हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के पाक रौज़े पर विद्रोही आतंकी समूहों के हालिया हमले पर केवल ईरान और अन्य देशों के शियों का दिल नहीं दुखा है बल्कि विश्व मीडिया ने भी इस खबर पर विशेष ध्यान दिया है। एक पाकिस्तानी अखबार ने अलग कोण से इस मामले की समीक्षा की और इस पर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ में टिप्पणी की है।ताबनाक की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान के एक अंग्रेजी दैनिक पाकिस्तान टू डे ने सीरिया की राजधानी दमिश्क में स्थित हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के पाक रौज़े पर आतंकवादियों के हालिया हमले की सीरिया के इतिहास और संस्कृति के संदर्भ में समीक्षा की और इस सवाल का जवाब ढ़ूंढ़ने की कोशिश है कि क्या सीरिया की सांस्कृतिक पूंजी देश में जारी संघर्ष की भेंट चढ़ रही है?अखबार ने लिखा है:जब हलब के ऐतिहासिक बाजार में जिसका अधिकांश हिस्सा ग़ैर मज़हबी सांस्कृतिक पुरातत्व पर आधारित था, आग लगा दी गयी तो उसके बाद आम धारणा यह पायी जाने लगी कि अल-क़ायदा सीरिया विद्रोहियों की मदद से क्षेत्र के धार्मिक विरासत को भी निशाना बनाएगी। इसी सिलसिले में पहले पैगम्बर साहब के दो साथियों के मज़ार ध्वस्त किए गए और अब शुक्रवार को हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के रौज़े को निशाना बनाया गया है।हज़रत ज़ैनब के रौज़े पर हमेशा से खास कर इसी (80) और नब्बे (90) के दशक के बाद से शिया ज़ाएरीन की भीड़ रहती रही है और इसे विशेष महत्व दिया जाता रहा है। इसलिए कि यही वह हरम है जो सीरिया, ईरान और लेबनान के हिज़्बुल्ला के बीच एकता व गठबंधन का रहा है।हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के रौज़े की वर्तमान स्थिति दरअसल सीरिया की ओर से अपने अतीत को प्रतिबिंबित करने के प्रयासों का एक हिस्सा है. दूसरी ओर जब देश में सलीबी मकबरे और अन्य ऐतिहासिक इमारतें ध्वस्त की गईं तो सरकार ने राजधानी को इस तरह की गतिविधियों से सुरक्षित रखा। बहेरहाल असद सरकार का ऐतिहासिक स्थलों की ओर विशेष ध्यान ही अब विद्रोहियों को देश के पुरातत्व मिटा डालने पर उकसा रही है।हर हुकूमत अपना विशिष्ट इतिहास वुजूद में लाने की कोशिश करती है और पिछली सरकार की एतिहासिक निशानियों को मिटाने की कोशिश करती है। नतीजे में शुक्रवार को जब हज़रत ज़ैनब के पाक रौज़े पर मोर्टार हमला किया गया और रौज़े के ज़िम्मेदार मारे गए तो इस प्रक्रिया से विद्रोहियों की ओर से असद सरकार की वैधता को नुक़सान पहुंचाने की कोशिशें सामने आ गई।इसी के साथ यह कार्यवाही इस बात को भी दर्शाती है कि सीरिया में अट्ठाईस (28) महीने से जारी संघर्ष अब सांप्रदायिक रूप धारण कर चुका है। जब देश में हत्या व आतंकी गतिविधियां बढ़ी तो इराक और लेबनान से सैकड़ों की संख्या में लड़ाकू हरमे हज़रत ज़ैनब की सुरक्षा के लिए दमिश्क पहुंच गए। दूसरी ओर ऐसी खबरें भी प्राप्त हो रही हैं कि पाकिस्तान के तालिबान ने असद सरकार से मुक़ाबले के लिए अपने लड़ाकू सीरिया भेज दिए हैं और आशंका जताई जा रही है कि यह लड़ाई इराक और लेबनान तक फैल सकती है।बहेरहाल सीरिया में जारी लड़ाई इतिहास को मिटा डालने की सोची समझी कोशिश है। इससे पहले वहाबी चरमपंथी अपने अमेरिकी समर्थकों की मदद से इराक और अफ़ग़ानिस्तान के एतिहासिक पुरातत्व नष्ट कर चुके हैं।अब सवाल यह है कि अगर सीरिया पर वहाबियों का क़ब्ज़ा हो जाए तो क्या इस देश का को इतिहास रह जाएगा या यहाँ भी सऊदी अरब की तरह एक ऐसी सरकार वुजूद में आ जाएगी जो हर प्रकार के ऐतिहासिक अवशेष के विरोध को अपना कर्तव्य समझेगी?
26 जुलाई 2013 - 19:30
समाचार कोड: 445713
हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के पाक रौज़े पर विद्रोही आतंकी समूहों के हालिया हमले पर केवल ईरान और अन्य देशों के शियों का दिल नहीं दुखा है बल्कि विश्व मीडिया ने भी इस खबर पर विशेष ध्यान दिया है। एक पाकिस्तानी अखबार ने अलग कोण से इस मामले की समीक्षा की और इस पर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ में टिप्पणी की है।