24 फ़रवरी 2013 - 20:30

दुनिया की चार बड़ी क्रान्तियों की आपसी तुलना के लिये उनकी सामान्य विशेषताएं यानी कि आख़री मंज़िल, मक़सद, नारे, आईडियालॉजी, लीडरशिप और जनता की हिस्सेदारी जानना ज़रूरी है.........

फ़ार्स न्यूज़: दुनिया की चार बड़ी क्रान्तियों की आपसी तुलना के लिये उनकी सामान्य विशेषताएं यानी कि आख़री मंज़िल, मक़सद, नारे, आईडियालॉजी, लीडरशिप और जनता की हिस्सेदारी जानना ज़रूरी है।तेहरान यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डाक्टर मुस्तफ़ा मलकूतयान नें Khamenei.ir से अपनी एक बातचीत में ईरान, फ़्रांस, रूस और अल-जज़ाएर की क्रान्तियों पर रौशनी डाली और इनकी एक दूसरी से तुलना की है।सवाल: 1789 में फ़्रान्स में लिबरल इन्क़ेलाब आया, 1917 में रूस में बाएं बाज़ू का इन्क़ेलाब आया, 1962 में अल-जज़ाएर में इस्लाम के नाम पर इन्क़ेलाब आया। अगर हम इन तीन क्रान्तियों की एक दूसरे से तुलना करना चाहें तो हमें कौन सी चीज़ें मद्दे नज़र रखना होंगी?जवाब: इन क्रान्तियों की आपसी तुलना के लिये इनकी चार सब से अहम सामान्य विशेषताएं मद्देनज़र रखना होंगी:1. आख़िरी मंज़िल, मक़सद और नारे2. आईडियालाजी3. लीडरशिप का अन्दाज़ और तरीक़ा 4. जनता की क्रान्ति में हिस्सेदारीरूस के अक्टूबर के इन्क़ेलाब से शुरुवात करते हैं। इसका असर आधी दुनिया पर पड़ा और उसके बाद यह मुल्क एक बड़ी ताक़त बन कर उभरा। इसके लिये हमें सबसे पहले यह देखना होगा कि उस समय वहाँ कौन सी सियासी ताक़तें सक्रिय थीं। रशन सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी सब से अहम सियासी पार्टी थी जिसमें मार्क्स्ट भी थे। हालांकि बाद में उनमें दरार पड़ गई और कुछ लोग मार्टो की लीडरशिप में पार्टी से अलग हो गए उन्हें मन्शवीक या माएनारिटी कहा जाने लगा। इसी तरह लेनन की लीडरशिप में चलनें वालों को बल्शवीक या मेजारिटी कहा जाने लगा। पहले वर्ल्ड वार (विश्व युद्ध) नें रूस के इन्क़ेलाब में अहम रोल निभाया। आस्ट्रिया के उत्तराधिकारी (प्रिंस) को सरायूद (सरबस्तान) में क़त्ल कर दिया गया और आस्ट्रिया नें सरबिस्तान पर चढ़ाई कर दी। रूसियों नें कहा हम भी ओसलो हैं और सर्ब भी ओसलो। इस तरह रूस नें भी आस्ट्रिया के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी। जब लड़ाई बढ़ी तो शुरू में रूस को कामयाबी मिलती गई लेकिन एक तरफ़ बीस डिग्री से कम तापमान और दूसरी तरफ़ जहाँ बहुत से फ़ौजी मर चुके या ज़ख़्मी हो गए थे वहीं बहुत से भाग गए। इन हालात में रूस के लिये जंग बड़ी कठिन हो गई। आगे चल कर भी कामयाबी जर्मनी वालों को मिली। सुप्रीम लीडर कहते हैं:मैंनें जितना भी ग़ौर किया मुझे इस्लामी इन्क़ेलाब जैसा कोई इन्क़ेलाब नहीं मिला कि पहले दौर में जो तब्दीली आई वह बाद के दशकों में उसी शक्ल में बाक़ी रही और उसी मक़सद, उसी मंज़िल और उसी दिशा में आगे बढ़ी। दूसरी क्रांतियों में या तो पहली तब्दीली आगे ही नहीं बढ़ी जैसे रूस का इन्क़ेलाब या आगे बढ़ी लेकिन एक लम्बे गैप के साथ... जैसे फ़्रांस का बड़ा इन्क़ेलाब। ख़राब आर्थिक हालात के साथ अख़लाक़ी व नेतिक गिरावट और करेपशन की अफ़वाहों नें हुकूमत का चेहरा बिगाड़ कर रख दिया। जिसके कारण हुकूमत कमज़ोर हो गई और नतीजे में इन्क़ेलाब दो चरणों में पूरा हुआ। पहले फ़रवरी 1917 में जब लेनन लीडर नहीं थे क्रांतिकारियों नें जंग से लौट रहे एलेकेंसडर नेकुला सेकेंड की गाड़ी रोक कर उसकी हुकूमत गिरा दी और क्रसकी की अध्यक्षता में नई अस्थायी सरकार बना डाली। लेनन स्वीडज़र लैण्ड में थे और उनके पास कोई सरकारी पद नहीं था। जर्मनी वाले रुसियों को जल्दी से जल्दी मैदाने जंग से वापस करना चाहते थे इसलिये उन्होंनें लेनन के साथ एक एग्रीमेंट कर लिया। अस्थायी हुकूमत के ज़्यादातर सदस्य सोशलिस्ट क्रांतिकारी थे, मारक्रस्ट बहुत कम थे। इनके बाद लेनन नें कमान संभाल ली। ग़ौर करने की बात यह है कि इन सारी तब्दीलियों में सारे आम लोग शामिल नहीं थे। केवल कुछ मज़दूरों और कुछ सिपाहियों नें इन्क़ेलाब का साथ दिया। लेनन नें कुछ मल्लाहों को अपने साथ मिला लिया और उन बलशवीक मल्लाहों नें अस्थायी सरकार के ख़िलाफ़ एक कूदता करके हुकूमत पर क़ब्ज़ा कर लिया। यह रूस के इन्क़ेलाब का दूसरा चरण था जो अक्टूबर 1917 में पूरा हुआ।सवाल: यानी शुरू में बड़े पैमाने पर लोग साथ नहीं थे। बाद में क्या हुआ? और इन्क़ेलाब और उसकी लीडरशिप लोगों से किस तरह जुड़ी?जवाब: पहले दौर में लीडरशिप बहुत ही कमज़ोर थी लेकिन दूसरे दौर में बहुत मज़बूत हो गई। लेनन के बाद स्टालिन की बारी आई जिसनें हिंसा शुरू कर दी और मुल्क में अंदरूनी लड़ाईयां ज़ोर पकड़ने लगीं। पश्चिम नें स्टालिन के विरोधियों की हिमायत की। आंकड़ों के अनुसार नब्बे लाख से दो करोड़ की संख्या में लोग मार डाले गए और इस सबके नतीजे में सोवियत यूनियन टूट गई।सवाल: यानी टूटने का कारण इन्क़ेलाब और आम जनता में ताल मेल नहीं होना था? सरकार अपने विचार नई पीढ़ी तक पहुँचाने में नाकाम रही जिसके कारण लोगों नें इन्क़ेलाब की हिमायत नहीं की और जिस हुकूमत के बाहरी दुश्मन ज़्यादा हों वह उसी सूरत में चल सकती है जब जनता का साथ हो। किसी भी इन्क़ेलाब के चलने में लोगों का बेसिक रोल होता है। लेकिन रूस के इन्क़ेलाब और लोगों में दूरी का मौलिक कारण एक तो इन्क़ेलाब का सही मक़सद न रखना था औऱ दूसरे यह कि इसके लाने ही में लोग पूरी तरह शामिल नहीं थे। मक़सद औऱ मुल्क का कल्चर जितना पास पास होंगे उतना ही कामयाबी की उम्मीद है। लेकिन यहाँ मक़सद जर्मनी के मार्क्स के नज़रिये पर आधारित था जोकि रूस के कल्चर और इतिहास से मेल नहीं खा पाया और उसी कारण सरकार लोगों को साथ न मिला पाई।एलेक्सी टोकील अपनी किताब, “फ़्रांस का इन्क़ेलाब और उससे पहले की हुकूमत” में लिखते हैं, “हम फ़्रेंच लोगों को अगर इन्साफ़ और आज़ादी में से किसी एक को चुनना हो तो हम इन्साफ़ को चुनेंगे। इसलिये कि ऐतेहासिक रूप से हमसे जुड़ा औऱ आज़ादी से बेहतर है।” यह अलग बात है कि ख़ुद फ़्रांस का इन्क़ेलाब इंसाफ़ के बजाए आज़ादी से ज़्यादा क़रीब था।सवाल: रूस के इन्क़ेलाब की आईडियालॉजी के पहलू क्या थे कि जिनकी वजह से लोग ख़ुद को इन्क़ेलाब से जोड़ न पाए?जवाब: आईडियालॉजी का बेस कुछ कम ज़्यादा करके मार्क्स ही के नज़रिये थे जिसके अहम पहलू अर्थव्यवस्था, वर्गीय गैप और पूरी दुनिया तक फैलाव थे। आज़ादी की कोई गुंजाइश नहीं थी और इन्साफ़ के मानी हर चीज़ का सरकारी होना था यानी सारी पैदावार हुकूमत के हाथ में हो और लोगों तक बस इतना पहुँचे कि खा के मरें ना।इस तरह रूस और ईरान के इन्क़ेलाब में मौलिक अंतर मक़सद और आईडियालॉजी का ग़लत और सही होना है। इस्लामी इन्क़ेलाब का मक़सद नेचर के बेस पर क़ाएम हुआ था इसलिये इसके पुराने हो जाने का सवाल ही नहीं उठता जबकि रूस के इन्क़ेलाब के मक़सद का बेस इन्सान की अधूरी व अपूर्ण अक़्ल थी जिसके ग़लत होने का बाद में सबको पता चल गया। दूसरी तरफ़ लीडरशिप और पब्लिकली तालमेल नहीं था और न लीडरशिप और मुल्क के कल्चर में तालमेल था। इसी कारण इन्क़ेलाब की शुरूवात और बचाव कहीं भी लोगों का बेसिक रोल नहीं रहा। जबकि इस्लामी इन्क़ेलाब में लोग जानते थे कि उन्हें कहां पहुँचना है और जहाँ पहुँचना वही उनके कल्चर और संस्कृति की मांग है और साथ ही उन्हें लीडरशिप पर पूरा भरोसा था जिसके नतीजे में उन्होंनें हर जगह इन्क़ेलाब में हिस्सा लिया और आज तीस साल से ज़ायादा का समय गुज़रने के बाद भी