रमज़ानुल मुबारक अपनी रहमतों, बरकतों और आध्यात्मिक ख़ुबसूरतियों के साथ एक बार फिर आया है। रमज़ान का मुबारक महीना शुरू होने से पहले रसूले अकरम स. लोगों को इस महीने के लिये तैयार करते थे। रसूलुल्लाह स. का एक ख़ुतबा है जिसे ख़ुतबए शाबानिया कहते हैं, इसमें इस तरह आया है-’’قَد أَقبَلَ إِلیكُم شَهرُ اللَّهِ بِالبَرَكَةِ وَ الرَّحمَةِ‘‘रमजान का महीना तुम्हारी ओर अपनी बरकत और रहमत के साथ आ रहा है। अगर हम रमज़ान का परिचय कराना चाहें कि रमज़ान क्या है? तो इतना कह सकते हैं कि रमज़ान यह हर तरह के अवसर का महीना है, यह एक उचित समय है। इस महीने में हमारे और आपके पास बहुत से अवसर हैं, रोज़ा रखने का अवसर, क़ुरआने करीम की तिलावत का अवसर, गुनाहों से बचने का अवसर, तौबा और इस्तिग़फ़ार का अवसर, दूसरों की सहायता करने का अवसर, दोस्तों के दर्द को समझने का अवसर और इस तरह की बहुत सी चीज़ों का अवसर। अगर हम इनसे सही फ़ायदा उठा सकें तो बहुत बड़ा आध्यात्मिक ख़ज़ाना हमारे हाथ लग सकता है।ख़ुदा की तरफ़ से दावतइसी ख़ुतबए शाबानिया में रसूले ख़ुदा स. फ़रमाते हैं-’’شَهر دُعِیتُم فِیهِ إِلىٰ ضِیَافَةِ اللَّهِ‘‘इस महीने में तुम्हे अल्लाह का मेहमान बनाया गया है, इसमें अल्लाह की तरफ़ से आपको दावत दी गई है। इसका क्या मतलब यह है? इसका मतलब यह है कि किसी को आने पर मजबूर नहीं किया गया है। किसी को रहमतों से भरे इस ख़ुदाई दस्तरख़्वान पर ज़बरदस्ती नहीं बैठाया गया है, बहुत से लोग हैं जो इस दावत की ओर ध्यान भी नहीं देते, वह इस दुनिया में, इसकी चमक दमक में इतना को चुके हैं कि उन्हें पता भी नहीं चलता कि कब रमज़ान या और कब चला गया, बहुत से नेवता पढ़ते हैं, उन्हें मालूम होता है कि दावत दी गई है लेकिन दावत में आते नहीं है, यह वह लोग हैं जिन पर अल्लाह की कृपा नहीं होती, अल्लाह उन्हें तौफ़ीक़ व अवसर नहीं देता है कि वह रोज़ा रखें, क़ुरआन की तिलावत करें, दुआ व इस्तिग़फ़ार करें। और वह लोग जो इस दावत में आते हैं वह भी एक जैसे नहीं होते। बहुत से थोड़ा सा हासिल करते हैं और कुछ बहुत सा लेकर जाते हैं।वह लोग जो रोज़ा रखते हैं वह अल्लाह के मेहमान हैं और वह उससे लाभ भी उठा रहे हैं। कुछ लोग रोज़े के अलावा क़ुरआन से भी काफ़ी कुछ लेते हैं, क़ुरआन पढ़कर और उसमें सोच विचार कर के, रोज़े की हालत में क़ुरआन की तिलावत का आनन्द ही कुछ और है इसमें एक ख़ास आध्यात्मिकता व रूहानियत होती है। कुछ लोग इससे बढ़कर ख़ुदा से दुआ करते हैं, राज़ो नयाज़ करते हैं, अपने दिल की बात करते हैं, अपने अन्दर के राज़ ख़ुदा से बताते हैं, जो दुआंए हमारे नबियों नें और हमारे इमामों नें हमें सिखाई हैं उन्हें पढ़कर ख़ुदा से बातें करते हैं, दिन में, रात में, सहरी के समय, जिस समय उनका जी चाहता है ख़ुदा से बातें करते हैं। यह वो लोग हैं जो इस महीने से पूरा पूरा फ़ायदा उठाते हैं, इस दावत में जितनी चीज़ें हैं सबका आनन्द लेते हैं। और उनसे बढ़कर वह लोग हैं जो एक तरफ़ इन चीज़ों से भी फ़ायदा उठाते हैं और दूसरी तरफ़ गुनाह भी नहीं करते। हज़रत अली अ. नें एक बार रसूलुल्लाह स. से पूछा- इस महीने में सबसे अच्छा काम क्या हो सकता है? आपने जवाब दियाः’’اَلوَرَعُ عَن مَحَارِمِ اللَّهِ‘‘हराम कामों से और गुनाहों से परहेज़। यह काम दूसरे कामों से भी ज़्यादा ज़रूरी है, क्योंकि दूसरे कामों का फ़ायदा उसी समय है जब गुनाहों से बचा जाए। यह इन्सान को इस्लामी अख़लाक़ (नैतिकता) से भी क़रीब करता है, फिर इन्सान का दिल भी नफ़रत और हसद व ईर्ष्या से ख़ाली हो जाता है, इन्सान के अन्दर दोस्तों के लिये क़ुरबानी देने की मांग बढ़ती है, ग़रीबों और निर्धन लोगों की सहायता उसके लिये आसान हो जाती है, इसी लिये आप देखते हैं कि रमज़ानुल मुबारक में अपराध और पाप बहुत कम हो जाते हैं, अच्छे काम ज़्यादा किये जाते हैं, लोगों के बीच मोहब्बत बढ़ती है, यह सब उसी दावत में आने और ख़ुदा का मेहमान बनने का असर है। इसलिये हमारी कोशिश यही होनी चाहिये कि इस दावत से ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाएं। रोज़ा रखकर भी, क़ुरआने करीम की तिलावत द्वारा भी, गुनाहों से दूर होकर भी, दुआओं के द्वारा भी, तौबा व इस्तिग़फ़ार द्वारा भी, उसकी हर चीज़ से फ़ायदा उठाएं ताकि उसके सही बंदे बन सकें।
18 जुलाई 2013 - 19:30
समाचार कोड: 442621
रमज़ानुल मुबारक अपनी रहमतों, बरकतों और आध्यात्मिक ख़ुबसूरतियों के साथ एक बार फिर आया है। रमज़ान का मुबारक महीना शुरू होने से पहले रसूले अकरम स. लोगों को इस महीने के लिये तैयार करते थे।