भारत में सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि के कार्यालय की साईट की रिपोर्ट के अनुसार मिको पेलेड Miko peled का जन्म 1961 में फ़िलिस्तीनी शहेर बैतुल मुक़द्दस के एक ज़ायूनी परिवार में हुआ। उनके दादा उन नेताओं में से थे जिन्होंनें ज़ायूनी हुकूमत की आज़ादी के घोषणा पत्र पर सिग्नेचर किये थे। उनके पिता mattityahu peled उस छ: दिन के जंग में ज़ायूनी सेना के बड़े कमांडर थे जिसमें पश्चिमी तट और जोलान की चोटियों पर इस्राईल को जीत हासिल हुई।माइको पैलेड जिन्हे कई साल तक अपने पारिवारिक इतिहास पर बड़ा गर्व था, अब वह ज़ायोनी हुकूमत के पक्के विरोधी हैं। अब उनका मानना है कि फ़िलिस्तीनी मामले का समाधान तभी हो सकता है जब इस्राईल ख़त्म हो जाए।मिको, नसीम को दिये अपने एक इंटरव्यू में अपने अंदर आए बदलाव के बारे में बताते हैं:इस बदलाव की शुरुवात मेरे पिता के घर से हुई। 1948 में मेरी माता से कहा गया कि एक ऐसे घर में जा कर रहें जो एक फ़िलिस्तीनी परिवार से ज़ब्त किया गया था। लेकिन मेरी माता नें उस प्रस्ताव को रद्द कर दिया और कहा कि वह कभी ऐसे घर में नहीं रहेंगी जहाँ से एक माँ को ज़बरदस्ती निकाल कर बाहर कर दिया गया हो।1968 में मेरे पिता नें इस्राईली सेना से रिटाएर होने के बाद कभी अपने पिछले जीवन पर गर्व नहीं किया और बाक़ी अपना सारा अपना जीवन फ़िलिस्तीन व बंदियों की हिमायत करने में बिताया। मिको पेलेड का मानना था कि इस्राईल की तरफ़ से फ़िलिस्तीनियों को छूट मिलनी चाहिये कि वह पश्चिमी तट और ग़ज़्ज़ा में एक आज़ाद सरकार बनाएं जिसकी राजधानी पश्चिमी क़ुद्स हो।वह असली कारण जो मिको में बदलाव आने का कारण बना, वह 1997 में फ़िलिस्तीनी प्रतिरोधी बलों की तरफ़ से होने वाला एक आत्मघाती हमला था जिसमें उनकी भांजी भी मारी गई थी।मिको कहते हैं: इस घटना पर मेरी बहन की प्रतिक्रिया झिंझोड़ने वाली थी। मेरी बहन नें न केवल यह कि फ़िलिस्तीनियों को उस घटना में अपराधी नहीं समझा बल्कि ख़ुद इस्राईलियों और अपने को उस घटना का असली कारण बताते हुए कहा: हम इस्राईलियों नें फ़िलिस्तीनियों को बिल्कुल निराश कर दिया है, हमनें उन्हे उनकी ज़मीन से बाहर खदेड़ा, उनके घरों को मिट्टी में मिलाते हैं, उनके मर्दों को जेल में डालते हैं, उनके छोटे छोटे बच्चों और बच्चियों को स्कूलों में मौत की घाट उतारते हैं, और उनके भविष्य और उम्मीद को नाबूद करते हैं।इस घटना के बाद मिको नें ठान ली कि वह फ़िलिस्तीनियों को पहचाने। उसके बाद वह उन इलाक़ों में गए जो इस्राईल के क़ब्ज़े में है। वहाँ जाने के बाद उनके गंभीर हालात को देख कर समझ जाते हैं कि वह अब तक ज़ायोनियों की झूठी कहानी में मग्न थे।अमरीका में नसीम के पत्रकार नें मिको पेलेड के साथ बैठ कर कुछ बातचीत की है, वह कुछ सालों से अमरीका में रह रहे हैं। हम इस बातचीत का एक हिस्सा यहां प्रस्तुत कर रहे हैं:नसीम रिपोर्टर: पिछले साठ सालों से फ़िलिस्तीन मुद्दे को हल करने के लिये कोशिश की जा रही है लेकिन अब तक इसमें नाकामी मिली है, इसका क्या कारण है? और अमरीका और इंग्लैण्ड की, होने वाले इस कोशिश में क्या भूमिका रही है? मिको: अमरीका और इंग्लैण्ड फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ होने वाले सारे इस्राईली अपराधों में शामिल हैं। पिछले साठ साल में होने वाली सारी कोशिशें भी इस लिये नाकाम रही हैं क्योंकि यह दो देश कभी भी इस फ़िलिस्तीन में शांति लागू करने के लिये कोशिश नहीं करते, वह केवल यह चाहते हैं कि फ़िलिस्तीनियों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दें, और ऐसा अभी तक नहीं कर पाए हैं।इस्राईल के बातचीत करने से कोई फ़ायदा नहीं है इसके लिये यासिर अरफ़ात एक अच्छी मिसाल हैं, उन्होंनें इस्राईल के साथ बातचीत की और फ़िलिस्तीनी भी कुछ पीछे हटे लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ।अरफ़ात नें 30 साल से ज़्यादा सुलह और शांति के लिये कोशिश की, यहाँ तक कि अरफ़ात नें पश्चमी तट और ग़ज़्ज़ा में फ़िलिस्तीनी सरकार के बनाने की बात को भी मंज़ूर कर लिया। इस प्रस्ताव को मंज़ूर करने का मतलब यह था कि 78 प्रतिशत फ़िलिस्तीनी ज़मीन हाथ से निकल जाए। लेकिन इसके बावुजूद अरफ़ात नें सुलह और शांति के ख़ातिर इस प्रस्ताव को मान लिया।अपनी मांगों से इतना पीछे हटने के बाद भी इस्राईल सुलह करने पर तैयार नहीं हुआ। इस्राईल की अरफ़ात से यह मांग थी कि वह पश्चिमी तट को भी छोड़ दे और फ़िलिस्तीन केवल ग़ज़्ज़ा में सिमट के रह जाए और यह अरफ़ात के लिये सम्भव नहीं था।और जब अरफ़ात नें इस्राईलियों की बात को नहीं माना तो इस्राईल नें अपने टैंकों से उनके कार्यालय का घेराव कर लिया और इसी खीचातानी के बाच 2004 में अरफ़ात का देहान्त हो गया।इस्राईल और ज़ायोनिज़्म सिरे से सुलह और शांति के विरोधी हैं। उनका दावा है कि फ़लिस्तीन इस्राईल की ज़मीन है और उसका सम्बंध यहूदियों से है और उनके अलावा किसी को वहाँ रहने का अधिकार नहीं है। यही कारण है कि यह लोग कभी शान्ति की बात नहीं करेंगे।शांति उसी समय लागू हो सकती है कि जब कोई यहूदी देश न बने। भविष्य में फ़िलिस्तीनी सरकार के लिये ज़रूरी है कि वह फ़िलिस्तीन में डेमोक्रेसी लागू करने के साथ वहाँ के सभी निवासियों को बराबर से उनका अधिकार और सम्मान दे। मुझे आशा है कि भविष्य में ज़ायोनी सरकार गिरेगी और बिना किसी हिंसा के (फ़िलिस्तीन में) एक डेमोक्रटिक और आज़ाद समाज सामने आएगा। जिस तरह दक्षिणी अफ़रीक़ा में रंगभेद नीति (Apartheid) का अंत हुआ।फ़िलिस्तीनी मुद्दे के समाधान के लिये ईरान के सुप्रीम लीडर का प्रस्ताव मैं ईरान के प्रस्ताव से सहमत हूँ जिसमें उसने यह बात कही है कि फ़िलिस्तीन में एक रेफ़रेंडम हो जिसमें फ़िलिस्तीन की सारी जनता (चाहे वह फ़िलिस्तीन के पिछले रहने वाले लोग हों या वह लोग हों जो अब वहाँ रह रहे हैं, साथ ही यहूदी ईसाई और मुसलमान सभी लोग) उसमे हिस्सा लें ताकि यह सारे नागरिक मिल कर वहाँ की सरकार के बारे में फ़ैसला करें।यह एक ऐसा विचार है जिसमें सारे फ़िलिस्तीनी नागरिकों को बराबरी मिलेगी और सभी लोग अपनी नागरिकता और मानवता के अधिकारों से पूरी तरह लाभ उठा पाएंगे। और यह उसी समय सम्भव होगा जब ज़ायोनिज़्म हुकूमत से हट जाए।फ़िलिस्तीन और इस्राईल नाम से दो देश बनाए जाने के लिये पश्चिमी देशों का प्रस्तावमुझे नहीं लगता यह एक अच्छा विचार है और वैसे भी अभी तक इस विचार को कोई कामयाबी नहीं मिली है। एक ऐसा अरब देश जिसकी आधी जनता यहूदी न हो उसमें एक यहूदी देश नहीं बनाया जा सकता। यह केवल जातिवादी क़ानूनों और निर्दयता से ही सम्भव है। इस्राईल एक ऐसा मुल्क बनाना चाहता है जिसमें कोई फ़िलिस्तीनी नागरिक न हो और इसी लिये वह कभी शांति नहीं चाहेगा। ऐसा लगता है कि पश्चिमी देशों के इस प्रस्ताव की नाकामी का कारण यही है।कब्जे वाले इलाक़े के नागरिकों को हक़ीक़तों से सूचित कराने का कोशिशमैंने एक किताब लिखी है जिसका नाम है The General`s Son,Journey of Israeli in Palestine यह मैंने इस लिये लिखी ताकि इस्राईली रेजीम के झूठ को बेनक़ाब करूं। अपने भाषणों में भी मैं सदा इस विषय पर बोलता हूँ।इस्राईल में
9 दिसंबर 2012 - 20:30
समाचार कोड: 371293
मिको पेलेड Miko peled का जन्म 1961 में फ़िलिस्तीनी शहेर बैतुल मुक़द्दस के एक ज़ायूनी परिवार में हुआ। उनके दादा उन नेताओं में से थे जिन्होंनें ज़ायूनी हुकूमत की आज़ादी के घोषणा पत्र पर सिग्नेचर किये थे। उनके पिता mattityahu peled उस छ: दिन के जंग में ज़ायूनी सेना के बड़े कमांडर थे जिसमें पश्चिमी तट और जोलान की चोटियों पर इस्राईल को जीत हासिल हुई.........