जब मैं इन चीज़ों के बारे में विचार करता हूँ जो अल्लाह तआला रमज़ानुल मुबारक में हम सब से चाहता है जैसे रोज़ा, क़ुरआने करीम की तिलावत, दुआएं, अल्लाह से प्रार्थना और इस तरह की दूसरी चीज़ें। मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि इनमें से ज़्यादा महत्वपूर्ण इस्तेग़फ़ार (ख़ुदा से गुनाहों की माफ़ी) है। यानी हमारी जेहालत, हमारी कोताही के कारण हम से जो ग़लतियाँ हुई हैं या हम नें जान कर के की हैं उनकी माफ़ी माँगना। मैं इस्तेग़फ़ार पर कोई लम्बी चौड़ी बात नहीं करना करना चाहता बल्कि शबे क़द्र के दिन हैं इस लिये केवल आपके ध्यान को उसकी तरफ़ मोड़ना चाहता हूँ।इस्तेग़फ़ार की ज़रूरतइस्तेग़फ़ार का सबसे पहला क़दम ख़ुदा की ओर लौटना है। तौबा यानी हम ख़ुदा की ओर लौट आएं। हम कितने ही बड़े क्यों हों, कितने पहुँचे हुए क्यों न हों, ख़ुदा से सबसे ज़्यादा क़रीब क्यों न हों फिर भी इस्तेग़फ़ार की ज़रूरत है। यहाँ तक कि अमीरुल मोमिनीन अ. भी इस्तेग़फ़ार करते है। ख़ुदा अपने नबी से फ़रमाता है- ’’وَ استَغفِر لِذَنبِكَ‘‘ ’’فَسَبِّح بِحَمدِ رَبِّكَ وَ اسَتغفِرهُ‘‘क़ुरआन में अल्लाह नें कई बार अपने नबी से कहा- इस्तेग़फ़ार कीजिए। हमें मालूम है कि नबी मासूम है, गुनाह नहीं करता, हमेशा ख़ुदा की आज्ञा का पालन करता है यहाँ तक कि भूलता भी नहीं है लेकिन फिर उनसे कहा जाता है कि इस्तेग़फ़ार कीजिए। अलबत्ता उनका इस्तेग़फ़ार क्या है। वह किस चीज़ के लिये इस्तेग़फ़ार करते हैं यह एक अलग विषय है। हम जिन चीज़ों के लिये इस्तेग़फ़ार करते हैं और क्यों इस्तेग़फ़ार करते हैं, वह उन चीज़ों के लिये नहीं करते क्योंकि उनके यहाँ वह चीज़ें हैं ही नहीं, यानी गुनाह नहीं करते हैं कि इस्तेग़फ़ार करें बल्कि वह उस मर्तबे पर हैं कि बहुत सी वह चीज़ें जो हमारे लिये जाएज़, मुबाह या मुस्तहेब होती हैं उनके लिये जाएज़ नहीं होती। वह अपने इस रुतबे के लेहाज़ से इस्तेग़फ़ार करते हैं। आप दुआए कुमैल को पढ़ें, किस तरह हज़रत अली अ. ख़ुदा से इस्तेग़फ़ार करते हैं। इसी तरह इमाम सज्जाद अ. की दुआए अबू हमज़ा सुमाली को भी देखें। या दूसरी बहुत सी दुआएं जो मासूम इमामों नें की हैं। किस तरह वह ख़ुदा के सामने माफ़ी मांगते हैं, इस्तेग़फ़ार करते हैं और ऐसा भी नहीं है कि यह केवल हमें बताने के लिये या हमें सिखाने के लिये इस्तेग़फ़ार करते थे बल्कि उनका इस्तेग़फ़ार सच्चा होता था। अगर वह लोग इस्तेग़फ़ार करते थे तो सोचें फिर हमें इस्तेग़फ़ार की कितनी ज़रूरत है?दोस्तों! ध्यान रखो, कहीं ऐसा न हो कि हम ग़ाफ़िल हो जाएं। हमारे अन्दर घमण्ड आ जाए और हम यह समझने लगें कि हमने कोई गुनाह किया ही नहीं है तो किस लिये इस्तेग़फ़ार करें। ऐसा नहीं है। हम गुनाहों में डूबे हुए हैं-’’وَ مَا قَدرُ أَعمَالِنَا فِى جَنبِ نِعَمِكَ ‘‘अल्लाह की नेमतों के सामने हमारे आमाल की कोई हैसियत नहीं है। हम जो अच्छे काम करते हैं उनमें कितना वज़्न है? ख़ुदा की दी हुई नेमतों के सामने उनकी क्या हैसियत है? क्या हम उसकी दी हुई नेमतों का शुक्रिया कर पाते हैं? क्या हमारे आमाल इस लाएक़ हैं कि हम उन पर इतरा सकें? हम कभी ख़ुदा का शुक्र नहीं कर सकते। क्यों नहीं कर सकते?’’لَاالَّذى أَحسَنَ استَغنىٰ عَن عَونِكَ‘‘हम एक मिनट के लिये भी ख़ुदा के करम, उसकी कृपा, उसके फ़ज़्ल के बिना नहीं रह सकते। हमें हमेशा उसकी ज़रूरत है-’’خَیرُكَ إِلَینَا نَازِل‘‘उसकी कृपा हर समय हम पर होती रहती है। हमारी एक एक साँस उसकी कृपा के कारण है, क्या हम उसके लिये शुक्र कर सकते हैं? कभी नहीं! इसी लिये हमें इस्तेग़फ़ार की ज़रूरत है।शबे क़द्र एक अच्छा अवसरशबे क़द्र इस्तेग़फ़ार के लिये एक अच्छा अवसर है। इस रात में हमें अपने गुनाहों की, अपनी कोताहियों की माफ़ी मांगनी चाहिये। उसनें हमें यह अवसर दिया है कि उसकी ओर लौटें। शायद इसके बाद हमें मौक़े न मिले। शायद वह दिन आ जाए जब ख़ुदा गुनहगारों से कहेगा- ’’لَایُؤذَنُ لَهُم فَیَعتَذِرُونَ‘‘अब उन्हें माफ़ी मांगने का समय नहीं दिया जाएगा। क़यामत में हमें माफ़ी मांगने का अवसर नहीं दिया जाएगा। इस दुनिया में आज्ञा दी गई है, टाइम दिया गया है, यहाँ माफ़ी मांगी जा सकती है, यहाँ गुनाहों को धोया जा सकता है, या दिल को पाक किया जा सकता है। यहाँ ख़ुदा की ओर लौटा जा सकता है। और जो ख़ुदा को याद करता है ख़ुदा भी उसे याद करता है। जब भी आपका दिल ख़ुदा की ओर मुतवज्जे हो, जब भी आपका ध्यान ख़ुदा की ओर जाए समझ लीजिए कि ख़ुदा नें आप पर ख़ास कृपा की है। ऐसे अवसर पर ख़ुदा को इस श्रेष्ठता की क़सम दीजिए, उससे बातें कीजिए, उससे माफ़ी मांगिये, ख़ुदा से उसकी मोहब्बत मांगिये, उसकी इताअत और आज्ञा पालन करने की तौफ़ीक़ मांगिये। अगर हमनें यह अवसर भी गँवा दिया तो फिर हाथ मलते रह जाएंगे और एक दिन आएगा जब ख़ुदा कहेगा-’’إِنَّا نَسَینَاُكم ‘‘हमनें तुम्हे भुला दिया।शबे क़द्र यही तीन रातें हैं। मोहद्दिस नें अपनी किताब में एक हदीस लिखी है जिसमें आया है कि इमाम से पूछा गया कि इन रातों में से कौन सी शबे क़द्र है? इमाम अ. नें जवाब दिया- इनमें से एक। क्या मतलब? इमाम नें साफ़ साफ़ क्यों नहीं बताया कि कौन सी रात है? इसलिये ताकि इन्सान इन रातों को महत्व दे। इसके बहाने इन रातों को जागे। और उन से फ़ायदा उठाए। तीन रातें होती ही कितनी हैं? बहुत से ओलमा और ख़ुदा वाले गुज़रे हैं जो पूरे रमज़ानुल मुबरक को शबे क़द्र समझ कर जागते थे और इस्तेग़फ़ार करते थे।इन दिनों की और इन रातों की क़द्र कीजिए। क़ुरआने करीम साफ़ कह रहा है-’’خَیرُ مِّن أَلفَ شَهرٍ ‘‘यह रात हज़ार महीनों से ज़्यादा महत्व रखती है। इसमें फ़रिश्ते उतरते हैं। इसमें रूह नाज़िल होती है। ख़ुदा नें इसको सलाम का नाम दिया है। इसमें ख़ुदा का सलाम आता है। इसमें क़ुरआन उतरा है। इतनी महान रातों को जो महत्व न दे उस पर अफ़सोस करना चाहिये। ख़ुदा हमें भी तौफ़ीक़ दे इन रातों में इबादत करने की, तौबा करने की, इस्तेग़फ़ार करने की उसकी ओर लौटने की, गुनाहों की माफ़ी मांगने की, ख़ुद को बनाने की, दिल को पाक करने की। इन रातों में दूसरों को भी याद रखें। अपने इमाम को न भूलें। मुसलमानों को न भूलें। उनकी समस्याओं के दूर होने की दुआ करें। इमाम के ज़ुहूर की दुआ करें। क्योंकि उनके ज़ुहूर ही में हम सब की भलाई है। उनके आने ही से सारी समस्याएं दूर होंगी।اَللّٰھُم عَجِّل فِی فَرَجِ مَولَانَا صَاحِبِ الزَّمَان
1 अगस्त 2013 - 19:30
समाचार कोड: 447596
जब मैं इन चीज़ों के बारे में विचार करता हूँ जो अल्लाह तआला रमज़ानुल मुबारक में हम सब से चाहता है जैसे रोज़ा, क़ुरआने करीम की तिलावत, दुआएं, अल्लाह से प्रार्थना और इस तरह की दूसरी चीज़ें