11 जनवरी 2013 - 20:30

हमारे इमामों की ज़िंदगी, उनकी सीरत और उनके कारनामों के बारे में अब तक हज़ारों किताबें लिखीं गई हैं लेकिन उनकी ज़िंदगी की बहुत सी अहेम चीज़ें और काम अब भी निगाहों से ओझल हैं ख़ास कर उनका सियासी कैरेक्टर......

हमारे इमामों की ज़िंदगी, उनकी सीरत और उनके कारनामों के बारे में अब तक हज़ारों किताबें लिखीं गई हैं लेकिन उनकी ज़िंदगी की बहुत सी अहेम चीज़ें और काम अब भी निगाहों से ओझल हैं ख़ास कर उनका सियासी कैरेक्टर।जबकि इस्लामिक हिस्ट्री में इमामों की ज़िंदगी का ज़माना सबसे ज़्यादा सेंसेटिव रहा है। हिस्ट्री लिखने वालों नें भी दुश्मनी या लापरवाही की वजह से उनकी ज़िंदगी को उस तरह से बयान नहीं किया जिस तरह होना चाहिये था इसी लिये हमारे पास इमामों की ज़िंदगी के उन कारनामों के बारे में सही और मुकम्मल इन्फ़ारमेशन नहीं है।हमारे आठवें इमाम हज़रत अली रेज़ा अ. की ज़िंदगी में बीस साल ऐसे हैं जिनके बारे में काफ़ी काम होना चाहिये, जो इमाम की ज़िंदगी का सबसे अहेम और महत्वपूर्ण ज़माना है। हमारे इमामों की ज़िंदगी में एक अहेम चीज़ को बिल्कुल भुला दिया गया है, वह है उनकी सियासी और जेहादी ज़िंदगी। पहली शताब्दी के दूसरे हिस्से यानी लगभग चालीस हिजरी के बाद इस्लामी हुकूमत का सिस्टम ख़िलाफ़त से बादशाहत में बदल दिया गया बल्कि ज़ुल्म की हुकूमत का आरम्भ हो गया। इन हालात को देखते हुए इमामों नें उस वक़्त के हालात के अनुसार अपनी सियासी लड़ाई शुरू की। इस लड़ाई का सबसे बड़ा मक़सद इमामत के विश्वास के आधार पर एक इस्लामी हुकूमत बनाना था। अहलेबैत (अ.) नें जिस तरह दीनी शिक्षाओं को लोगों तक पहुँचाया, ग़लत अक़ीदों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी, इस्लाम को सही तरह से पेश किया, यह सब उसी जिहाद व संघर्ष का एक हिस्सा था। अलबत्ता उनका जिहाद उन्ही चीज़ों में सीमित नहीं था अगरचे मक़सद वही था जो हमनें बताया यानी एक ऐसी इस्लामी हुकूमत जिसमें सही अदालत और इन्साफ़ हो, किसी पर ज़ुल्म न हो, किसी का हक़ न मारा जाए। उनकी या उनके चाहने वालों की ज़िंदगी में जो कठनाईयां थीं उसकी मेन वजह यही थी कि वह ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ते थे, नाइंसाफ़ी व अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते थे और उन चीज़ों के ख़त्म करने के लिये एक इस्लामी हुकूमत बनाना चाहते थे। ख़ास कर इमाम सज्जाद (अ.) के ज़माने से इस चीज़ नें ज़ोर पकड़ा है। अगर आप सोचें तो आपको समझ में आएगा कि हुकूमतों की लड़ाई इमामों और उनके शियों के साथ होतीं थीं और हुकूमतें उन्हें अपना दुश्मन मानतीं थीं। हर इमाम अपनी ज़िंदगी में पूरी कोशिश करता था और जब हुकूमत को लगता था कि अब उनका मिशन कामयाब होने वाला है तो इमाम को जेल में डाल देते थे, उनके चाहने वालों को सताते थे, शियों को क़त्ल करते थे लेकिन जब यह देखते कि यह अपने रास्ते से हटने वाले नहीं हैं तो इमाम को क़त्ल कर देते थे और उसके बाद इतनी सख़्ती करते थे कि लोगों को सर उठाने का मौक़ा नहीं मिलता था। फिर जब दूसरा इमाम आता था तो उसे फिर से इस मिशन को चलाने में और लोगों को तैयार करने में वक़्त लगता था। इमामों ने ऐसे माहौल में शिया मज़हब को बहुत होशियारी के साथ बचा के रखा और बहुत मज़बूती के साथ उसे उन ख़तरनाक रास्तों से बचाते हुए आगे बढ़ाया। अमवी और अब्बासी राजा, इमामों को शहीद करके इमामत को ख़त्म करना चाहते थे लेकिन वह इस कोशिश में कभी कामयाब नहीं हो सके, यह उनके सीने में एक तीर की तरह था जिसे वह कभी निकाल नहीं सके बल्कि उनकी नींदे हराम कर रखीं थीं। जब इमाम मूसा काज़िम अ. को कई साल तक जेल में रखने के बाद ज़हर दे कर शहीद कर दिया गया तो उसके बाद ऐसे हालात थे कि हुकूमत के ख़िलाफ़ सांस लेने की भी किसी में हिम्मत नहीं थी। इमाम रज़ा (अ.) के एक सहाबी कहते हैं: हारून की तलवार से हमेशा ख़ून टपका करता था, ऐसे माहौल में इमाम रज़ा का सबसे बड़ा कारनामा यह था कि उन्होंने शिया मज़हब को बचा कर रखा और शियों को बिखरने नहीं दिया। उस ज़माने में जब बनी अब्बास की हुकूमत बहुत मज़बूत मानी जाती थी, इमाम नें तक़य्ये के साथ, होशियारी के साथ, अपने मिशन को जारी रखा। इतिहास हमारे सामने इमाम रज़ा (अ.) के उन दस सालों को जिनमें हारून रशीद बादशाह था या उन पाँच सालों को जिनमें बग़दाद और ख़ुरासान में लड़ाईयां और जंगें हो रहीं थीं, बयान नहीं कर सकता है। अलबत्ता बहुत सी चीज़ों की मदद से समझा जा सकता है कि इमाम अली रज़ा अ. नें उसी मिशन को जारी रखा जो कर्बला के बाद शुरू हुआ था और उसी मक़सद को निगाह में रखते हुए ख़ामोशी से संघर्ष करते रहे। 198 हिजरी में जब मामून नें अपने भाई अमीन को ख़त्म करके पूरी तरह से हुकूमत अपने हाथ में ले ली, उसका यह अहेम काम शियों और अलवियों से निपटना था। वह जानता था कि उसके बाप की इतनी बड़ी हुकूमत भी शियों का कुछ नहीं बिगाड़ सकी और इमाम काज़िम (अ.) को शहीद करने के बाद भी यह अभी तक ज़िन्दा हैं। हमारी निगाह में मामून शियों को अपने लिये सबसे बड़ा ख़तरा समझता था। पाँच साल तक चूँकि वह ख़ुद अपने भाई और दूसरे अब्बासियों के साथ जंग और लड़ाई में लगा हुआ था इस लिये अलवियों को फिर से उखाड़ने और पहले से ज़्यादा मज़बूत होने का मौक़ा मिल गया था। मामून एक चालाक आदमी था इस लिये समझ गया था कि शिया और अलवी पहले से ज़्यादा तैयार हो चुके हैं और किसी वक़्त भी हुकूमत के ख़िलाफ़ खड़े हो कर मुश्किल खड़ी कर सकते हैं इसलिये उसने यह चाल चली कि आठवें इमाम को मदीने से ख़ुरासान बुला लिया और उनको एक तरह से मजबूर किया। (अपना वली अहेद (उत्तराधिकारी) बनने पर) यहां इमाम के सामने एक ऐसा मैदान था जिसमें दुश्मन उनका दोस्त बन कर आया था और वह बड़ी होशियारी और ख़ामोशी से उनके मिशन की जड़ें काटना चाहता था। यह एक ऐसा मोड़ था जहाँ शियों को कामयाबी भी मिल सकती थी और वह बुरी तरह नाकाम भी हो सकते थे। इस लड़ाई में दुश्मन एक नई चाल के साथ और पूरी तैयारी कर के मैदान में आया था। मामून ने बहुत चालाकी, सियासत और प्लानिंग के साथ एक ऐसे मैदान में क़दम रखा था कि अगर उसकी प्लानिगं कामयाब हो जाती और वह अपनी कोशिश में कामयाब हो जाता तो चालीस हिजरी यानी इमाम अली अ. की शहादत के बाद से उस वक़्त तक बनी उमय्या और बनी अब्बास की हुकूमतें अपनी कोशिश के बाद भी जो काम नहीं कर सकीं थीं वह मामून बड़ी आसानी के साथ कर सकता था और वह था शियों को जड़ से उखाड़ फेंकना। इस तरह से वह अपने मुख़ालिफ़ का काम हमेशा के लिये ख़त्म कर देता जो हमेशा से हुकूमतों की आँख का कांटा बना हुआ था। लेकिन इमाम रज़ा अ. ने अल्लाह की मदद से उसकी सारी सियासत पर पानी फेर दिया और उसे बुरी तरह उस मैदान में पछाड़ा जिसका मामून नें कभी सोचा भी नहीं था और शिया कमज़ोर या ख़त्म क्या होते, वह और ज़्यादा मज़बूत हो गये। यही वजह है कि 201 हिजरी को शियों के लिये सबसे अच्छा साल माना जाता है जिसमें अलवियों नें सुकून की सांस ली और अपने आप को पहले से ज़्यादा मज़बूत कर लिया। यहाँ एक सवाल ज़हेन में आता है कि मामून नें इमाम रज़ा अ. को मदीने से ख़ुरासान क्यों बुलाया था और उसका क्या मक़सद था? हमारी नज़र में उसके कई मक़सद थे जिनमें कुछ यह हैं:1. मामून शियों के अण्डर ग्राउंड सियासी कामों को सामने लाकर उनकी स्पीड को कम करना चाहता था क्योंकि शिया उस वक़्त अण्डर ग्राउंड एक ऐसा मूवमेंट (आंदोलन) चला रहे थे जो हुकूमत का मुख़ालिफ़ था उस मूवमेंट की दो ख़ास बातें थीं जिसकी वजह से यह काफ़ी कामयाब था। एक उसकी मज़लूमियत और दूसरा उसका पाक व मुक़द्दस होना। इन दो चीज़ों के बेस (Base) पर शिया इस्लाम को उसी तरह से बयान करते थे जिस तरह अहलेबैत (अ.) नें बयान किया था और इस तरह लोगों को अपनी तरफ़ खींचते थे जिसकी वजह से शियों की संख्या बढ़ती जाती थी जिसके नतीजे में हुकूमतों के ख़िलाफ़ बग़ावतें और लड़ाईयां भी होती थीं। म