ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है,ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा।जब यह ख़बर हमारे कानों तक पहुँची कि इस्लाम, मुसलमानों और अहलेबैत अ. के कुछ दुश्मनों नें रसूलुल्लाह स.अ. और इमाम अली अ. के सहाबी जनाबे हुज्र इब्ने अदी कंदी के मज़ार को गिराकर उनकी क़ब्र को खोदा और उनकी लाश निकाल कर ले गए तो दिल ख़ून के आँसू रोया। नहीं मालूम यह लोग किस तरह ख़ुद को मुसलमान कहते हैं। ज़ुल्म को किस तरह जेहाद का नाम देकर इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम करते हैं और सब से ज़्यादा अफ़सोस इस बात पर होता है कि कुछ इस्लामी मुल्क और वहाबी मुफ़्ती उनका समर्थन करते हैं और उनके पक्ष में फ़तवे देते हैं, हालांकि अहलेबैत अ. के शियों के लिये यह कोई नई बात नहीं है उन्हें अहलेबैत अ. से मोहब्बत की सज़ा मिलती रही है। लेकिन यह अहलेबैत अ. का चमत्कार है कि वह फिर भी मौत से घबरा कर हक़ और सच्चाई से पीछे नहीं हटे हैं। शायद हमारे बहुत से जवान भाई हुज्र इब्ने अदी के बारे में ज़्यादा जानकारी न रखते हों और यह न जानते हों कि हज़रत अली अ. के उस दोस्त, सहाबी और आशिक़ की श्रेष्ठता क्या है। इस आर्टकिल में हम उनकी ज़िन्दगी के कुछ पहलुओं को बयान करेंगे जिससे उनकी श्रेष्ठता और महानता मालूम होगी।एक नज़र मेंकूफ़े का एक क़बीला, कन्दा था, जिसकी वजह से हुज्र को कन्दी कहा जाता था। कूफ़े के जिस इलाक़े में वह रहते थे उसका नाम, ख़ैर था इसलिये उन्हें हुजरुल ख़ैर भी कहा जाता था।इस्लाम से पहले उनका जन्म हुआ लेकिन रसूले ख़ुदा स.अ. के जीवन के आख़री दिनों में मुसलमान हुए। इसलिये रसूलुल्लाह स.अ के साथ ज़्यादा टाइम नहीं रह सके लेकिन मुसलमान होने के बाद हमेशा हक़ के लिये लड़ते रहे।एक नेक इन्सान ख़ुदा की इबादत करने वाले, ज़ुल्म के विरुद्ध लड़ने वाले लोगों को अच्छाइयों की तरफ़ बुलाने और बुराइयों से रोकने वाले थे। नमाज़ और इबादत के इतने आशिक़ थे कि उन्हे रसूल्लाह के साथियों में एक राहिब कहा जाता था। हमेशा वुज़ू की हालत में रहते और जब भी वुज़ू करते तो नमाज़ ज़रूर पढ़ते थे। कूफ़े के एक ख़ूबसूरत जवान भी थे और अख़लाक़ और चरित्र में भी काफ़ी महान थे। इस्लाम का मैसेज आने के काफ़ी टाइम बाद मुसलमान हुए। जिस समय वह मुसलमान हुए वह 28 साल के एक जवान थे लेकिन ईमान में ऐसे बहुत से बूढ़ों से भी ज़्यादा मज़बूत थे जो उनसे पहले ईमान लाये थे।अल्लाम सय्यद मोहसिन अमीन उनके बारे में लिखते हैं: हुज्र इब्ने अदी रसूलुल्लाह स.अ के नेक सहाबियों में, एक बहादुर कमाण्डर, बड़ी हिम्मत वाले ज़ाहिद व आबिद थे जिन्हें ख़ुदा की पहचान थी, हर क़दम पर ख़ुदा और रसूल की आज्ञा का पालन करते थे इसी लिये उनकी दुआ जल्दी क़ुबूल होतीं थी, हमेशा हक़ और सच कहते, ज़ुल्म के विरोध में लोहे की दीवार बन जाते, मौत और शहादत से बिल्कुल नहीं डरते थे, इमाम अली अ. के ख़ास मानने वाले। सिफ़्फ़ीन, जमल और नहरवान की जंगों में इमाम की तरफ़ से कमाण्डर भी थे जिससे उनकी बहादुरी का पता चलता है। जिस ज़माने में हज़रत अली अ. को बुरा भला कहा जाता था और उन्हें गालियां दी जाती थीं, हुज्र को भी मजबूर किया गया कि वह अपने इमाम को बुरा कहें लेकिन वह इस बात पर तैयार नहीं हुए और इमाम अली अ. की मोहब्बत में शहादत को ख़ुशी से गले लगाया। उनके बेटे को भी उनके साथ शहीद किया गया बल्कि उन्होंने अपने बेटे को पहले शहीद करने को कहा ताकि कहीं ऐसा न हो कि बाप को शहीद होता देख बेटा डर जाए और हज़रत अली अ. की मोहब्बत से पीछे हट जाए।ज़िन्दगी के कुछ पलहुज्र इब्ने अदी नें जब रसूलल्लाह स.अ. के पास आकर इस्लाम क़ुबूल किया और मुसलमान हुए तो उसके बाद पूरे तन, मन और धन से इस्लाम के प्रचार और उसकी सेवा में लग गए। वह रसूले ख़ुदा स.अ. से जो बात सुनते वह दूसरों को बताया करते थे। ख़ुद मदीने से दूर कूफ़े में थे लेकिन मदीने में कई लोगों के साथ जुड़े हुए थे ताकि उन्हें वहाँ के हालात और ख़बरें मालूम होती रहें।जब उन्हें मालूम हुआ कि रसूले इस्लाम स.अ. और हज़रत अली अ. के एक इन्क़ेलाबी साथी जनाबे अबूज़र को मदीने से निकाल कर रबज़ा भेज दिया गया है तो जनाबे मालिके अश्तर के साथ जनाबे अबूज़र के पास आए। जनाबे अबूज़र का देहान्त उनके सामने ही हुआ और आप ही लोगों नें उनके ग़ुस्ल, कफ़न और दफ़न का इंतेज़ाम किया।तीसरे खलीफ़ा की ख़िलाफ़त के ज़माने में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया था जिस पर बहुत से लोगों को ऐतराज़ था। कूफ़े में 12 नेक और मशहूर लोगों नें जनाबे उसमान को ख़त लिखा और उनके कामों पर ऐतराज़ किया। उन ख़त लिखने वालों में जनाबे हुज्र इब्ने अदी भी थे। वह हज़रत अली अ. को रसूलुल्लाह का सही और सच्चा ख़लीफ़ा मानते थे और उनके हक़ का डिफ़ेन्स भी करते थे, बहुत से लोग उन्हें समझाया तरते कि वह इस तरह हज़रत अली अ. का डिफ़ेन्स न करें उनकी जान को ख़तरा हो सकता है लेकिन वह इन बातों की तरफ़ ध्यान नहीं देते थे और किसी के साथ कोई साज़ बाज़ भी नहीं करते थे।जनाबे उस्मान के क़त्ल के बाद जब हज़रत अली अ. को ख़लीफ़ा बनाया गया तो हुज्र मैदान में कूद पड़े और हर तरह से हज़रत अली का समर्थन किया और उनकी हुकूमत में सेवा करने लगे। वह उन लोगों में से थे जो रसूले ख़ुदा स.अ के बाद केवल हज़रत अली अ. से हदीसे सुनते और उन्हें दूसरों से बयान करते थे।हज़रत अली अ. की ख़िलाफ़त के ज़माने में जब बहुत से लोगों नें उनकी बैअत तोड़ दी और आपके साथ जंग करने की तैयारियां करने लगे तो हज़रत ने अपना एक दूत कूफ़ा भेजा और उनसे मदद की अपील की। बहुत से लोगों नें खुल कर इमाम की सहायता का ऐलान किया जिनमें से एक हुज्र इब्ने अदी थे। उन्होंने कूफ़े वालों से कहा: ऐ लोगों! अमीरुलमोमिनीन की मदद के लिये उठो। जिस तरह से हो सके घोड़ो पर या पैदल अपने इमाम की सहायता के लिये जल्दी करो, मैं तुम लोगों में सबसे पहले उनकी मदद को जा रहा हूँ।सिफ़्फ़ीन में भी आपने इमाम की सहायता कर के अपने ईमान का सुबूत दिया। जमल और सिफ़्फ़ीन दोनों जंगों में इमाम नें आपको कमाण्डर बनाया था।जंग में खुलकर इमाम से मोहब्बत को ज़ाहिर करते: ख़ुदाया! अली को, उस पवित्र और नेक इन्सान को जिससे हम मोहब्बत करते हैं, हमेशा बचा कर रखना। ख़ुदाया उसे इस उम्मत की हिदायत करने वाला बना। ख़ुदाया जिस तरह तूने अपने पैग़म्बर की रक्षा की उनकी रक्षा कर क्योंकि पैग़म्बर नें तेरे हुक्म से उन्हें अपना ख़लीफ़ बनाया है। जंगे सिफ़्फ़ीन में जब ख़्वारिज हज़रत अली अ. से अलग हो गए और हज़रत नें उनके विरुद्ध जंग का ऐलान किया तो हुज्र इब्ने अदी नें ख़्वारिज का काम ख़त्म करने के लिये फिर से अपने इमाम का साथ दिया और इमाम नें उनकी बहादुरी, ईमान और सच्चाई को देखते हुए उन्हें फिर से अपना कमाण्डर बनाया।नहरवान की जंग ख़त्म होने और ख़वारिज की पराजय के बाद मुआविया अपने फ़ौजियों को हज़रत अली अ. की हुकूमत वाले इलाक़ों में भेजता था ताकि वह वहाँ जाकर आतंकवाद, क़त्ल, लूट-मार, अशांति और अफ़वाहों के द्वारा इमाम अ. की हुकूमत को कठिनाइयों और संकट में डाले। इसको देखते हुए इमाम एक बार फिर अपनी फ़ौज को इकट्ठा कर के सीरिया के विरुद्ध लड़ना चाहते थे ताकि उनकी सारी शैतानियों को जड़ से उखाड़ फेंकें लेकिन आपके बहुत से कमाण्डर्ज़ नें आपका साथ नहीं दिया। एक बार आपने कूफ़े वालों से मदद माँगी तो कुछ क़बीलों को छोड़ कर सबने इंकार कर दिया जिस पर इमाम बहुत दुखी हुए। हुज्र इब्ने अदी से इमाम का दुख देखा न गया और आपने इमाम से फ़रमाया: ऐ मोमिनों के सरदार! “ख़ुदा आपको दुखी न होने दे। आप आज्ञा दीजिए हम तैयार हैं। अगर आपकी आज्ञा में हमारी जानें, हमारा माल, हमारे बच
6 मई 2013 - 19:30
समाचार कोड: 416974
जब यह ख़बर हमारे कानों तक पहुँची कि इस्लाम, मुसलमानों और अहलेबैत अ. के कुछ दुश्मनों नें रसूलुल्लाह स.अ. और इमाम अली अ. के सहाबी जनाबे हुज्र इब्ने अदी कंदी के मज़ार को गिराकर उनकी क़ब्र को खोदा और उनकी लाश निकाल कर ले गए तो दिल ख़ून के आँसू रोया।