2 अगस्त 2013 - 19:30
व्हाइट हाउस ने मुर्सी सरकार के खिलाफ़ सैन्य तख़्तापलट क्यों करवाया?

मिस्र में इन दिनों दो अलग अलग गुटों में संघर्ष, रक्तपात और मुठभेड़ जारी है, एक तरफ़ सेना और दूसरी तरफ मुर्सी के समर्थक। रजा समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार मिस्र के मौजूदा खराब हालात का कारण मोहम्मद मुर्सी के अपने शासनकाल के दौरान उठाए गए वह कदम हैं जिनके नतीजे में जनता में उनकी क्रांतिकारी पहचान जाती रही।

मिस्र में इन दिनों दो अलग अलग गुटों में संघर्ष, रक्तपात और मुठभेड़ जारी है, एक तरफ़ सेना और दूसरी तरफ मुर्सी के समर्थक।रजा समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार मिस्र के मौजूदा खराब हालात का कारण मोहम्मद मुर्सी के अपने शासनकाल के दौरान उठाए गए वह कदम हैं जिनके नतीजे में जनता में उनकी क्रांतिकारी पहचान जाती रही।चुनाव के बाद लोगों को हर पल इंतजार था कि उनका चयनित राष्ट्रपति उनकी मांगों पर अमल और इस्राईल के खिलाफ़ कोई कदम उठाएगा। हालांकि इस दौरान मुर्सी की गतिविधियां, क्रांतिकारी जनता के अमेरिका और इस्राईल विरोधी नारों से असंगत थीं। ज़ायोनी शासन के एकमात्र समर्थक और वकील अमेरिकी अधिकारियों के साथ उनका उठना बैठना बता रहा था कि वह क्रांतिकारी लक्ष्य और उद्देश्य के इच्छुक नहीं हैं। लेकिन वह कम से कम इतना तो कर ही सकते थे कि फ़िलिस्तीन की सीमाएं खोल दी जातीं और ग़ज़्जा के लोगों की कठिनाइयों को कम करने के लिए व्यापारिक संपर्क स्थापित किए जाते, लेकिन इतना भी न हुआ।इसी तरह दमिश्क में मिस्री दूतावास की छुट्टी और पश्चिम समर्थित आतंकवादियों के समर्थन के कारण भी मुर्सी के खिलाफ़ लोगों के आक्रोश में बढ़ोत्तरी हुई।दूसरी ओर उन्होंने सत्ता में आने के बाद ऐसे कदम उठाए जो किसी भी तरह एक लोकतांत्रिक और सार्वजनिक सरकार के लिये शोभा नहीं देते थे। दूसरे दलों के लिए रास्ते बंद कर सरकार में मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े लोगों को भर लिया गया और ऐसा तरीक़ा अपनाया गया जिससे लोगों को एहसास है कि उन पर फिर से डिक्टेटरशिप थोपी जा रही है।सारांश यह कि मुर्सी अपने विचारों के कारण मिस्र में एक तरह से मुबारक ही का कैरेक्टर निभा रहे थे, ऐसे में मिस्र में अमेरिका की देखरेख में एक संघीय सरकार काम कर रही थी।आखिरकार सार्वजनिक नाराजगी के बीच सेना ने (पश्चिम की ओर से) पहले से तय कार्यक्रम के तहत जनता के समर्थन के अंदाज़ अपना कर, खुद को मुर्सी के विरोधियों में शामिल कर लिया और फिर एक सफ़ल फौजी तख़्तापलट द्वारा मुर्सी सरकार का खात्मा कर दिया।इसलिये कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सेना ने जनता के समर्थन में मुर्सी का विरोध किया है, खासकर मुर्सी सरकार के रक्षा मंत्री अल-सीसी कि जाहिरी तौर पर विरोधी नहीं हैं।अब सवाल यह है कि अगर मुहम्मद मुर्सी अमेरिकी नीतियों के अनुसार ही चल रहे थे तो अमेरिका ने उन्हें बर्खास्त क्यों किया?इस सवाल का जवाब नीचे कुछ बातों में निहित हैं:1.    मिस्र का इंक़ेलाब, इस्लामी जागरूकता का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण इंक़ेलाब है जिसकी सफलता क्षेत्र में एक मिसाल बन सकती है. इस बात पर निश्चित रूप से इस्राइल सख्त परेशान है और वह क्रांति को नाकाम कर इस सिलसिले को बंद करना चाहता है।इसलिए मिस्र की क्रांति की नाकामी का मतलब अन्य देशों में इस्लामी जागरूकता को घुटने टेकने पर मजबूर करना है।2.    अस्थिरता और सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान इसराइल और अमेरिका को ना महसूस तरीके से देश में घुसपैठ का ज्यादा मौका मिल जाता है। इसलिए कि इस दौरान लोगों का ध्यान सड़कों पर हो रहे प्रदर्शनों की ओर होता है और पश्चिम को फ़ौज को निर्देश देने का बेहतर अवसर मिल जाता है ताकि अंततः एक पूरी तरह से पिट्ठू सरकार लाई जा सके।3.    अगर मुहम्मद मुर्सी अपनी जगह कायम रहते और हुकूमत धीरे धीरे अपना मूल रूप ले लेती और मिस्र एक स्थायी लोकतांत्रिक देश में बदलता तो मिस्र के साथ क्षेत्र में भी स्थिरता आती। उसके बाद जनता राजनीतिक तौर पर शांतिपूर्ण तरीके से मुर्सी को सत्ता से बेदखल कर सकती थी जिससे देश की प्रतिष्ठा पर भी कोई आंच न आती।4.    हालांकि मुर्सी का चयन क्षेत्र में इस्राईली नीतियों को कोई नुकसान नहीं पहुँच रहा था लेकिन क्रांति का नाम ही पश्चिमीयों के लिए असहनीय था।5.    मौजूदा अस्थिरता और उतार चढ़ाव, मिस्री जनता के खिलाफ़ इस्राइल का अपनी ताक़त का प्रदर्शन है। ज़ायोनी हुकूमत, लोगों को यह बता देना चाहती है कि क्रांति की ताक़त विरोधियों से कम है इसलिए उनकी हार निश्चित है। इसलिये कोई भी देश इस्राइल का मुकाबला करने और ज़ायोनी विरोधी सरकार बनाने में सक्षम नहीं है।6.    दूसरी ओर अमेरिका के लिए इख़वानियों पर वर्चस्व आसान नहीं है क्योंकि वह क्रांति के नतीजे में सामने आए और जनता समर्थित हैं। जनता का हाल यह है कि उन्हें क्रांति के लक्ष्य और उद्देश्य से किसी भी प्रकार इस्राइल के पक्ष में विचलन क़बूल नहीं है और ऐसी स्थिति में वह विरोध पर मजबूर होंगे। अगर इख़वान जनता को राजी करना चाहते हैं तो उन्हें उनकी मांगें मानना होंगी। दूसरी ओर अगर वह जनता को राजी रखते हैं तो अमेरिका और इस्राइल की नीतियों को अमली बनाने के लिए रास्ता तय्यार नहीं कर सकते कि वह संतुष्ट होकर अपना काम करते रहें। इसलिए (पश्चिमीयों के अनुसार) मिस्री जनता पर ऐसी सरकार थोपी जानी चाहिए जिसका पश्चिम से जुड़ा होना सभी पर रौशन हो।अब सेना ने जनता को निशाना बनाकर और विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ हिंसक गतिविधियाँ अंजाम देकर अपना असली चेहरा दिखा दिया है। दूसरी ओर इख़वानियों को पूरी तरह एहसास हो गया है कि उनके खिलाफ़ सशस्त्र कार्यवाहियां होंगी और उन्हें मारा जाएगा। इसलिए वह निश्चित रूप से हथियार उठाकर सेना के खिलाफ़ लड़ाई शुरू करेंगे। इस तरह यहां भी सीरिया ही की तरह गृहयुद्ध शुरू हो जाएगा। अंतर इतना होगा कि सीरिया में सरकार को जनता का समर्थन हासिल है और पश्चिम की ओर से विरोधियों का समर्थन किया जा रहा लेकिन मिस्र में सरकार को अमेरिका का समर्थन हासिल है और जनता निशाने पर है। ऐसे में मिस्र की स्थिति सीरिया से अधिक भयंकर होगी।