के लिये ढ़ालरसूलल्लाह स. की एक हदीस है।’’اَلصَّومُ جُنَّةُ مِّنَ النَّارِ‘‘रोज़ा जहन्नुम की आग से बचाने वाली ढ़ाल है। यह हदीस अहले सुन्नत की किताबों में भी इन शब्दों के साथ आई है।’’اَلصِّیَامُ جُنَّة العَبدِ المُؤمِنِ یَومَ القِیَامَةِ كَمَا یَقِى أَحَدَكُم سَلاَحُه فِى الدُّنیا ‘‘जिस तरह दुनिया में इन्सान हथियार के द्वारा अपना डिफ़ेन्स करता है, क़यामत में भी रोज़े के द्वारा जहन्नुम की आग से अपना डिफ़ेन्स और बचाव करता है।आख़िर रोज़े में ऐसा क्या है कि उसे जहन्नुम की आग के लिये ढ़ाल कहा गया है। रोज़ा यानी ख़ुद को रोकना। रोज़ेदार इन्सान ख़ुद को उन चीज़ों से रोकता है जिनसे रुकने को कहा गया है।’’وَ نَهىُ النَّفسِ عَنِ الهَوىٰ‘‘रोज़ा गुनाहों और ग़लत इच्छाओं में इन्सान को सब्र करना सिखाता है। हदीस में आया है कि आयत।’’وَ استَعِینُوا بِالصَّبرِ وَ الصَّلَاةِ ‘‘में सब्र का मतलब रोज़ा है। रोज़ा यानी अपनी इच्छाओं को छोड़कर ख़ुदा की आज्ञा के सामने सर झुकाना। रोज़े को इतना महत्व इसलिये दिया गया है क्योंकि यह इन्सान को उस चीज़ से रोकता है जो गुनाहों का कारण बनती है। रोज़ा उस चीज़ को कंट्रोल करता है जिसके कारण इन्सान ख़ुदा की आज्ञा का पालन करने से रुक जाता है। इन्सान का नफ़्स उस घोड़े की तरह जिसकी लगाम छोड़ दी गई हो, उसे रोकने के लिये लगाम पर कंट्रोल बहुत ज़रूरी है, नफ़्स की लगाम को कंट्रोल करने वाला रोज़ा है।गुनाह की असलियतगुनाह एक तरह से ख़ुदा का अज़ाब होता है यानी जो इन्सान गुनाह करता है उस पर ख़ुदा का अज़ाब है। यह ज़ाहिर में भी एक अज़ाब है और अपने असली रूप में भी एक अज़ाब है। क़ुरआने करीम फ़रमाता है।’’إِنَّ الَّذِينَ يَأْكُلُونَ أَمْوَالَ الْيَتَامَى ظُلْمًا إِنَّمَا يَأْكُلُونَ فِي بُطُونِهِمْ نَارًا‘‘जो लोग यतीमों का माल हड़पते हैं वह अपने पेट में अंगारे डालते हैं। क्या मतलब? क्या वह आग खाते हैं। ज़ाहिरी रूप यही है कि उन्होंने एक हराम चीज़ खाई है। एक यतीम का माल हड़प लिया है लेकिन इसका असली रूप यही है कि वह आग खा रहे हैं। जो लोग यहाँ गुनाह करते हैं और गुनाह का आनन्द लेते हैं यह उसका ज़ाहिरी रूप है उसका असली रूप क़यामत के दिन दिखाई देगा जब आँखों से सारे परदे हट जाएंगे।’’هُنَالِكَ تَبلُو كُلَّ نَفسٍ مَا أَسلَفَت‘‘उस दिन यही गुनाह का आन्नद जहन्नुम की आग में बदल जाएगा। उस दिन हर चीज़ की असलियत खुल कर सामने आ जाएगी और इन्सान के सारे आमाल अपने असली रूप में ज़ाहिर होंगे। मौलाना रोम कहते हैं।اى دریده پوستین یوسفان گرگبرخیزى از این خواب گرانवह ख़ूनी पंजे जो दुनिया में यूसुफ़ को चीर फाड़ते हैं और लोगों पर ज़ुल्म करते हैं, उनकी शक्ल इन्सानों जैसी है लेकिन असलियत में वह भेड़िये हैं इन्सान नहीं हैं। यह असलियत वहाँ सामने आएगी।‌क़यामत क्या है?हमें क़यामत को भूलना नहीं चाहिये, यह बहुत कठिन दिन होगा। हमें क़यामत को हमेशा याद रखना चाहिये और उस से डरना चाहिये। क़ुरआने करीम क़यामत के बारे में फ़रमाता है।’’يَسْتَعْجِلُ بِهَا الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِهَا وَالَّذِينَ آمَنُوا مُشْفِقُونَ مِنْهَا وَيَعْلَمُونَ أَنَّهَا الْحَقُّ‘‘क़ुरैश के मुशरिक रसूले ख़ुदा स. से कहते थे। यह क़यामत जिससे तुम हमें इतना डराते हो, कहाँ है? क़ुरआन फ़रमाता है।’’وَالَّذِينَ آمَنُوا مُشْفِقُونَ مِنْهَا ‘‘जो ईमान वाले हैं वह क़यामत से डरते हैं। सच में क़यामत ऐसी चीज़ है कि उससे डरना चाहिये, उसे हमेशा याद रखना चाहिये क्योंकि उसकी याद हमें बचाएगी। क़यामत ख़ुदा से सामना करने का दिन है।’’وَعُرِضُوا عَلَى رَبِّكَ صَفًّا‘‘इन्सान अपनी असलियत के साथ ख़ुदा के सामने जाएगा। ख़ुदा इस दुनिया में भी हमारी को जानता है और देखता है लेकिन वहाँ असलियत खुलकर सामने आ चुकी होगी, वहाँ हम भी अपनी असलियत देखेंगे और ख़ुद को कोसेंगे। क़यामत बदले का दिन है। हिसाब का दिन है और जवाब का दिन है। वहाँ सबको हिसाब देना होगा और ख़ुदा को जवाब देना होगा और कोई बहाना भी नहीं चलेगा। क़यामत ज़बान के बन्द हो जाने का दिन है। जिस तरह हम यहाँ ज़बान खोलते हैं और न जाने क्या क्या कहते हैं और बोलते हैं, वहाँ सबकी ज़बान बंद होगी।’’هَذَا يَوْمُ لَا يَنطِقُونَ۔وَلَا يُؤْذَنُ لَهُمْ فَيَعْتَذِرُونَ‘‘इन्सान का बदन और सारे हिस्से उसके विरुद्ध बोलेंगे। अगर हमारे दिल में कीना, हसद, बुरी सोच, दूसरों के लिये बुरी चाह, इस प्रकार की दूसरी बीमारियां, नेक लोगों के लिये दुश्मनी गुनाहों से मोहब्बत और इस तरह की चीज़ें छिपी होंगी तो वहाँ सब कुछ खुल कर सामने आ जाएगा। यह बड़ा अजीब दिन है।’’الْيَوْمَ نَخْتِمُ عَلَى أَفْوَاهِهِمْ وَتُكَلِّمُنَا أَيْدِيهِمْ وَتَشْهَدُ أَرْجُلُهُمْ بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ‘‘क़यामत के बारे में जो आयते क़ुरआने करीम में हैं वह हिला देने वाली हैं। हमें अकेले में उन आयतों को पढ़ना चाहिये, हमें उनकी ज़रूरत है। क़ुरआन में जहाँ क़यामत के बारे में ख़ुश करने वाली बातें और ख़बरें वहीं दिल दहला देने वाली बातें और ख़बरें भी हैं।’’يُبَصَّرُونَهُمْ يَوَدُّ الْمُجْرِمُ لَوْ يَفْتَدِي مِنْ عَذَابِ يَوْمِئِذٍ بِبَنِيهِ۔وَصَاحِبَتِهِ وَأَخِيهِ۔وَفَصِيلَتِهِ الَّتِي تُؤْويهِ۔وَمَن فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا ثُمَّ يُنجِيهِ‘‘इन्सान अज़ाब की सख़्ती देख कर यह इच्छा करेगा कि काश कि वह अपने अपने बेटे की बलि चढ़ा के बच सकता, काश कि अपने दोस्तों, रिश्तेदारों बल्कि ज़मीन पर बसने वाले सभी इंसानों की बलि चढ़ा कर बच सकता। यह कोई आसान चीज़ नहीं है।’’كَلَّا إِنَّهَا لَظَى۔نَزَّاعَةً لِّلشَّوَى۔تَدْعُو مَنْ أَدْبَرَ وَتَوَلَّ۔وَجَمَعَ فَأَوْعَى‘‘आग भड़क रही होगी। इन्सान के सर और बदन की खाल उधेड़ रही होगी..पुले सिरातइमाम सज्जाद अ. दुआए अबू हमज़ा सुमाली में क़यामत को याद करते हुए रोते हैं।’’أَبكِى لِخُرُوجِى عَن قَبرِى عُریَاناً ذَلیلاً حَامِلاً ثِقلِى عَلٰى ظَهرِى‘‘आज मैं उस दिन के डर से रो रहा हूँ कि उस हाल में क़ब्र से उठाया जाऊँ कि मेरे जिस्म पर कपड़ा न हो, ख़ुदा की नज़रों में ज़लील हो कर उठूँ और मेरी पीठ पर गुनाहों का बोझ हो।’’اَنظُرُ مَرّةً عَن یَمِینِى وَ اُخرىٰ عَن شُمَالِى إِذِ الخَلائِقُ فِى شَأنٍ غَیرَ شَأنِى لِكُلِّ امرَءٍ مِّنهُم یَومَئِذٍ شَأن یُغنِیهِ وُجُوهُ یَومَئِذٍ مُسفَرَة ضَاحِكَةُ مَستَبشِرَةُ‘‘कुछ लोग उस दिन ख़ुश होंगे, मुस्कुरा रहे होंगे, उनके मुखड़े खिले होंगे। यह कौन होंगे? यह वह लोग होंगे जो दुनिया में पुले सेरात से ग़ुज़र गए होंगे और उन्होंने उसे पार कर लिया होगा। यह पुले सेरात क्या है? यह अल्लाह की इबादत का पुल है। उसके आज्ञा पालन का पुल है। यह तक़वे का पुल है। यह गुनाहों से बचने का पुल है।’’وَأَنْ اعْبُدُونِي هَذَا صِرَاطٌ مُّسْتَقِيمٌ‘‘मेरी इबादत करो कि कि यही सीधा रास्ता है। पुले सेरात क़यामत के दिन नहीं इसी दुनिया में है। यही अल्लाह का रास्ता पुले सेरात है। जो दुनिया में इस सेरात से गुज़र जाएगा वह उस सेरात से भी गुज़र जाएगा जो क़यामत में है।’’إِنَّ الَّذِينَ سَبَقَتْ لَهُم مِّنَّا الْحُسْنَى أُوْلَئِكَ عَنْهَا مُبْعَدُونَ۔لَا يَسْمَعُونَ حَسِيسَهَا وَهُمْ فِي مَا اشْتَهَتْ أَنفُسُهُمْ خَالِدُونَ۔لَا يَحْزُنُهُمُ الْفَزَعُ الْأَكْبَرُ‘‘इन आयतों में दुनिया में सेरात को पार करने वालों की बात की गई है और कहा गया है कि वह लोग जिन्हें अच्छे कामों के कारण ख़ुदा की तरफ़ से वादा किया गया है उन्हें जहन्नुम की आग से दूर रखा जाएगा। बल्कि वह उनकी आवाज़ भी नहीं सुनेंगे। उनके लिये वह सब कुछ है जो उनका मन चाहेगा उन्हें किसी भी डर की वजह से घबराना नहीं पड़ेगा।भारी ज़िम्मेदारीइसलिये हमारी ज़िम्मेदारी बहुत ज़्यादा है। हमें बहुत संभल के चलना है। दुनिया ही में पुले सेरात को पार करना है वरना वहाँ मुश्किल में पड़ जाएंगे। न केवल ख़ुदा को बचाना और सँभालना है बल्कि अपनी फ़ैमिली का भी ध्यान रखना है कि कहीं वह इस रास्ते