8 फ़रवरी 2013 - 20:30

नमाज़े जुमा के दूसरे ख़ुतबे में आयतुल्लाह मुवह्हेदी किरमानी का बयानः विलायते फ़क़ीह के नाम पर हम सब को इकट्ठा हो जाना चाहिये ताकि अमरीका कोई ग़लत क़दम न उठा सके...........

नमाज़े जुमा के दूसरे ख़ुतबे में आयतुल्लाह मुवह्हेदी किरमानी का बयानः विलायते फ़क़ीह के नाम पर हम सब को इकट्ठा हो जाना चाहिये ताकि अमरीका कोई ग़लत क़दम न उठा सके। फ़ार्स न्यूज़ रिपोर्ट, पोलिटिकल डेस्क: कल तेहरान के इमाम ख़ुमैनी रह. मुसल्ला (जामा मस्जिद) में हुई जुमे की नमाज़ के दूसरे ख़ुत्बे में इमामे जुमा आयतुल्लाह मुहम्मद अली मुवह्हेदी किरमानी नें जहाँ इस बात पर ज़ोर दिया कि अगर इन्सान तक़वा व सदाचार इख़्तियार करे तो उसके सामने कभी कोई डेड लाक नहीं आएगी वहीं मुसलमानों में मतभेद की आग भड़काने और आर्थिक पाबंदियाँ लगाने को दुश्मन की इस समय की बड़ी साज़िशों में से गिना।उनका कहना था:मिस्र, सीरिया और इराक़ की सबसे बड़ी समस्या आंतरिक मतभेद है। जिसकी वजह से कुछ लोग एक दूसरे की जान के पीछे पड़े हैं। अगर लोगों में एकता हो तो अमरीका कोई ग़लत क़दम नहीं उठा सकता जैसे ईरान में हम लोग विलायते फ़क़ीह के नाम पर एक रहे तो अमरीका हमारे ख़िलाफ़ कोई ग़लत क़दम नहीं उठा सका। हमारे लीडरों को इस बात का ख़्याल रखना चाहिये कि आपस में कभी ऐसा कोई मनमुटाव न होने पाए जिस पर दोस्त दुखी और दुश्मन ख़ुश हों।“हमारे मासूम इमामों के सामने जब कोई गालियां बकता तो उससे फ़रमाते थे अगर मेरे बारे में तुम्हारा कहा सच है तो ख़ुदा मुझे माफ़ कर दे और अगर तुमने झूठ कहा है तो ख़ुदा तुम्हे माफ़ कर दे।”अमरीका की तरफ़ से आर्थिक पाबंदियां और सख़्ती किये जाने पर रौशनी डालते हुए आयतुल्लाह मुवह्हेदी किरमानी नें कहा:“लोग इस तरह के दबाव के मुक़ाबले के लिये खड़े हैं। पिछले चौतीस साल से पूरी ताक़त से अमरीका मुर्दाबाद कह रहे हैं। इन हालात में भी हुकूमत और अपने दीन को नहीं छोड़ेंगे। इसलिये कि उन्होंनें कर्बला और रमज़ान से सबक़ सीखा है, बाइस बहमन की रैली में यह बात साबित कर दिखाएंगे और क़ुरआन, इमामे ख़ुमैनी रह. और सुप्रीम लीडर से की अपनी बैअत पर बाक़ी रहेंगे।”सीरिया के हवाले से ईरान की पालिसी का ज़िक्र करते हुए उन्होंनें कहा:“सीरिया में ईरान की पालिसी कामयाब रही है। वहाँ की फ़ौज नें वफ़ादारी दिखाई है और अमरीका और इस्राईल के भाड़े के आतंकवादी भेजने की साज़िश नाकाम हो गई है। इसी लिये अब अमरीका बातचीत करना चाहता है। कट्टरपंथी मुल्कों और अमरीका को सीरिया के संकट से ज़िल्लत और अपमान के अलावा कुछ भी हासिल नहीं हुआ और निश्चित तौर पर इस्राईल को भी पछतावा होगा जिसनें सीरिया पर हमला किया है”।.............166