12 जुलाई 2013 - 19:30
रोज़ा दिल को पाक करता है।

अल्लाह तआला नें इन्सान को कुछ ऐसा बनाया हैकि उसे तरबियत (ट्रेनिंग) की ज़रूरत है। बाहर से भी तरबियत की ज़रूरत है और अन्दर से भी. उसे ख़ुद चाहिये कि अपनी तरबियत करे और अपने आपको हर गंदगी से पाक करे। तरबियत दो तरह की है एक तरबियत यह है कि इन्सान की सोच ठीक हो जिसके लिये शिक्षा की ज़रूरत है जिसे क़ुरआन की ज़बान में तालीम कहा जाता है

अल्लाह तआला नें इन्सान को कुछ ऐसा बनाया हैकि उसे तरबियत (ट्रेनिंग) की ज़रूरत है। बाहर से भी तरबियत की ज़रूरत है और अन्दर से भी. उसे ख़ुद चाहिये कि अपनी तरबियत करे और अपने आपको हर गंदगी से पाक करे। तरबियत दो तरह की है एक तरबियत यह है कि इन्सान की सोच ठीक हो जिसके लिये शिक्षा की ज़रूरत है जिसे क़ुरआन की ज़बान में तालीम कहा जाता है और दूसरी तरबियत यह है कि इन्सान का दिल पाक हो, उसकी इच्छाएं, उसका मन और उसकी कामनाएं कंट्रोल में हों, इसलिये अन्दर की दुनिया को पाक साफ़ करने की ज़रूरत है. क़ुरआन की ज़बान में इसे तरबियत कहते हैं। अगर इन्सान को सही शिक्षा मिले और उसका तज़किया (शुद्धीकरण) भी हो तो वह एक सही इन्सान बनेगा जो दुनिया में रहकर दूसरे इन्सानों को भी फ़ायदा पहुँचाएगा, उनके लिये रौशनी बनेगा, उनके लिये हिदायत का कारण बनेगा और जब उस दुनिया में जाएगा तो उसे वह सब कुछ मिलेगा जिसकी हर इन्सान इच्छा करता है यानी एक ऐसा जीवन जिसका अन्त नहीं यानी जन्नत। इसी लिये हम देखते हैं कि पहले नबी से आख़िरी नबी तक सारे नबियों का एक ही मक़सद था- तालीम और तज़किया।’’وَیُزَکِّیھَم وَ یُعَلِمُھُمُ الکِتَابَ وَالحِکمَۃَ‘‘यानी वह लोगों की अक़्ल की तरबियत भी करते थे और उनके दिल और आत्मा की भी।रूह की एक्सरसाइज़अल्लाह की तरफ़ से जो चीज़ें हम वाजिब, हराम, मुस्तहेब या मकरूह की गई हैं उनका मक़सद यही दो चीज़ें तालीम और तरबियत हैं, यह इस लिये हैं ताकि हम सही इन्सान बन जाएं। यह एक तरह की एक्सर साइज़ है। अगर हम बदन की एक्सर साइज़ न करें तो हमारा बदन कमज़ोर, सुस्त और बूढ़ा हो जाएगा। उसे ताक़तवर और ख़ूबसूरत बनाने के लिये एक्सर साइज़ बहुत ज़रूरी है, नमाज़ भी एक तरह की एक्सर साइज़ है, रोज़ा भी एक्सर साइज़ है, ख़ुदा के लिये कुछ देना एक्सर साइज़ है, झूठ न बोलना एक्सर साइज़ है, गुनाहों से दूर होना एक्सर साइज़ है, दूसरों के लिये अच्छा सोचना और उनके साथ अच्छा करना एक्सर साइज़ है। इनके द्वारा इन्सान की रूह ख़ूबसूरत और ताक़तवर होती है। अगर हम रूह की यह एक्सर साइज़ करें तो हो सकता है कि हमारा जिस्म तो ख़ूबसूरत और ताक़तवर हो लेकिन हमारी रूह बहुत ही कमज़ोर हो। रमज़ान के मुबारक महीने में रूह की एक एक्सर साइज़ यही रोज़ा है।रोज़े की शर्तरोज़ा केवल यह नहीं है कि इन्सान खाना पीना छोड़ दे बल्कि उसमें नियत की शर्त है यानी भूख और प्यास ख़ुदा के हुक्म से उससे क़रीब होने के लिये हो, मान लीजिए अगर एक दिन आप बारह घण्टे, पन्द्रह घण्टे यूँ ही भूखे रहें तो आपको कोई सवाब नहीं मिलेगा लेकिन अगर उसी भूख प्यास के पीछे नियत हो तो उसका रूप ही बदल जाएगा।रोज़े की शर्त नियत है। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि रोज़ा, यह भूख और प्यास, दूसरी बहुत सी चीज़ों से ख़ुद को रोकना और यह सब कुछ उस नियत से करें कि खुदा की आज्ञा का पालन करना। यह चीज़ हमारे हर काम को महानता देती है। रमज़ानुल मुबारक की पहली रात की दुआ में हम पढ़ते हैं:’’اَللّٰھُمَّ  اجعَلنَا مِمَّن نَویٰ فَعَمِلَ وَ لَا تَجعَلنَا مِمَّن شَقَیٰ فَکَسِلَ‘‘ख़ुदाया, हमें न लोगों जैसा बना जो पहले नियत करते हैं फिर कोई काम करते हैं और उन लोगों जैसा न बना जिनके दिल पत्थर हो गए और उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करने में सुस्ती की।साँसे, तसबीह और सोना इबादतरोज़े में ज़ाहिरी तौर पर कुछ करना नहीं होता लेकिन वास्तव में यह एक बहुत बड़ा काम है। चूँकि जब इन्सान नियत कर लेता है और सुबह की अज़ान से रात की अज़ान तक बहुत से कामों को छोड़ देता है, या पूरे दिन इबादत की हालत में होता है यहाँ तक कि अगर रोज़े की हालत में सो भी जाए तो भी इबादत कर रहा होता है। उसका उठना बैठना और चलना फिरना भी इबादत होता है जैसा कि रसूले अकरम स. फ़रमाते हैं-’’اَنفَاسُکُم فِیہِ تَسبِیح وَ نَومُکُم فِیہِ عِبَادَۃ‘‘तुम्हारी साँसे इसमें तसबीह और तुम्हारा सोना इबादत है।इन्सान का सोना कैसे इबादत हो सकता है? सांस लेना किस तरह सुब्हानल्लाह के बराबर होता है? इसका कारण यह है कि जब इन्सान ख़ुदा की नियत से रोज़ा शुरू करता है तो वह कोई काम न भी कर रहा हो तो भी इबादत की हालत में होता है।एक दूसरी रवायत में आया है-’’نَوم ُ الصَّائِمِ عِبَادَۃ  وَ صُمتُہُ تَسبِیح‘‘रोज़ेदार का सोना इबादत और उसकी ख़ामोशी इबादत है। रोज़ेदार ख़ामोश भी हो तो भी जैसे वह सुबहानल्लाह पढ़ रहा हो।’’عَمَلُہُ مُتَقَبّل وَ دُعَا ئُہُ مُستَجَاب‘‘उसका हर अमल और दुआ अल्लाह के यहाँ क़ुबूल होती है।सेल्फ़ कन्ट्रोलइन सब चीज़ों का आधार सेल्फ़ कंट्रोल (आत्म संयम) है। इन चीज़ों द्वारा इन्सान उन अच्छाइयों से लड़ता है जो बर्बादी की तरफ़ ले जाती हैं या उसकी गिरावट का कारण बनती हैं। ख़ुद को बिल्कुल आज़ाद छोड़ देने में कोई गुण नहीं है। खाने पीने और इस तरह की दूसरी चीज़ों से मनोरंजन करते रहना कोई हुनर नहीं है यह तो जानवर भी करते हैं। इन्सान के अन्दर कुछ अच्छाइयां वह हैं जो जानवरों की होती हैं हालांकि वह इन्सानों के लिये भी ज़रूरी हैं लेकिन एक हद तक, खाना पीना, आराम करना और  सोना, जाएज़ चीज़ों से मनोरंजन करना यह भी इन्सान के लिये ज़रूरी है, इन चीज़ों से रोका नहीं गया है, हाँ इन्सान इन्हीं चीज़ों के पीछे लगा रहे इससे रोका गया है। इसे कंट्रोल करने को कहा गया है। इसे अपनी हद में रखने को कहा गया है क्योंकि अगर इसे कंट्रोल न किया जाए तो इन्सान जानवरों जैसा हो जाता है बल्कि कभी कभी उनसे भी नीच हो जाता है। रमज़ानुल मुबारक में इन्सान को एक ख़ास मौक़ा दिया गया है कि वह अपनी उन इच्छाओं पर कंट्रोल करना सीखे, उसका एक ज़रिया यही रोज़ा है। रोज़ा इन्सान को सिखाता है कि किस तरह ख़ुद को खाने पीने से दूर रखे, किस तरह इन चीज़ों से ख़ुद को रोके रखे जिन पर कंट्रोल न करना उसे जानवर बनाता है और किस तरह ख़ुद को गुनाहों से बचाए। मक़सद यही है कि इन्सान अपने अन्दर के शैतान से लड़े और उसे हरा के हर चीज़ को अपने कंट्रोल में ले ले। इसी लिये रोज़ा केवल खाना पीना छोड़ देने को नहीं कहते बल्कि रोज़े में हर चीज़ इन्सान के कंट्रोल में होनी चाहिये। इमाम सादिक़ अ. एक हदीस में मोहम्मद इब्ने मुस्लिम से फ़रमाते हैं-’’یَا مُدمّ ! إِذَا صُمتَ فَلیَصُم سَمعُكَ وَ بَصَرُكَ وَ لِسَانُكَ وَ لَحمُكَ وَ دَمُكَ وَ جِلدُكَ وَ شَعرُكَ وَ بُشرُكَ ‘‘इमाम सादिक़ अ. अपने साथी से फ़रमाते हैं जब रोज़ा रखो तो तुम्हारे कान का भी रोज़ा हो, तुम्हारी आँखें भी रोज़ा हों, तुम्हारी ज़बान भी रोज़े की हालत में हो, तुम्हारा गोश्त, तुम्हारी खाल, तुम्हारे बाल और हर चीज़ रोज़ेदार होना चाहिये। रोज़े के हालत में झूठ न बोलना, मोमिन भाइयों को दुख न पहुँचाना, शरीफ़ लोगों को बेवक़ूफ़ न बनाना, मुसलमान भाइयों और इस्लामी समाज के विरुध कोई ग़लत प्लानिंग न करना, किसी पर आरोप न लगाना, नाप तौल में कमी न करना अमानत में ख़यानत न करना। हदीस के आख़िर में इमाम फ़रमाते हैं-’’وَ لَایَكُونُ یَومَ صَومِكَ كَیَومِ فِطرِكَ ‘‘तुम्हारे रोज़े का दिन तुम्हारे आम दिनों जैसा न हो। रमज़ान के दिनों में दूसरे दिनों जैसे न रहना बल्कि इस अवसर से सही फ़ायदा उठाकर अपने आपको बनाना और सुधार लाना। एक हदीस में हज़रत अली अ. फ़रमाते हैं-’’صُومُ النَّفسِ اِمسَاكُ الحَواسِ الخَمسِ عِن سِائِرِ المَأثِمِ ‘‘नफ़्स के रोज़े में और पेट के रोज़े में अन्तर है। नफ़्स का रोज़ा यह है कि इन्सान के पाँचों सेंस (इन्द्रियां) गुनाहों से बचें।’’و خُلوُّ القَلبِ مِن جَمِیعِ اَسبَابِ الشَّرِ‘‘दिल हर क़िस्म की बुराई, गंदगी से पाक साफ़ हो।